बहुत पुरानी कविता है जो उस समय के नईदुनिया इंदौर के दीवाली विशेषांक में और बाद में कई अन्य पत्रिकाओं में छपी थी
आज मित्र Anamika Shukla ने इसे भेजा तो कितनी ही स्मृतियाँ बरबस ही आँखों के सामने आ गई
बहुत शुक्रिया अनामिका
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तुम्हें मदद के लिए जब दुहाई देने लगा
तुम्हारी आंख में क्या है दिखाई देने लगा
चला था ज़िक्र मेरी ख़ामियो का महफ़िल में
जो लोग बहरे थे उनको सुनाई देने लगा
मैं उसके झूठ की ताईद करने आया था
मैं उसके झूठ पर ख़ुद ही सफ़ाई देने लगा
ज़मीर बेच के लौटा जब ऊंचे दामों पर
जो रास्ते में मिला वो बधाई देने लगा
• सलीम सिद्दीक़ी
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छोटे कस्बों के मीडिया और स्थानीय चैनल सिर्फ हिंदू - मुस्लिम मुद्दों पर ही चल रहे है - पार्षदों, विधायकों और सांसदों के प्रवक्ता बनकर ये मीडिया प्रतिनिधि अराजक हो जाते है और बाज दफे शहरों की हवा भी खराब करते है
असल में छोटे अखबार, गली मुहल्ले के अनियतकालीन संस्करण और विज्ञापनों पर पलने वाले ये अखबार बेहद घातक है, मेरे देखते देखते कई जगहों और शहरों के ये पत्रकार सिर्फ और सिर्फ कठपुतली बन गए है और भड़कीली खबरें देकर फिजां खराब करते है, बात करने पर कुतर्क करते है और व्यक्तिगत हो जाते है या निजी मुद्दों को बीच में ले आते है, तर्क की इनके पास कोई गुंजाइश ही नहीं है क्योंकि ब्लैक मेल से चलने वाले धंधे और कमाई बंद होगी तो फिर काम कैसे चलेगा, असल में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, जिला सूचना अधिकारी या प्रशासन को इन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए़ कि कैसे ये गांव देहात या कस्बों में जहरीले बीज बो रहे है और वो भी इसलिए कि इनके अखबार, सुविधाएं और झांकी बनी रहें
बहरहाल, इनको पढ़ना - लिखना बंद और फॉलो करना भी
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मप्र में कलेक्टर और आय ए एस अधिकारियों की संपत्ति का ब्यौरा देखकर शर्म आती है कि दस-बीस वर्षों की नौकरी में ये लोग चार से बीस करोड़ तक और अगिनत अचल संपत्ति के मालिक बने बैठे है
ये उन लोगों को देखना चाहिए और समझना चाहिए जो पंद्रह दिन पहले घोषित हुए यूपीएससी के परिणामों में अपनी जात-बिरादरी से लेकर गरीब रिक्शेवाला या किसी मजदूर के बेटे-बेटी के अधिकारी बनने के गुण गा रहे थे और कह रहे थे कि देश सेवा के लिए करोड़ों का पैकेज ठुकराकर ब्यूरोक्रेट बन रहें है, बचपन से जिन्होंने गरीबी और सामाजिक भेदभाव देखा वे सबसे ज्यादा मलाई खाते है और अकूत संपत्ति इकठ्ठा करते है
अधिकांश प्रमोटी अधिकारियों को देखकर भी लगता है कि चापलूसी करके डिप्टी कलेक्टर से आय ए एस बने या आरक्षण से प्रमोशन पाया या नेताओं के छर्रे बनकर रहें जीवन भर - इन्होंने भी करोड़ो कमा लिए , राज्य प्रशासनिक सेवा में रहकर भी करोड़ों कमा ही लेते है तो फिर क्या, शर्म-हया सब बेच खाया है, एक आम आदमी की जीवन भर की कमाई और इनकी संपत्ति में लाखों गुना का अंतर है - यह आसानी से समझा जा सकता है, और संविधान के अनुच्छेद 14 से 32 तक को बेचकर रोटी खाने वाले नेता और बुद्धिजीवी क्या खाकर रोज सोते होंगे - यह समझ से परे है
