वो दिल्ली से पत्रकारिता पढकर आया था और इसी दूकान में लग गया, खूब झमाझम भाषण देता और जमकर विचारधारा का बखान करता. बाद में पता चला कि वो तो देश्प्रेमियो की संस्था का नुमाइंदा था जो इन प्रगतिशीलो के पास रहकर देशप्रेम का सबुत दे रहा था, उसे निकाल तो दिया कामरेडों ने पर बाद में प्रदेश में एक राज्य सरक्षण से जुडी दूकान पर काम करने लगा बस आजकल उसी का मालिक है(एनजीओ पुराण भाग ५२ )
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