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नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 13

आज ना जाने क्यों एक बहुत करीबी मित्र से अभी हुई बातचीत में "हर्ष' का जिक्र निकल आया...........हर्ष ने बहुत गंभीरता से प्यार किया था और अपना जीवन पूरा दे दिया, उसकी हर जिद के आगे हर उस मांग को पूरा किया जो उसने की थी - चाहे वो जायज थी या नाजायज, बौद्धिकता के स्तर पर हर्ष ने उसे सहारा दिया लंबी बहसों और चर्चाओं से उसके दिमाग में जीवन के छोटे से छोटे पहलू से लेकर फिल्मों के, दर्शन, साहित्य, विश्व, प्रकृति, समाज, अर्थ और हर वो बात समझाई जो उसने दिल्ली के उस महान महाविद्यालय में अंगरेजी साहित्य पढते  समय सीखी और पढ़ी थी. कालान्तर में उसने ये सब अपने लगातार हासिल किया अनथक मेहनत से और श्रम से .......पर आखिर में हर्ष के आगे अपनी कुर्बानी के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचा...........शराब और जीवन के घालमेल के बीच ज़िंदगी के कतरे कतरे सुख कब उड़न छू हो गये हर्ष को  पता ही नहीं चला, अवसाद, तनाव और कुंठाएं उसके जीवन के स्थायी भाव बन गये थे, उम्मीद भरी निराशा का ओर-छोर भी उसे पता चल रहा था. अचानक एक दिन उस मेधावी हर्ष को उसकी जिद के आगे जान देनी पडी......पर उसने उसके इस बलिदान को भी भुना लिय...

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होतहै, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा , "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई....फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ  संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़ि...

सलाम इस जज्बे और लड़ाई को............

कोठियों से मुल्क की मैयार को मत आंकिये असली हिन्दुस्तान तों फूटपाथ पर आबाद है.

"देश के हालात और नई राजनीति" विषय पर चर्चा में जयश्री

आजादी के बाद दो करोड हेक्टेयर भूमि का हस्तांतरण अभी तक बड़े लोगों को हो चुका है जिसमे उद्योग, और बड़े घराने शामिल है, दस में से सात करोड जोतों को (सीमान्त किसान जिनके पास ढाई एकड़ से कम जमीन है) को अपने जमीनों से बेदखल किया गया है, और ये सब सरकारी आंकड़े है. आदिवासी जो सिर्फ बाजार में नमक और केरोसिन लेने आते थे और एक सौ तीस प्रकार के खाद्यान्न और सब्जी एक बरस में खाते थे. आज सिर्फ बीस-पच्चीस प्रकार की चीजें ही खा पा रहे है क्योकि मार्केट उनके रसोई तक घूस गया है और उनकी जीवन शैली को तहस- नहस करके अपना सब कुछ थोप रहा है. कैसे इस नई राजनैतिक  व्यवस्था ने एक स्वालम्बी समाज को परावलम्बी और कर्जे से भरा हुआ समाज बना दिया है. आज जरुरत है कि जो आदिवासी बच्चे और युवा शालाओं में पहुँच चुके है उनके बीच इस स्वालम्बी से पराधीन हुए समाज की बात फैलाई जाये इस विचार को फैलाया जाये कि देश की हालत क्या हो गई है, उनके संसाधन और जल, जंगल, जमीन पर सरकारें, उद्योगपति और सभी पार्टियां कब्जा करके बैठ गई है और लगातार उन्हें खदेड़ रही है. एक नई लड़ाई के लिए विकास और संसाधनों की लूट चुनाव के मुद्दें नहीं बन सकते क...

