Skip to main content

Alok Shukla, Khari Khari, Man Ko Chiththi, Drisht Kavi and other Posts from 14 to 16 Oct 26

Death - The Ultimate Winner, The Invincible Warrior
________
Death is the ultimate winner - the one warrior no soul can defeat, Every victory, every defeat, every conquest is temporary ; only death has the final word
You may conquer the world, fulfil every dream, and possess everything you desire, Yet, in the end, death claims the final victory,
No crown, no power, no wealth, no glory can buy immortality
So, fight fearlessly, Chase your dreams, Stand your ground, Never surrender while life still breathes within you
For life is a battle to be fought, and death, the final truth to be accepted, We spend our lives conquering the world, only to discover that nothing was ever ours to keep forever
And yet, a fighter never retreats merely because the final battle awaits, as the famous poet Robert Browning says -
“I was ever a fighter, so - one fight more, The best and the last"
***
"सदैव न्याय के पक्ष में रहो, कानून का पक्ष हमेशा सापेक्ष होता है, फीस के लिए नहीं पर सच्चाई के लिए लड़ो, लड़ना जरूरी है, हम सब पूरे जीवन आरोप - प्रत्यारोप से जूझते रहते है, पर लड़ाई का माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए, गलत हमेशा सापेक्ष होता है - फिर भी लड़ना जरूरी है, सच बोलना बहुत कठिन है पर झूठ को सच ना बोलना पड़े यह कोशिश बनी रहें"
***
यदि सब आपसे खुश है और आपकी सबसे पटरी बैठती है तो मुआफ़ कीजिए आप बहुत गड़बड़ आदमी है और एकदम धूर्त, एक बार अपनी रीढ़ की हड्डी देखिए - है या नहीं या घिस गई है सबके सामने झुक - झुककर
आपका चर्चा और विवाद में रहना ही आपके काम की पूर्णता और सफलता है - चाहे फिर साहित्य की बात हो, सामाजिक हो, राजनैतिक या कुछ और काम, ये निरुद्देशय काम वही लोग करते है जिन्होंने सब बेच दिया है और जमीर हाथ पर रखकर बेचवाली के धंधे में शामिल है
यदि आपको सुबह उठकर एक चिंता नहीं घेरती या कोई तनाव नहीं होता - अर्थात दिल तेजी से नहीं धड़कता तो फिर आप सिर्फ खा - पीकर जी रहे है, मटर गश्ती कर रहें है, मनुष्य जन्म जाया कर रहें हैं
यदि आपके काम, संपर्क और दायरे वृहद नहीं, सोच और सपने बड़े नहीं तो अपने जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य के बारे में दूसरों को ज्ञान का रायता पिलाने से बड़ी मूर्खता कोई नहीं
इसलिए अपनी पसंद की जिंदगी जिये, सारे भ्रम, लोक - लाज और लिहाज छोड़कर उन्मुक्त होकर जिएं, वर्जनाएं तोड़े और अपने मन का काम करें - क्योंकि जीवन एक ही है - ना पिछला जन्म था, ना अगला जन्म कभी होगा बस जो है - आज है और अभी है
[ इस कदम के पेड़ को दर्जनों बार पुष्पित - पल्लवित और पतझड़ में भीगते हुए देखा है, पर यह सिर्फ अपना काम करता था - कभी किसी पारितोष के लिए झुका या तन कर खड़ा नहीं हुआ ]