इन सब पर कब लगाम लगेगी और मप्र में तो अरविंद जोशी - टीनू जोशी से लेकर तमाम उदाहरण है ही कि कैसे इन लोगों ने प्रदेश को लूट-खसोट का अड्डा बना रखा है, हमारे यहां महिला अधिकारी भी भ्रष्टाचार में एक नम्बर है और ढीठ भी, लगभग इन सबके एनजीओ से लेकर उद्योग धंधे और रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में भी अवैध होटल चल रहे है, या किसी एनजीओ के रहनुमा बनकर पर्दे के पीछे से अपना गेम सेट करते रहते है, दिलेरी यह है कि कई मित्रों ने मुझे व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि - "हाँ , मैं रूपया खाता हूँ" , अभी दो दिन पहले ही एक महिला आयएएस के मानपुर, जिला इंदौर वाले रिसॉर्ट पर अवैध जुआ खेलते लोग गिरफ्तार हुए थे, कई पूर्व मुख्य सचिवों की बीच भोपाल में आलीशान इमारतें, E-4 अरेरा कॉलोनी में करोड़ो के बंगले आज भी गरीबी भुखमरी को मुंह चिढ़ाते है, एक महिला मुख्य सचिव की दो बड़ी बिल्डिंग, स्कूल, विदिशा, रायसेन से लेकर बड़े अनुदान प्राप्त करने वाला एनजीओ इस बात का प्रामाणिक सबूत है, नीचे लिस्ट में जिन नीरज मंडलोई का नाम है उनकी माताजी का बड़ा एनजीओ है इंदौर में
असल में ब्यूरोक्रेसी इस देश में एक बड़ा घेट्टो और नेक्सस है और फिर कहता हूँ कि लबासना, मसूरी, में जहां इन को Pamper किया जाता है, को जब तक बम से उड़ाकर इन्हें पटवारी प्रशिक्षण विद्यालय टाईप केंद्रों में सामान्य प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा और दो बेड रूम वाला फ्लैट रहने को नहीं दिया जायेगा हर जिले में कार्यकाल के दौरान, तब तक ये ऐसे ही सफेद हाथी बनते रहेंगे, इनकी सारी निःशुल्क सुविधाएं, बंगला, बंगला ऑफिस, ऑफिस के खर्च और दस-दस गाड़ियां घर में रखने की सहूलियतें बंद करना चाहिए
ये अफसर नहीं देश के लिए बोझ है
देवास का मीडिया देवास कलेक्टर और एसपी की संपत्ति बताने का कष्ट करेगा जरा
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नोटबंदी से लेकर इजराईल यात्रा तक अंधभक्तों और सनातनियों को सिर्फ फायदा ही फायदा हुआ है, ऐसा कहना है एक अपढ़ प्रधान, तानाशाह और किलर एक्सपर्ट गृहमंत्री का और तमाम मूर्ख मंत्रियों का - इनका हर बार मास्टर स्ट्रोक ही होता है, कमबख्त ऐसा प्रधान मिला है जिसने हर दो साल में जनता को सड़क पर ला खड़ा किया है और दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर किया है, कभी नोट के लिए, कभी आधार के लिए, कभी गैस के लिए, कभी दवाओं के लिए, कभी तेल के लिए, कभी आयुष्मान कार्ड के लिए, कभी नागरिकता के लिए या कभी सांस लेने के लिए और कभी अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दो कौड़ी के अधिकारियों के सामने नाक रगड़ते रहो - शर्मनाक हालात पैदा कर दिए है इस अपढ़ और कुटिल शख्स ने
संविधान में जिस गरिमा के साथ नागरिकों के जीने की बात थी - उसे इसने और इसके छर्रों ने बुरी तरह से रौंद दिया और यह पूरी बेशर्मी से दुनिया घूमता रहा है नखरे पट्टे करके, कपड़े बदलने और साज श्रृंगार के अलावा कुछ नहीं किया और देश के हर क्षेत्र और हिस्से में सत्यानाश कर दिया है, महंगे सामान का शौकीन देश को वोकल फॉर लोकल कहता है और खुद के दिमाग में विचार भी आयातित है, यही है संघ के प्रचारकों की हकीकत कि जीवन भर दूसरों के घर खाओ और मौका मिलें तो देश दुनिया को निचोड़ दो
