Skip to main content

Kuchh Rang Pyar ke, Drisht Kavi - Posts of 3 May 2022

 || ईद की दिली मुबारकबाद ||

•••
और आख़िर चाँद दिख ही गया, ख़ुशी हुई
इस बार पूरे माह रमज़ान के रोजों ने तड़फा दिया था, रोज शाम होते ही रोज़ा छूटने का इंतज़ार रहता कि अब सब लोग पानी पी सकेंगे, इफ्तारी करेंगे - दिन भर की चिलचिलाती धूप, गर्मी, पानी और बिजली की दिक्क़तें इस सबके बीच कड़क रोज़े और रोजेदारों का धैर्य एक कड़ी तपस्या ही है और हर साल यह परीक्षा कड़ी होते जा रही है जैसे जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, पूरे माह अपनी कक्षा के मित्रों को, प्राध्यापकों को, मित्रों को, बचपन के दोस्तों को, काम से जुड़े और प्रोफेशनल रिश्तों से जुड़े मित्रों को फोन लगाकर ख़ैर खबर लेता था कि सब भालो ना
बहरहाल, एक पाक माह गुजर गया और अपने पीछे लाखों किस्से छोड़ गया, देश दुनिया ने इतना कुछ देख समझ लिया और भुगत लिया कि कहना मुश्किल है, यूक्रेन - रूस युद्ध से लेकर खरगोन और दिल्ली के प्रायोजित दंगों ने मन खट्टा कर दिया था, दुर्भाग्य देखिये कि खरगोन में कल ईद बंदूक और कर्फ़्यू के साये में मनेगी , कैसा दहशतज़दा और मनहूस समय हमने बना दिया है
ख़ैर, ईद की दिली मुबारकबाद सबको और बधाईयां भी - दिल के दाग़ धो - पोछकर ईद मनाये, ख़ुश रहें और खुशियाँ बांटें सभी में - जो कुछ भी हुआ उसको लेकर एक नागरिक के तौर पर मैं बेहद शर्मिंदा हूँ और अफसोस प्रकट करता हूँ पर हम सब एक है और ये चंद सिरफिरे लोग और पथ से भटके सत्ता के भूखे नुमाइंदे कुछ नही कर सकते, सदियों पुरानी हमारी एकता, गंगा जमनी तहज़ीब इनसे नही टूटने वाली है
ईद मनायें, खुशियाँ बांटें और यह समझे कि सिवइयां रिश्तों की तरह ही नाजुक होती है उन्हें मिठास, दूध और मेवों से ही बचाया जा सकता है
आप सबको खूब प्यार, मोहब्बतें और दुआएँ
पुनः सबको ईद मुबारक, यह हम सबका त्योहार है जैसे वाल्मीकि जयन्ति, बिरसा मुंडा जयन्ति, दीवाली, होली, क्रिसमस, गुरुनानक जयन्ति या कोई और त्योहार
***
"साले इतने जूते पड़ेंगे ना कि अगले हजार वर्षों में कोई कविता नही लिखेगा खानदान में तेरे" आज इसको सुनाना ही थी , सो फोन लगाया भर दोपहरी में
"अग्रज हुआ क्या, इतना गुस्सा क्यों" - लाईवा ने जवाब दिया
"साले हरामखोर, ये ऑर्गेनिक कविता क्या होती है बै - 155 कविताओं का पीडीएफ अभी भेजा तूने, एक तो वैसे ई गर्मी ऊपर से ये ऑर्गेनिक, तू है कहाँ ये बता " - मेरे तन - मन मे आग लगी थी
"अच्छा, वो पीडीएफ, अरे आजकल सब ऑर्गेनिक ऑर्गेनिक करते है - आम, जाम, फल - फूल, पेड़, घोंसले, सब्जी, राशन, खेती, कपड़े और दवाई भी, तो मैने सोचा कि क्यों न कविताएँ भी ऑर्गेनिक हो - ताकि पचने में सहज और सुलभ होगी सबको, बस यही सोचकर ऑर्गेनिक कविताएँ आपको भेजी, एक बार पढ़िए तो सही, चाँदनी सी शीतलता महसूस होगी" - लाईवा जोश में था
"ठहर तेरी ईद मनाता हूँ, अभी तेरे घर पर आता हूँ" - मैं बगैर लायसेंस का कट्टा ढूंढ रहा था आलमीरा में अब

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...