फिल्म उद्योग भारत में हमेशा निशाने पर रहा है और कारण बहुत साफ है कि अंधाधुंध रूपया और कमाई के साथ काले धंधों का जखीरा
पर इस सबमें दुखद यह है कि हम जो मेहनतकश लोग है - उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा -जो टैक्स के रूप ने हम सरकार को देते है, वह इनकी सुरक्षा पर खर्च होता है
इनके काले कारनामों से ये हमेशा ही खतरे में रहते हैं और हमें मूल सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, अब "ज़ेड" श्रेणी की सुरक्षा कोई मजाक नहीं, पर इन्हें दी जा रही है, इनका समाज या देश के विकास में क्या योगदान है - सिवाय भाँडगिरी करने के या आम कैसे खाते है जैसे घटिया सवाल पूछने के अलावा
यह सिर्फ फिल्मी उद्योग ही नहीं, बल्कि धार्मिक गुरुओं, रामदेव से लेकर उन तमाम नेताओं पर भी सवाल है - जो इस श्रेणी की सुरक्षा का लाभ ले रहे है - जैसे मप्र में नरोत्तम मिश्रा जो अभी विधायक, मंत्री तो दूर एक पार्षद या किसी पंचायत के पंच भी नहीं, पर ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा के साथ भोपाल में सरकारी बंगला धारण किए हुए है
सलमान हो, अक्षत, अक्षय या अमिताभ या ये कल का टाईगर या टामी श्रॉफ - इनको क्या जरूरत है और क्यों इन पर इतना फोकस, क्या यह नेताओं की सांठ - गाँठ से अनैतिक धंधे नहीं चला रहे या इतना अकूत धन इनके पास है तो अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकते
जनता को यह सब बहुत नॉर्मल लगता है, पांच किलो की राशन की आंच सब भूला दे रही है - शर्मनाक
दुखद यह भी कि कोर्ट में सबसे ज्यादा ज्ञानी बैठते है पर उन्हें आर्थिक स्थिति समझ नहीं आती या वे दुर्लक्ष करते है
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“सब कुछ खो देने के बाद भी ज़िंदगी बची रहती है!” इस एक वाक्य ने बड़े से बड़े संकट काल में सचमुच इस ज़िंदगी को बचाए रखा है। उससे बाक़ी कुछ मिला या न मिला किंतु ख़ुद को साहित्य में खपा डालने की दृढ़ इच्छाशक्ति ज़रूर मिली। जितने भी आर्थिक, मानसिक और सांसारिक नुक़सान मुमकिन थे, उन सबको झेलने के बाद अपना पढ़ना और लिखना बचा रहा। इस प्रक्रिया में रिश्तों का जो नुक़सान हुआ वह अथाह है। जिन लोगों को हम बचपन से स्नेह और प्यार करते आए थे, वे हमसे सिर्फ़ दूर ही नहीं हुए, बल्कि हर सीमा के पार तक हमारे प्रतिद्वंदी और बड़ी हद तक दुश्मन जैसा हो गए। और जब उन्हें मुड़कर देखने की कोशिश की तो लगा जैसे हम एक दूसरे को कभी जानते ही न थे। जो सगे थे, भाई और बहिन सभी, जिनके बग़ैर एक समय में जीने की कल्पना दुष्कर प्रतीत होती थी, वे सब अब हमारे सरीक, प्रतिद्वंदी और शत्रु जैसे हैं। जिनपर हम अधिकार मानते थे, वे हमसे ऐसी रंजिशें रखे हुए हैं मानों उन्होंने हमारा सबकुछ न हड़पा हो बल्कि जैसे हमने उनका कुछ खाकर न लौटाया हो।
कभी मन मानने लगता है, जैसे कोई अदृश्य शक्ति हमारा इम्तिहान लेती है, और हमें बार-बार असफल होते देखना चाहती है। इन दुश्वारियों के बीच हमारे पास एक ऐसी सफलता बाक़ी है जिसे शायद ही कोई छीन सके। हम अपने इस शरीर को लिखने के काम में लगाए रह सकते हैं। जिस रोज़ यह छूटेगा, वह ज़िंदगी का सबसे मुश्किल दिन होगा। दूधनाथ सिंह ने सुमित्रानंदन पंत पर किताब लिखी है: लौट आ, ओ धार! यह पुस्तक इस बात की सूचना है कि जब कोई लेखक अपनी धार खो देता है तो किस अकल्पनीय तकलीफ़ से गुजरता है!