"देश के हालात और नई राजनीति" चर्चा में सुधा भारद्वाज

देश के छोटे से राज्य छत्तीस गढ़ में दो लाख अस्सी हजार जवान तैनात है इस समय जो आम लोगों, खासकरके आदिवासियों की हर हरकत पर नजर रख रहे है, उनके जीवन में बुरी तरह से हस्तक्षेप कर रहे है, यहाँ के हर गाँव में आदिवासी लोग अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे है और रोज सरकार और इन पैरा और मिलिट्री फोर्सेस से दो चार हो रहे है. ऐसे में कैसे आप विकास की बात कर सकते है और कह सकते है कि नियोगी ने जो छत्तीस गढ़ का सपना देखा था वो पूरा होगा, सभी जन आंदोलन टूट चुके है सारे लोग हाथी के कान, नाक, पूंछ पकड़ कर हाथी सिद्ध करने की कोशिश कर रहे है. नवीन जिंदल जिसकी तनख्वाह एक वर्ष में चौहत्तर करोड रूपये है और जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को जेब में रखता है क्या इन आदिवासियों को स्थानीय संसाधनों पर कब्जा करने देगा........कुल मिलाकर इस पूंजीवाद ने देश के चंद लोगों को संसाधन लूटने की खुली छूट दे रखी है और आदिवासियों को खदेड़ कर वहाँ की सरकार एक नया पूंजीवादी तंत्र स्थापित करना चाहती है. दो लाख अस्सी हजार जवानों की तैनाती क्या दर्शाती है हम किस लोकतंत्र में जी रहे है और कहाँ पहुँचना चाहते है........??? ...

शमीम मोदी, माधुरी बहन, सुधा भारद्वाज, जयश्री और विकास के मुद्दें

  इटारसी में आज विकास के मुद्दों से जुडी चार महिला नेत्रियों को सुनने और समझने का मौका मिला- शमीम मोदी, माधुरी बहन, सुधा भारद्वाज और जयश्री. चित्तरूपा पालित आ नहीं पाई. ये चारों महिला नेत्रियां जमीनी स्तर पर आदिवासियों के साथ जल, जंगल, जमीन और दीगर विकास के मुद्दों पर काम कर रही है. देश की चुनौती और नई राजनीति पर अपने अनुभवों की बिसात पर इन चारों नेत्रियों ने जमकर प्रकाश डाला. शंकर गुहा नियोगी से सलवा जुडूम, नर्मदा बाँध, मनरेगा, जन आंदोलन, आदिवासी शिक्षा, जल, जंगल, जमीन, नवीन जिंदल, राजनैतिक विकल्प, मजदूर आंदोलन और उनका फ्रेम वर्क, रमनसिंह से लेकर अरविंद केजरीवाल और गांधी से लेकर छोटे मोटे नेता तक की बातें हुई. एक बात तों साफ़ थी कि जमीनी अनुभवों से पककर और तपकर आई ये नेत्रियाँ बहुत गंभीरता से सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ लोगों को लामबंद करके काम कर रही है आज ये चार नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं है चाहे बडवानी का आंदोलन हो या सेंधवा का स्कूल हो, छत्तीसगढ़ में दल्ली राजहरा की बात हो या शमीम मोदी का हरदा का आंदोलन हो वन अधिकारों को लेकर. पूरी बातचीत में कई बातों पर...

भारत हमको जान से प्यारा है, सबसे प्यारा गुलिस्ता हमारा है.......

भारत हमको जान से प्यारा है, सबसे प्यारा गुलिस्ता हमारा है....... अरविंद ने बिजली के बिल फाड़े, पचास हजार लोग दिल्ली के ओर कूच कर रहे है दो गज जमीन के लिए, राबर्ट वाड्रा घपले में शामिल, अन्ना का आंदोलन फेल, गैस के भाव बढे, एफ डी आई का प्रवेश, सारे नेता और सरकार भी सरकार से नाखुश, कोयला घपला, छोटी बेटियों के साथ लगातार बलात्कार और हत्याएं, कुपोषण से छोटे बच्चों की मौतें, सद्य प्रसूताओं की मौतें, युवाओं में देश के प्रति विरोध लगातार आक्रोश बढ़ रहा, इरोम शर्मिला का ग्यारह बरसों से लगातार अनशन जारी, सरकार में लोग और मंत्री गण अपने इलाज के लिए लगातार विदेश दौरों पर, रिटायर्ड राष्ट्रपति पर उपहार में मिले उपहारों पर वापसी के लिए आदेश जारी, आरुशी हत्याकांड के अपराधी अभी भी बेखौफ घूम रहे है, सरकारों के मंत्री कई कई प्रकार के कांडों में लिप्त, खाप पंचायतों का कहर जारी, देश में पुलिस नमक व्यवस्था ध्वस्त, सेना के अधिकारी भी भयानक किस्म के षडयंत्रों में शामिल, फिल्मों का सुनहरा दौर, सोशल मीडिया पर लेखकों की भीड़, प्रधानमंत्री चुप, राष्ट्रपति चुप, राज्यपाल चुप, लोकसभा ठप्प, राज्यसभा...