पढ़े-लिखें मूर्खों को इसके बहाने से रूपया कमाने का जरिया मिला और वे इसके साथ हर तरह के क्राईम में क्राईम पार्टनर हो गए और अपना उल्लू सीधा करने लगे, दस रुपए का भगवा गमछा काँधे पर लगाकर अंध भक्त बन गए और मीडिया से लेकर छोटे-मोटे नत्थूलाल भी अदाणी-अंबानी की राह पर चल निकले, गंगा-जमनी तहजीब को तो खत्म किया ही पर पूरी संस्कृति खत्म कर दी, हिंदुओं के बीच दलित वंचित ब्राह्मण ठाकुर बनिये ओबीसी या आदिवासी कहकर समाज को ऐसा विभक्त किया कि आने वाली पचास पीढ़ियां इस महाकुटिल मानव के ऋण से मुक्त नहीं हो पाएगी और कितना विकास करेगा और अच्छे दिन लायेगा यह शख्स
पूरे देश में गैस की किल्लत है और इसके भांड मंत्री कह रहे संकट नहीं - गैस या तेल का, शर्म भी नहीं इनको जबकि ये संविधान या ईश्वर की शपथ लेकर पद पर आसीन होते है, ये है इनका सनातन धर्म और वसुधैव कुटुंबकम् का नारा, ये है एक सबसे बड़ी पार्टी और सबसे संगठित आनुषंगिक संगठन की ताकत कि गरीब गुर्गों को पांच किलो राशन बाँटो और गैस तेल जैसी सुविधाओं से वंचित करके विश्व गुरू बनो
इन मूर्ख लोगों ने कुछ करने के बजाय टैक्स पेयर्स का रूपया कांग्रेस को कोसने और राहुल को पप्पू साबित करने में लगाया जबकि आज पूरी दुनिया के सामने इनकी छबि "पप्पू-लल्लू और कालू" से ज्यादा नहीं है, हर कोई आकर चमका जाता है, लोकसभा में संजय सिंह को सुनिये जिसने कहा कि प्रधानमंत्री को इस संकट के समय में गुफा से खींचकर लाओ, तृणमूल से लेकर तमाम सांसदों ने क्या क्या नहीं बोला कोई समझदार होता तो इस्तीफा देकर कही चुल्लू भर... पर इस्तीफा ना संस्कृति है और ना ही नीयत
कमाल यह है कि सुप्रीमकोर्ट, संसद, राज्यपाल, पुलिस, ब्यूरोक्रेसी, आईबी, सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों को निज माल समझकर इस्तेमाल करने वाले ये लोग अब राष्ट्रपति तक को चुनाव जीतने के लिए काम में लेने लगे है और देश के गंवारू लोगों को समझ नहीं आ रहा, असल में लोग भी इसी तरह का तंत्र डिजर्व करते है
जे विश्वासन लोग नहीं
जे देश सुधारक लोग नहीं
धिक्कार है
इस सरकार को बदले बिना कुछ नहीं हो सकता
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आईये वाट्सअप की थोड़ी बात कर लें
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@ आपने किसी को नंबर दिया बाजार में और आप घर पहुंचते ही संदेश आता है कि नत्थूलाल या चम्पा बाई ने किसी साहित्यिक या सामाजिक समूह में जोड़ लिया बगैर पूछे
@ इन समूहों में ज्ञान या जानकारी कम - सुप्रभात से लेकर बकवास जैसे ईरान अमेरिका युद्ध, महिला शक्ति, कानून का दुरुपयोग, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका, नास्त्रेदम के होने का अर्थ, पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर बायपास सर्जरी तक का इतना जीवंत विवरण होता है कि आप यह सब सीखकर अपने घर पर ही एक खोपचे में पचास - साठ रूपया लेकर बायपास, किसी की भी नसबंदी या केटरेक्ट सर्जरी कर सकते है
@ आप किसी को कहते है कि मेरे भाई और लाड़ली बहना मेरे इस नम्बर पर किसी शक्तिपीठ वाली माताजी या ओमकारेश्वर, महाँकाल, जीसस, मरियम, गुरू साहब या मक्का - मदीना के फोटो मत डाला करो जिसमें उनके दिनभर के श्रृंगार और गांजे - भांग से सजावट की हो, मतलब आप कह रहे है कि धार्मिक मामला है - मत भेजा करो पर अगला या अगली आपको दूसरे नंबर पर भेजना शुरू कर देंगे - यानी तनिक भी बुद्धि नहीं, रोज भगवानों के फोटो डिलीट करने से मेरा तो दिल घबराता हैं कि पता नहीं कब कौन भगवान श्राप दे दें, जिंदगी की वैसे ही वाट लगी पड़ी है साली
