वो और ये एक ही दूकान पर थे, प्रेम होना स्वाभाविक था बस धीरे धीरे पींगे बढ़ी और इश्क ने अपना पूरा चक्र समाप्त किया, शादी तो कर ली पर ना जमाने से ना घर से स्वीकृती मिली बस एक एसडीएम को खुश करके एक कागज़ का टुकड़ा ले लिया, फिर क्या था शहर बदला दूकान बदली . यही तो है दूकान में काम करने का फ़ायदा सारे नफे नुकसान एक तरफ और समाज सेवा एक तरफ(एनजीओ पुराण भाग ४४ समाप्त)
The World I See Everyday & What I Think About It...
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