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देवास में 22/12/13 को संपन्न कबीर मिलन समारोह

















बात बहुत पुरानी तो नहीं पर पिछली सदी का अंतिम दशक था जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थी. एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गाँवों में कुछ लोग खासकरके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते है और रात भर बैठकर गाते ही नहीं बल्कि सुनते और गाये हुए भजनों पर चर्चा जिसे वे सत्संग कहते थे, करते है. यह थोड़ा मुश्किल और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के. थोड़ा थोड़ा जुड़ना शुरु किया, समझना शुरू किया, पता चला कि कमोबेश हर जगह हर गाँव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है. बस फिर क्या था दोस्ती हुई और जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है. 

स्व नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और देश के कई राज्यों में बरसों से जारी है और स्व पंडित कुमार गन्धर्व ने भी इसी मालवे की कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित होकर बहुत कुछ नया गुना, सूना और बुना था. बस फिर दोस्ती हुई नारायण देल्म्या जी से जो तराने के पास के गाँव बरन्डवा के रहने वाले थे वे हमारे गुरु बने, फिर प्रहलाद सिंह टिपान्या जी से दोस्ती हुई धीरे धीरे हमने देवास में एकलव्य संस्था में एक अनौपचारिक "कबीर भजन एवं विचार मंच" की स्थापना की. हमारे साथी स्व दिनेश शर्मा इस काम में जी जान से जुट गए और हम लोग भी साथ में थे. हमारे साथ डा राम नारायण स्याग थे, मार्ग दर्शन के लिए.

हर माह की दो तारीख को आसपास की मंडलियाँ आती भजन गाती और सत्संग होता. बहुत वैज्ञानिक धरातल पर बातचीत होती थोड़ा शुरू में विवाद हुआ क्योकि जिन पाखंडों और दिखावों का कबर विरोध करते थे ये मंडलियाँ उन्ही बातों को करती थी फिर लम्बी चर्चा होती और धीरे से हम सीखते कि इस वर्ग में चेतना बहुत जरुरी है और यह कबीर के माध्यम से निश्चित ही आ सकती है. भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमने एक छोटा सा दस्तावेजीकरण करने का कार्य अपने हाथों में लिया जिसमेहम इस वाचिक परम्परा को लखित रूप में दर्ज कर रहे थे. होता यह था कि दिनेश मै या अन्य साथी कबीर मंडलियों के साथ बैठते और जो वो गाते या बोलते थे या उनके पास कोई डायरी होती हम उसमे से लिख लेते उसे टाईप करा लेते और फिर कबीर के मानकीकृत बीजक में से मिलान करते और फिर मंडलियों से चर्चा करते कि यह शब्द क्यों बदला गया या अर्थ क्या है आदि आदि. 

प्रहलाद जी की पहली भजन के कैसेट डा सुरेश पटेल के साथ हम लोगों ने सतप्रकाशन इंदौर से बनवाई थी और फिर यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसका जिक्र करना ही मुश्किल है. गत वर्ष प्रहलाद जी को पदम् श्री से विभूषित किया गया है. इस बीच कबीर भजन विचार मंच का काम बहुत आगे बढ़ा तथाकथित कबीर पंथियों को इस कार्यक्रम से दिक्कतें भी हुई. 


 बीच स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका से प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ हमसे एक बार आकर मिली तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा और फिर उन्होंने ऐसा काम हाथ में लिया कि पिछले दस वर्षों से वो यही काम आकर रही है. उन्होंने कबीर की वाचिक परम्परा का गहरा अध्ययन किया, उन्होंने कबीर भजनों का अंग्रेजी में अनुवाद किया ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई है. इस बीच वे प्रहलाद जी को अमेरिका ले गयी. वहाँ उनके कार्यक्रम कई विश्व विद्यालयों में करवाए है. प्रो. लिंडा ने खुद हिन्दी सीखी और गहरा काम किया आज वे देश विदेश में कबीर की वाचिक परम्परा की विशेषग्य है.


आज अपने शोध के दस वर्ष पुरे होने और काम ख़त्म होने का उन्होंने एक अनूठा काम किया. आज देवास में ढेरों कबीर मंडलियों को स्थानीय मल्हार स्मृति मंदिर में बुलाकर सुना, उन्हें कुछ नगद राशि दी और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया. उनकी नई किताब भी आ रही है. यह कठिन काम करके वे अपने देश में एक नया उदाहरण बन गयी है. एक ओर जहां हमारे विवि में लोग कुछ भी शोध करते रहते है जिसका कोई ओर छोर नहीं होता वही लिंडा ने एक अनजान देश में नई भाषा सीखकर एक लुप्त प्रायः होती परम्परा को पुनर्जीवित किया और उसका दस्तावेजीकरण करके दुनिया के सामने कबीर की नए तरह से व्याख्या सामने रखी. साथ ही मालवा के उन लोगों में कबीर को लेकर एक नया अलख जगाया जो संभव नहीं था. शबनम वीरमानी ने भी इसी तर्ज पर चार फ़िल्में बनाई है जिनका जिक्र फिर कभी बहरहाल आज के इस कबीर मिलन समारोह की तस्वीरें आपके लिए. एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस कार्यक्रम में शिरकत करने विदुषी कलापिनी कोमकली विशेष रूप से उपस्थित थी और उन्होंने निर्गुण शब्द और निर्गुणी भजनों की बात में शब्द और विचार को महत्त्व देते हुए दो भजन सुनाये. 

देवास में बगैर शोर शराबे के संपन्न हुए इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जो सादगी और भव्यता थी वो मेरे लिए अकल्पनीय थी. प्रो लिंडा हैज़, राजीव नेमा, प्रहलाद जी, कलापिनी, कैलाश सोनी, अरविंद सरदाना, मित्र बहादुर, दिनेश पटेल और डा प्रकाश कान्त, संजीवनी ताई, जीवन सिंह ठाकुर, अविनाश गोडबोले, उपकार, विवेक, नमन जोशी, आदि गणमान्य लोगों की वजह से यह आयोजन ऐतिहासिक बन गया.

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