असल में वही व्यक्ति के चूक जाने की सूचना है, इसके बाद वह मृत्यु के इंतज़ार में गर्क होने लगता है। तब गुजर चुके रिश्तों की निरर्थकता का सही एहसास भी होता है।
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देश को कमजोर कर रहे है राहुल गांधी "विदेशी हाथ" की सहायता से - भाजपा अध्यक्ष
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बिल्कुल सही, राहुल के पास सिर्फ हाथ है पर परम श्रद्धेय नरेन्द्र मोदी ने सन 2014 से लकदक कपड़ों और दस - दस लाख के सूट पहनकर, दुनिया के सबसे महंगे गजट के साथ और सबसे महंगे हवाई जहाजों में सशरीर विश्व के कोने - कोने के जाकर बोफोर्स, नोटबंदी, टैरिफ, तेल लेने के लिए अदाणी और अंबानी के साथ पूरी जान लगा दी और ये सिर्फ दो चार उदाहरण है, उत्तराखंड की सुरंग से मजदूर निकालने किसको बुलाया था - याद है या भूल गए - ये विदेशी हाथ ही थे बाबू मोशाय
और तुम्हारे बंदे का घूमने और कपड़े पहनने का शौक अभी भी पूरा नहीं हुआ, जब प्रचारक था और विशुद्ध बेरोजगार - तब भी व्हाइट हाउस के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवाई थी, अभी भी हर देश में जाकर कहता है कि यहां से उसका पुराना नाता है और वहां तथाकथित सर्वोच्च पुरस्कार ले आता है - यह कौनसा हाथ है भाई
भाई नवीन, जरा अपने लोगों को एक बार देख लेते, अभी एकदम ताजे - ताजे अध्यक्ष बनें हो, थोड़ा लिख - पढ़ लो, समझ बनाओ, और विदेशी हाथ का तो बोलो मत, तुम्हारे सीजेआई से लेकर केचुआ तक विदेशों में जा रहे है डिग्री बांटने से लेकर बैडमिंटन खेलने भी और आकर यहां जनता जनार्दन से स्वागत करवाते है फिर
नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में जापान, फ्रांस, अमरीका, चीन से लेकर तमाम दुनियाभर के ऐरे - गैरे नेताओं को बनारस की गंगा में डूबकी लगाकर और उनका जुलूस निकालकर देश में सौदे किए है Investment के नाम पर, उससे रोजगार तो एक को भी नहीं मिला - बल्कि जो देश में लोहे - पीतल या मिट्टी की चिड़िया बची थी, वह भी उनको सौंप दी, फसलें बर्बाद कर दी, पहाड़ खोद दिया, जंगल उजाड़ दिए - और तो और भाजपा के शिवराज से लेकर योगी तक जितने नेता हाथ पसार कर आये दिन विदेश जाते है कि कुछ दे दो - उतना तो अफ्रीका के भुखमरी वाले देश भी नहीं जाते कही कटोरा उठाकर, और नवीन बाबू बिल गेट्स से हुई आई AI वाली बात भूल गए क्या, बिल गेट्स मिरांडा फाउंडेशन के डॉलर्स से आज तुम्हारे स्वास्थ्य विभाग का बजट चल रहा - "वरना शहर में गालिब की आबरू क्या है"
थोड़ा चरणामृत पियो, तुमने तो अठारह दिन का ब्रह्मचर्य व्रत नहीं रखा ना और एक बार सारे वीडियो तसल्ली से देखो, ये तुम्हारे ही कार्यकर्ता है - जो नौकरी और वोट का अधिकार मांग रहे है
लंबी दूरी तय करना हो तो सिर पर बोझ कम रखते है मालिक
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