***
पहाड़ मुझे बार - बार यह एहसास करवाते हैं कि तुम्हारी औकात क्या है और कितने बौने हो अपने पूर्ण स्वरूप में भी - अपना सारा दर्प चूर हो जाता है - विशालता के आगे अपनी तुच्छ महत्वकांक्षाएं कुछ नहीं है, वहां की हवाओं में जो खुमार है - वह अप्रतिम है, पहाड़ पर चढ़ते - उतरते समय दिमाग बहुत सतर्क रखना पड़ता है - जहां भी आपने थोड़ा भी इधर - उधर किया तो सीधे आप इतने गहरी खाई में गिरेंगे कि इहलीला ही खत्म हो जाएगी और सबसे अंत में भीड़ और दुनिया - जहां से दूर होकर अपने - आपसे एकाकार होने का मौका होता है
***
जीवन में जन्म के बाद से ही हार - जीत का सिलसिला चालू हो जाता है, हर पल प्रतिस्पर्धा - कभी बाहरी लोगों से, कभी अपने आपसे और कभी आने वाले कल के लिए, बीते हुए अतीत से, इस सबमें हम लगातार हारते है और बहुत कम बार जीतते है पर यह भूल जाते है कि जीवन में सारे संघर्ष और लड़ाईयों, तर्क और कुतर्कों के बाद भी मृत्यु से हार जाना ही सबसे बड़ी हार है इसलिए अब लगता है कि जीवन भर मिलने वाली जीत हो या पराजय सब क्षणिक, मानसिक और बल्कि मनोवैज्ञानिक है - असली पराजय मृत्यु के समक्ष होती है जब हम बेबस और लाचार हो जाते है और पंच तत्वों में मिलकर प्रकृति से एकाकार हो जाते है, वो कहते है न - "Until death all the defeats are psychological"
***
प्रभावी और बौद्धिकता से लबरेज शख्स थे, और खूब बिजी रहते थे - सुबह से देर रात तक, समय मिलता तो पूजा पाठ, भोजन या नित्य क्रियाएं कर लेते - वरना सारा समय यूँही गुजर जाता था
नब्बे की उम्र में भी सक्रियता दर्शनीय थी और आप उन्हें सशरीर मोबाइल को हाथ में लिए देख सकते थे, मतलब चार्जर प्लग से अलग ही नहीं होता और मोबाइल की भी हिम्मत थी, ये श्रीमान जी तीन सौ बारह समूहों के एडमिन थे, दो हजार के करीब समूहों के मेंबर थे और हर बात का हर समूह में तीस सेकेंड में नहीं तो डेढ़ मिनट में जवाब दे ही देते थे, आप अज्ञेय की किताब पीडीएफ करो या विश्व बैंक की रिपोर्ट या किसी अफगानिस्तान की समस्या का विश्लेषण - उनकी त्वरित टिप्पणी, साथ में लम्बा कमेंट और अंत में संलग्नक के साथ सात - आठ पीडीएफ चस्पा कर देते थे
मतलब गजब का बंदा था, घर की बहु, नाती, पोते और बाकी लोग कहते कि बुढ़ऊ ने वाईफाई का पूरा मजा लिया है और सतत ले रहा है, क्या ही किया जाए, इधर कविताएं लिखने का शौक बढ़ गया है और अब वे कविताओं पर भी बोलने लगे हैं - भयानक और भयंकर तरीके से
भगवान सदबुद्धि दें और झेलने वालों को प्रचंड शक्ति कि देवी आराधना के इस शीर्ष मौसम में उन्हें यथा योग्य तरीके से झेल लें और उनके हर कर्म को देखें - समझें और प्रतिक्रिया दें
***
बहुत फिट आदमी था, कभी उसे गुस्सा करते नहीं देखा, छह बच्चे थे - पांच लड़कियां और एक लड़का, चार लड़कियां नौकरी करती थी, एक की शादी हो गई थी, बेटा सबसे छोटा था जो तीसरी में पढ़ रहा था, सबसे बड़ी बेटी - जिसका ब्याह हो चुका था, उसमें और बेटे में अड़तीस साल का अंतर था, बच्चे की पढ़ाई का खर्च दामाद ही उठा रहा था
