Skip to main content

Khari Khari, Man Ko Chithti and Sad Demise of Manda Moushi - Posts from 11 to 13 Oct 2026

बहुत फिट आदमी था, कभी उसे गुस्सा करते नहीं देखा, छह बच्चे थे - पांच लड़कियां और एक लड़का, चार लड़कियां नौकरी करती थी, एक की शादी हो गई थी, बेटा सबसे छोटा था जो तीसरी में पढ़ रहा था, सबसे बड़ी बेटी - जिसका ब्याह हो चुका था, उसमें और बेटे में अड़तीस साल का अंतर था, बच्चे की पढ़ाई का खर्च दामाद ही उठा रहा था
बंदा फिट था, शहर के गांधी हाल से श्मशान घाट तक मिल जाता था मुस्काते हुए, कोई दुश्मन नहीं था - शहर, मीडिया, क्लबों, संस्थाओं या स्कूल या अस्पताल में - हैरानी होती थी कि पटवारी से लेकर विभागों के बड़े बाबू तक उसका रसूख जानते थे
क्या काम करता था - किसी को भी नहीं मालूम, पर लीचड़ था और गधा हम्माली से लेकर बौद्धिक तक देने में माहिर था, कई एनजीओ की खाक छान चुका था, शहर का कोई स्कूल नहीं छोड़ा - जहाँ पढ़ाया ना हो और कोई संस्था नहीं जिसको ठगा ना हो
आज फिर दिख गया तो बोला - अज्ञेय कहते है ना - "मै मरूँगा सुखी, मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है" बस ही ही ही करके हँसता हुआ निकल गया, समझ यह आया कि जीवन को जितना हल्का लेंगे और कैजुअल उतने ही मजे से जीवन कटेगा
***
राहुल और महात्मा गांधी बेहतर रणनीतिकार

