बाजारों में काफी रौनक थी और सब सजी धजी दुकानों में माल की बिक्री जम कर हो रही थी तरह तरह के माल मौजूद थे और बेचने वाले भी जैसे जादूगर थे सब कुछ बेच देते थे एक बार तो दोस्त यार, परिवार को भी बेच दिया दूकान की प्रतिबद्धता जबरदस्त थी सब लोग एक दूसरे को जितना नीचा दिखा सकते थे उतना तो कर ही देते थे बस हद तो तब थी जब इन्होने अपना जमीर भी बेच दिया रीढ़ की हड्डी जो नहीं थी (एनजीओ पुराण भाग ६३)
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