बंदा फिट था, शहर के गांधी हाल से श्मशान घाट तक मिल जाता था मुस्काते हुए, कोई दुश्मन नहीं था - शहर, मीडिया, क्लबों, संस्थाओं या स्कूल या अस्पताल में - हैरानी होती थी कि पटवारी से लेकर विभागों के बड़े बाबू तक उसका रसूख जानते थे
क्या काम करता था - किसी को भी नहीं मालूम, पर लीचड़ था और गधा हम्माली से लेकर बौद्धिक तक देने में माहिर था, कई एनजीओ की खाक छान चुका था, शहर का कोई स्कूल नहीं छोड़ा - जहाँ पढ़ाया ना हो और कोई संस्था नहीं जिसको ठगा ना हो
आज फिर दिख गया तो बोला - अज्ञेय कहते है ना - "मै मरूँगा सुखी, मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है" बस ही ही ही करके हँसता हुआ निकल गया, समझ यह आया कि जीवन को जितना हल्का लेंगे और कैजुअल उतने ही मजे से जीवन कटेगा
***

बहुत साल पहले की बात है, एक किशोर फेसबुक पर जुड़ा, बातचीत होती रही वो पढ़ता रहा और बातचीत का एक कारण था उसकी सीखने की ललक - साहित्य हो या दुनियादारी की, अंग्रेजी में एमए किया और फिर जब मैंने लॉ पूरा किया और कोर्ट - कचहरी की बातें होने लगी , कानून और न्याय के संदर्भ में देश काल एवं परिस्थितियों की बात होने लगी तो उसे भी लगा कि लॉ एक बेहतर क्षेत्र है जहां कैरियर भी है, लगातार पढ़ना भी है और जो समाज के वंचित और दबे - कुचले लोग है, उनके लिए कुछ सार्थक भी करना है
लखनऊ विवि से लॉ करने की ठानी और फिर मेहनत शुरू, लगभग हर हफ्ते बात हो जाती कि क्या पढ़ा, क्या केस है, सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है, दुनिया के कानून क्या कहते है, समाज का क्या नजरिया है और इस सबमें एक वकील की क्या भूमिका है, अभी अप्रैल में जब AIBE का नोटिस आया तो यह तय हुआ कि परीक्षा दी जाए और पास भी हुआ जाए, बल्कि मुझे रोज अलग - अलग नोट्स भेजकर गाइड किया गया किया " दादू, ये पढ़ लो, ये केस के बारे में एक प्रश्न आयेगा", हम दोनों ने परीक्षा दी और धड़कते दिलों से परिणाम का इंतजार किया और आखिर जब परिणाम आया तो दोनों पास हो गए
यह खुशी की बात थी, अभी इन महाशय का उत्तर प्रदेश की राज्य बार काउंसिल में पंजीयन भी हो गया और कल अपने वरिष्ठ अधिवक्ता ने इन्हें अधिवक्ता बैंड और कोट भी पहना दिया, बस इतना कहना है कि आलोक बाबू, - "सदैव न्याय के पक्ष में रहो, कानून का पक्ष हमेशा सापेक्ष होता है, फीस के लिए नहीं पर सच्चाई के लिए लड़ो, लड़ना जरूरी है, हम सब पूरे जीवन आरोप - प्रत्यारोप से जूझते रहते है, पर लड़ाई का माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए, गलत हमेशा सापेक्ष होता है - फिर भी लड़ना जरूरी है, सच बोलना बहुत कठिन है पर झूठ को सच ना बोलना पड़े यह कोशिश बनी रहें" लखनऊ हाई कोर्ट सीखने और प्रैक्टिस करने की बेहतरीन जगह है, आगे सुप्रीम कोर्ट बाट जोह रहा है
अपने नाम के अनुरूप दुनिया में सत्य और निष्ठा का आलोक फैलाते रहो, तुम्हारी लंबी यात्रा, संघर्ष और बाकी रोज की जद्दोजहद का मैं साक्षी रहा हूँ, खूब जियो, स्वस्थ रहो, मस्त रहो, और मजे करो, बस फीस का पचास प्रतिशत इधर ट्रांसफर करते रहना बिट्वा
शुभाशीष

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...