राहुल यानी पप्पू जिसके बारे में नरेंद्र मोदी ने भ्रम फैलाया और उन्नीस सौ करोड़ रुपए खर्च करके गलत छबि बनाई, आज वह दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है और इस सरकार की नाक में नकेल डाल रहा है
राहुल कितने सुंदर और रणनीतिक तरीके से पूरे देश के सामने ज्ञानेश, वोट चोरी, चंदा चोरी और मोदी सरकार से लेकर आखिर में सीजेआई सूर्यकांत को मैदान में ले आया है आज, सूर्यकांत वही है जिसने न्यायपालिका की इज्जत सड़क पर ला दी और अब देश भर के कानून के छात्र खुले आम इससे डिग्री लेने को मना कर रहें है, वकील इसके खिलाफ सड़कों पर है
ये सभी वही लोग है - जिन्होंने भारत के लोकतंत्र की हत्या की है और मिलजुलकर तेरह करोड़ लोगों के नाम नाजायज तरीके से मतदाता सूची से हटा दिए - जोकि अवैधानिक और हम सबके मूल अधिकारों का खुले आम हनन है, हत्या है
जरूरी था कि इस मोदी सरकार - जिसे चौकीदार चोर है, से लेकर चंदा चोर और अब वोट चोर कहा जा रहा है - को बुरी तरह से नंगा करना और जनता के सामने लाना और इस सबमें राहुल ने जिस खूबसूरत रणनीति से ज्ञानेश कुमार, राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु, और आज सीजेआई सूर्यकांत से मिलने की योजना बनाई, इनमें से दो लोगों ने मना किया और द्रोपदी मुर्मु ने सबूत माँगे जो जल्दी ही राहुल देंगे - यह भी देख लीजिएगा
अतिशयोक्ति नहीं, पर अभी एक मित्र ने कहा कि उन्हें राहुल में महात्मा गांधी की छबि दिखाई देती है, जब मैंने देखा तो मुझे भी लगा कि राहुल और गांधी में समानताएं बहुत है जैसे - जन सैलाब, जनता का सहयोग, सरकार के साथ असहयोग, जिद्दी, भीड़ में बेख़ौफ़ घुसकर निर्णय लेने की क्षमता, मीडिया से बात करने में खुलापन, अपनी कमजोरियों को स्वीकारने का साहस, जनमानस से जुड़ने की ललक, पैदल यात्राएं, छात्रों से बात करना, हर बात पर स्पष्ट समझ, रणनीतिकार और सबको सड़क पर घसीटने की क्षमता और सच कहने का साहस साथ ही शारीरिक रूप से बेहद सक्षम - याद कीजिए जब गांधी अफ्रीका से आए थे तो यही तेवर और जोश था, तर्क तो थे ही उनके पास भी मय सबूत के
खैर, मोदी सरकार के साथ अब ज्ञानेश कुमार, सीजेआई और उन तमाम लोगों के साथ इस भ्रष्ट और कुकर्मी सरकार को इस्तीफा आज नहीं तो कल देना ही होगा, जिस तरह से विपक्ष एकजुट हुआ है, अंधभक्तों को भी कुछ रोशनी नजर आ रही है
आमीन
***
"Untill death, all defeats are psychological"
संघर्षों के बीच रहते हुए साठ साल निकल गए और अब हिम्मत नहीं होती कि सही - गलत, सुख - दुख और अवसाद, तनावों के बीच एक और लड़ाई लड़ सकूँ, जैसा कि आज कपिल सिब्बल जी ने कहा कि अब भरोसा उठ गया है और कही आने जाने की इच्छा नहीं होती, बस कमोबेश यही स्थिति मेरी भी हो गई है
लड़ते - लड़ते जीतने की आदत थी अब उससे भी निजात पाना चाहता हूँ, जीवन की डोर इसी नर्मदा के किनारे कही किसी हथकरघे पर बुनते हुए बीत गई और रंग तो चोखा नहीं आया पर लगा कि जो बना वो ठीक ही था, और "ज्यों की त्यों धर दीन्ही" की ओर अग्रसर हूँ
***
मप्र में पूर्व वाला वर्तमान वाले से लड़ रहा और नर पिशाच कह रहा है दूसरे को, बाकी बहुत पुराने शेर तो लार लटका कर बैठे है कि ये दोनों टरे तो हमको बचा खुचा मांस मिल जाएं चबाने को, दांत तो है नहीं पर फिर भी मौका कौन छोड़ता है बाबू
उधर दिल्ली का मीडिया, सॉरी whore, रोज कह रहा कि मोटा भाई की छुटकू से नहीं पट रही और छुटकू का इस्तीफा जल्दी होगा
योगी, जोगी, हेमंता या राजस्थान या छग या गुज्जू प्रमुख सब जगह आपस में ही दिमकों की तरह लड़ रहे है और देश खोखला कर रहे है, इन सबका उस्ताद नागपुर में दिल्ली के दो ठगों से लड़ रहा कि मेरे संतरे को अब खिलने दो और पुष्पित - पल्लवित होने दो
तीन साल पहले लिखा था कि - "देखना नागालैंड या मप्र के किसी दूरस्थ स्कूल की कक्षा दूसरी "ब" का मॉनिटर भी भाजपा का होगा और एक दिन ये आपस में ही ले कर कर जायेंगे
खैर, हमारे पूर्व वाले का वर्तमान से झगड़ा होने का मुख्य कारण है - "सिंहस्थ - 2028" - जहाँ पूर्व ने खूब मलाई चाँपी थी और अब उम्र हो रही है, दोनों लड़कों को सेट करना है तो इस बार वाली सिंहस्थ मलाई कैसे छोड़ दें, अगला किसने देखा - "कल हो ना हो", दूसरा बुधनी क्षेत्र के लोग स्वाभिमानी होते है, किसी की गुलामी कैसे सह लें - इसलिए अब दिल्ली में मन लगता नहीं, मामी अलग कह रही - "आ अब लौट चलें"
ये लोग ऐसा माहौल कर देंगे कि हिंदू ही हिंदू को मार डालेगा और खा जायेगा क्योंकि पांच किलो राशन की भीख कब तक देंगे, लाड़ली बहना भी सिर पर बोझ हो गई है और रोजगार है नहीं, आईए दो मिनट का मौन रखें इन दोनों की कमसिन लड़ाई पर
बस यही सब कुछ है - नर पिशाच की भुतहा कहानी
***
माँ की तीन छोटी बहने थी, एक तो बहुत छोटी थी तभी यक्ष्मा से गुजर गई थी, तीन बहनें बची थी - निमाड़ में जन्मी और पली थी दो नौकरी में थी माँ और उससे छोटी




