गांव में जब वो ग्यारहवी की परीक्षा में पूरक पा गया तो भाग आया एक संस्था में फिर वहा चाय पानी बनाने लगा और धीरे धीरे सब "काम" सीख गया, एक लडकी पटाई, पर मामला जमा नहीं फिर अपनी जाति की नौकरी वाली लडकी से शादी कर ली, कई जगह काम किया और खूब नक़ल करके लेख लिखे, छात्रवृति कबाड़ी और पुरस्कार भी जुगाड़े, बीबी की नौकरी थी ही, बस तीन चार मकान बना लिए, आजकल प्रदेश के व्यापारिक नगर में ज्ञान की दूकान चलाता है जय हो(एनजीओ पुराण भाग ३४ समाप्त)
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