आज ना जाने क्यों एक बहुत करीबी मित्र से अभी हुई बातचीत में "हर्ष' का जिक्र निकल आया...........हर्ष ने बहुत गंभीरता से प्यार किया था और अपना जीवन पूरा दे दिया, उसकी हर जिद के आगे हर उस मांग को पूरा किया जो उसने की थी - चाहे वो जायज थी या नाजायज, बौद्धिकता के स्तर पर हर्ष ने उसे सहारा दिया लंबी बहसों और चर्चाओं से उसके दिमाग में जीवन के छोटे से छोटे पहलू से लेकर फिल्मों के, दर्शन, साहित्य, विश्व, प्रकृति, समाज, अर्थ और हर वो बात समझाई जो उसने दिल्ली के उस महान महाविद्यालय में अंगरेजी साहित्य पढते समय सीखी और पढ़ी थी. कालान्तर में उसने ये सब अपने लगातार हासिल किया अनथक मेहनत से और श्रम से .......पर आखिर में हर्ष के आगे अपनी कुर्बानी के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचा...........शराब और जीवन के घालमेल के बीच ज़िंदगी के कतरे कतरे सुख कब उड़न छू हो गये हर्ष को पता ही नहीं चला, अवसाद, तनाव और कुंठाएं उसके जीवन के स्थायी भाव बन गये थे, उम्मीद भरी निराशा का ओर-छोर भी उसे पता चल रहा था. अचानक एक दिन उस मेधावी हर्ष को उसकी जिद के आगे जान देनी पडी......पर उसने उसके इस बलिदान को भी भुना लिय...
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