अभी परसो मौसी गुजर गई - नौ अक्टूबर को, लिखने को इतनी स्मृतियां है इतनी कि कह नहीं सकता, माँ सन 2008 में गुजर गई थी, उसके बाद हम सबकी एक तरह से उसने जिम्मेदारी ले ली थी, रोज नहीं, पर एक दिन छोड़कर फोन करती थी - शुरूवात ही होती कि शुगर कैसी है, बाहर जाना बंद कर, यहां आ जा मेरे पास, दस दिन रह सब ठीक हो जायेगा
बस हिम्मत थी वो - कि जब बहुत थक जाऊंगा, तो मौसी के घर चला जाऊंगा, कोई बात होती तो फोन पर देर तक बात करता था दुनिया जहां से लेकर पता नहीं सब कुछ
इधर दो - तीन माह से बीमार थी, मैं दो - तीन बार देखने गया तो हालत खराब थी, बोली रुक जा, घर के सभी लोगों से वीडियो कॉल पर बात की, और परसो जब खबर मिली तो दिमाग़ सुन्न सा हो गया था
आज तीसरा था, सुबह पवित्र अस्थियां लेकर हम लोग मंडलेश्वर आ गए, यहां जब नाव नदी के बीच पहुंची तो हमने अस्थियाँ और राख को धार में छोड़ा - सोच रहा था कि एक आदमी सारी उम्र सुख - दुख के बीच संघर्ष करते हुए , यायावरी करते हुए कितना काम करता है, तनाव - अवसाद और कष्टों के बीच से एक कोना निकालकर अपने शेष बचे दिनों के लिए रखता है कि सुख से रहेगा - पर कहां, जरावस्था उसे व्याधियों से मुक्त नहीं करती, ईश्वर के घर से संदेशे आने लगते है कि चलो पैक करो, समय हो रहा है - लंबे चौड़े जीवन की कुल जमा राशि एक छोटी सी थैली में अस्थियां और आधे बोरे में राख जिसे पानी में छोड़ते है तो इतनी जल्दी बहती धारा में निकल जाती है कि जीवन का क्षणांश भी ठहर नहीं पाता
काश कि यह पल और ये जलजले जितनी जल्दी हो अपने लिए देख सकूँ
मंडलेश्वर में नर्मदा का पाट बहुत लम्बा - चौड़ा है और चूंकि माँ के सभी भाई - बहनों का जन्म यही हुआ था, इसलिए सबकी अंतिम क्रिया यही की है हमने
इस पोस्ट में मंडलेश्वर में हमारा प्राचीन और पारिवारिक मंदिर है, मौसी है , मौसी का गाया हुआ वीडियो है, माँ और छोटी मौसी के साथ के फोटो है ताकि सनद रहे
***
प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल जैसे बुजुर्ग लोग और इनके साथ योगेंद्र यादव और तमाम बुजुर्ग महिला - पुरुष, यहां तक की युवा - बच्चे भी प्रदर्शन कर सड़कों पर है, पर दिल्ली में हजारों हिंदी के मास्टर, प्राध्यापक, लेखक, साहित्य अकादमी के वेतन भोगी हरामखोर, रिटायर्ड पेंशन भोगी भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स जो साहित्यकार होने का दावा करते है, सैकड़ों साहित्यकार जो विदेशों में क्रांति करते फिरते है - रह रहें हैं, पर सड़क पर एक भी नीच नजर नहीं आया
हिंदी के शोधार्थी और छात्र जो प्रयागराज, बनारस, केरल, नॉर्थ ईस्ट से लेकर पंजाब हरियाणा के छात्र दिल्ली विवि जेएनयू, जामिया, आंबेडकर, इंद्रप्रस्थ से लेकर इग्नू में मुफ्त की छात्रवृत्ति लेकर पड़े रहते है - दारू और गांजा पीकर, और लौंडियाबाजी करते रहते है, अपने गाइड के लंगोट धोते रहते है, दलित - ओबीसी - आदिवासी की राजनीति करते रहते है - कही नजर नहीं आ रहे, कमाल यह है कि अभिजीत आशुतोष या सौरव को मुंबई से आकर दिल्लीं में योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन करना पड़ रहा है, ये दिल्ली के लोग मर क्यों नहीं जाते मुंह काला करके
कहा ना हिंदी का छात्र हो, हरामखोर मास्टर हो, प्रकाशक हो, प्रोफेसर हो या साहित्यकार या अकादमी का सदस्य हो - सब सूअर है, विष्ठा खाने में सबसे आगे है, मुफ्त की शिष्यवृत्ति, फेलोशिप, विदेश यात्रा लेने में आगे है, चापलूसी में आगे है, जुगाड़ की नौकरी लेने में आगे है, पर एक नम्बर के कायर है - धूर्त है
हिंदी के दलितों को यह भी होश नहीं कि मप्र शासन के AG ने हाई कोर्ट में बड़ा खेला करके ओबीसी आरक्षण सत्ताईस प्रतिशत नहीं होने दिया, किसी की पोस्ट नहीं दिखी, नौकरी लेने भिखमंगों की भीड़ लग जाएगी पर लिखने से फटती है सबकी
केंद्रीय विद्यालय से लेकर नवोदय और सरकारी स्कूलों के मास्टर तो इतने कायर है कि अपना पोस्टिंग बचाने, बीबी, बच्चों को बचाने में ही पूरा समय बीता देते है, और बकलोली में इतने घाघ है कि लगता है कि ये गांधी आंबेडकर से बड़े वाले है
एनजीओ वालों को विदेश मंत्रालय ने FCRA के नाम पर बांस डाल रखा है इसलिए उन बेचारों से अपेक्षा भी नहीं कि वे कुछ बोल भी सकेंगे, पेशाब करने तो कलेक्टर, एसपी, थानेदार, या गांव के कोटवार से पूछकर जाते है तो वे क्या ही सड़क पर उतरेंगे, आखिर मामला सालाना मिल रहे करोड़ों के टर्न ओवर का भी है, हवाई यात्राओं के कम्फर्ट ज़ोन से कौन चूतिया निकलेगा अब, बरसों की मेहनत से करोड़ों की बिल्डिंग, कार्पस आया है, अपने फंड देने वाले के जूते चाटने में इतने उस्ताद हो गए है कि सही गलत का फर्क ही भूल गए है ये
निकालो सब ससुरों को और दो - दो जूते लगाकर दौड़ाओ सड़कों पर सारी क्रांति और मुक्तिबोध, प्रेमचंद, पाश, गोरख पांडे, साहिर से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और लोकगीतों में क्रांति ढूंढने वालों को होश में लाओ
मक्कार कही के

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...