@ मोदी से लेकर राहुल, ममता, मायावती, हिटलर, गोर्बाचोव, मुसोलिनी, खालिदा आँटी, इंदिरा गांधी, नेहरू, गांधी, माफीवीर सावरकर और अब डोनाल्ड ट्रंप तक के बारे में लोग्स इतना ज्ञान दे देंगे कि बचपन में वाट्सअप होता और यह सब पढ़ लेता तो आज देश के किसी राज्य का सबसे बड़ा भ्रष्ट मुख्य सचिव होता या लबासना, मसूरी का डीजी होता कम से कम
@ अब साहित्यकारों पर आओ, ससुरे अपने भेजे मेसेज पढ़ेंगे नहीं, पर खुद रोज कविता, लेख, ग्यारह सौ पन्नों की कहानी पेल देंगे, जब भी कोई किताब बाजार में आएंगी तो प्यार भरी मनुहार आएंगी, इनके शहर जाओ तो ससुर मिलने से घबराते है या बहाना बना देते है कि शहर में नहीं हूँ - पर किताब खरीदें, यह आग्रह इतना गजब होता है कि आप शादी के लिए मना कर दें एक बार पर किताब का ऑर्डर तुरंत करेंगे, भयानक कुंठित और अपढ़ निहायत ठुल्ले या सरकारी कर्मचारी इन समूहों में होते है - जो दिनभर बकर करते है, एक कविता के इतने चिथड़े उड़ाते है कि कोई समझदार या टॉयलेट ट्रेंड कवि अपनी ही कविता की ये सारी समीक्षायें पढ़ ले तो आत्महत्या कर लेगा, भोपाल के दो-चार समूहों का अनुभव है जो इसी तरह के प्रगतिशीलों से भरा पड़ा है
@ हर समूह के नियम या उद्देश्य होते है और हर एडमिन एक असफल ब्यूरोक्रेट होता है जो लगातार तानाशाह की तरह से सबको डाँटा करता है कि यह नहीं, वह नहीं - पर बावजूद इसके कुछ लोग बगैर भय और शर्म के भगवान के फोटो से लेकर अनमोल वचन, रोजगार के विज्ञापन, मरे-खपे लोगों के अंतिम क्रिया और उठावने की जानकारी निसंकोच चैंपते रहते है, इन निर्लज्जों पर किसी तानाशाह का कोई असर नहीं होता और तानाशाह एक दिन घुटकर या तो मर जाता है या क्विट कर जाता है
@ कुछ लोग रोज आपको बिना नागा सुबह उठकर शुभकामनाएं देते है - ज्ञान और प्रवचन के साथ और दोपहर होते-होते आपको रंगीन और मदहोश कर देने वाले पोर्न वीडियो में भिगो देते है कि आपकी शाम रंगीन हो सकें और रात सुहानी ; भयंकर धार्मिक प्रवृत्ति के ये लोग आपके शुभ चिंतक है - इस पर बहस की जा सकती है
@ कुछ लोग समूहों में सिर्फ इसलिए होते है कि अपने विरोधी को सिर्फ और सिर्फ जलील कर सकें, इन नालायक लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि इस तरह वे पूरी तरह उधड़ी हुई गुदड़ी की तरह से जमाने के सामने आ जाते है और अंत में उनकी रूई को सिर्फ जलाया ही जा सकता है
@ बाकी कुछ लोग पूरी तल्लीनता से आपको रोज पोस्टर, सुविचार और जानकारियों के पुलिंदे के बीच अपनी रचना, अपनी शादी की साल गिरह या अपने समाज में अपने किसी पद पर होने के बहाने अपने द्वारा किए जा रहे मानव सभ्यता में उनके द्वारा किए जा रहे पहली बार के अनूठे कामों का जिक्र गाहे-बगाहे करते रहते है
@ असल ने समूह जानकारी, सूचना या किसी तरह के कार्यक्रम के संयोजन के लिए होते है और इसमें हम भारतीयों ने अपने उल्टी-दस्त से लेकर हनीमून और श्राद्ध तक का तर्पण कर मनुष्यता की समिधा डाल दी है, जो कि निहायत ही व्यक्तिगत बातें होती है, तभी पूरी दुनिया का बाजार भारत के इन फुरसती मुर्गों को लालच देकर अपना मुनाफा कमा रहा है
अंत में प्रार्थना
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किसी को इतना लम्बा पढ़कर भी यह समझ नहीं आए कि मुझे क्या भेजना है और क्या नहीं तो खबरदार हर जगह से खारिज कर ब्लॉक कर दूंगा - किसी खुसट बूढ़े तानाशाह की तरह
हर समूह की एक उम्र भी होना चाहिए, देख रहा कि एडमिन मर गए, पर मुस्तफा खामेनेई जिंदा हो गए कमबख्त
