"ज़िन्दगी से शिकायतें कैसी अब नहीं हैं अगर गिले थे कभी भूल जाएँ कि जो हुआ सो हुआ भूल जाएँ कि हम मिले थे कभी" ◆ अहमद फ़राज़ #ProposeDay *** ये हिंदी के वो लोग है जो लुगदी लिखते, ओढ़ते, पढ़ते एवं बिछाते है, ये वे है जो गूदा / गुदा पर लिखवाते है और खुद घटिया उपन्यास लिखकर प्रसिद्धि पाना चाहते है, इन्होंने कब्ज़ा कर रखा है इंडिया टूडे से लेकर तमाम साइट्स पर और प्रकाशन गृहों पर, चार - छह कुत्ते बिल्ली टाइप फर्जी लेखक पालकर ये आत्म मुग्ध बने रहते हैं, ये वे अश्लील लोग है जो प्रगतिशील कहलाते है, इनके घरों में ना महिलाएं है और ना बच्चे - जो इस तरह से घटियापन की सीमाएं पार करके अपनी औकात दिखा रहें है कमाल है आग्नेय की बुद्धि पर और विलक्षणता पर जो हर बार किसी ना किसी मूर्ख को सम्पादकीय दे देते है , मतलब यह कि आग्नेय खुद भी निम्न स्तर के घटिया कवि थे, है, और रहेंगे हमेंशा यह सारी आग पुस्तक मेले में अपनी आत्म मुग्ध किताबों को बेचने के जतन है क्योंकि जो घटिया है वही दिखेगा और वही बिकेगा बेहद शर्मनाक है शर्मनाक है , मुझे ना कविता नही समझती और ना कवि हूँ पर यह जरूर जानता हूँ कि यह नीचता कवित...
The World I See Everyday & What I Think About It...