|| कैसे आसमा में सुराख हो सकता नही || ◆◆◆ जोधपुर और दिल्ली आईआईटी के दो होनहार गोल्ड मेडलिस्ट, पढ़ाई के तुरंत बाद नौकरी की, दुनिया घूमें, उत्तरी अमेरिका भी रहें और भारत भर भी, बाद में मप्र के बडनगर जैसे छोटे से ब्लाक में आकर बस गए, कारण था यहाँ की जमीन और खुशनुमा वातावरण –पढाई के दौरान अर्पित का दोस्त यहाँ से था और उसके माता - पिता यहाँ रहते है, बस और कोई कारण नहीं - ना कोई रिश्तेदार, ना ही दोस्त - बस एक परिवार, चार साल पहले यहाँ आये और यही के हो गए, साक्षी बताती है कि आठ साल पहले वह लुन्याखेड़ी आई थी - कबीर जयंती, पर तब ही से मालवा की मिटटी की सौंधी महक हमेशा उसके जेहन में बनी रहती थी, अर्पित से बात हुई जो बाद में एक - दूसरे के हो लिए हमेशा हमेशा के लिए... इस तरह से जमीन और वातावरण में रहकर सिर्फ अपना उगाया हुआ खाने की शुरुवात हुई ••• अर्पित और साक्षी ने बडनगर में साढ़े तीन बीघा का एक टुकडा खरीदा और पहले दो साल जमीन को जैविक बनाया, बहुत मेहनत लगी क्योकि जमीन रासायनिक खाद से इतनी परिपूर्ण थी कि इलाज मुश्किल था, इस दौरान दोनों ने कुछ पेड़ लगाए और पिछले हिस्से में एक तालाब बनाया - ताकि...
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