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देवास में सुशासन ध्वस्त
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धूल, धुएँ और धर्म की भरमार के बीच अस्त-व्यस्त सड़कों और जानलेवा गंदगी के बीच देवास में आपका स्वागत है, नगर निगम पूरी तरह पंगु है, विधायकी एक पार्टी से और एक ही सामंत परिवार की 40 वर्षों से संपत्ति है, लोकसभा का नेतृत्व भी सिर्फ कागजी है, दोनों में जन प्रतिनिधित्व की भावना तो दूर नीयत भी नहीं है, भाजपा सिर्फ कांग्रेस को गाली देती है परिवारवाद के लिए, पर अपने गिरेबाँ में नहीं झांकती, सत्यानाश कर दिया इस शहर का इन लोगों ने और पिछले एक साल से शहर ना मात्र गंदगी - बल्कि पूरी तरह से अस्त व्यस्त है, सांसद और विधायक की दलाली करते हुए यहां के मीडिया के लोग भी सिर्फ मलाई खा रहे है, जो रोटी के टुकड़े ज्यादा डालता है उसके वीडियो दिखा रहे है और तारीफ कर रहें है, विशेषकर चैनल के बहाने अपनी संपत्ति बनाने वाले और कैमरा उठाकर गलत उच्चारण करने वाले मीडिया
निगम की जिम्मेदार महापौर घर में रहती है और उनके पति परमेश्वर हर जगह भगवान की तरह मौजूद है, पूछने पर कारण यह कि सरकार ने एक आय ए एस की नियुक्ति कमिश्नर के रूप में कर दी तो हम कुछ नहीं कर पा रहें, कमिश्नर ने पार्षदों से लेकर सबके धंधे और भ्रष्टाचार बंद कर दिए, इसलिए पूरी पार्टी निकम्मी हो गई, विपक्ष का कोई अर्थ नहीं है वे सिर्फ नौटंकी में व्यस्त है, ना कोई ठोस योजना है और ना कोई एक्शन, सिर्फ नाटक नौटंकी और प्रदर्शन और प्रशासन तो जाहिर है -"गैर प्रतिबद्ध" है ही, इसलिए उन्हें अपना जीवन दो-तीन साल में इस शहर को और बड़ा नर्क बनाकर किसी मलाईदार जगह पर चले जाना है
घर-घर लोग बीमार है, पूरा शहर खुदा पड़ा है, हर तरह की कांक्रीट सड़क को खोदकर नागरिकों की कब्र खोद रहे है और समझ नहीं आता कि किसको शिकायत करें, पूरे कुएं में भांग पड़ी है और बर्बादी का जश्न मनाया जा रहा है और निगम ने बेशर्मी से संपत्ति दर और जलकर बढ़ा दिया, लूट खसोट का यह खेल ही असल में संविधान में 74 वां संशोधन था, प्रशासन और विधायिका मिलकर मखौल उड़ा रहे है इस संशोधन का और सुशासन का कबाड़ा कर दिया है
असल में दिल्ली से लेकर भोपाल और जिलों तक जितना नुकसान आम लोगों का भाजपा ने किया और अपना पेट भरा है - उतना किसी ने आजादी के अस्सी साल में नही किया और अब जब इन्हें समझ आ रहा हैं कि खेल खत्म हो रहा है तो ये खुली लूट और सत्यानाश पर उतर आए है, मोदी की असलियत सामने आ ही गई है कि कितना कायर और कुपढ़ प्रधान है कि एक भी मोर्चा नहीं सम्हल रहा
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आदमी जो बोलता है उस पर शक करो, जो भी करता है उसे शक की निगाह से देखो, जो समझता है उस पर सवाल करो, जो उत्तर देता है उन उत्तरों पर उल्टे प्रश्न करो, कुल मिलाकर बात यह है कि यह सब करने से हमारे विश्वास, भरोसे और हमारी धारणाएं पुख्ता होंगी और हमें रास्ते बहुत साफ नजर आएंगे क्योंकि यह समय ऐसा समय है जब हम धुंधलकों में है, अंधियारे हमें दिग्भ्रमित कर रहें हैं, हमें ऐसे संदर्भों से मुब्तिला कर रहें है कि हम बहुत दयनीय स्थिति में है और जाहिर है सारी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी हमारा ठीक रहना और खुश रहना बहुत जरूरी है
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