देश की आजादी में शरीक होने का श्रेय कांग्रेस हमेशा से लेती रही है और जाहिर है देश की सबसे बड़ी पार्टी थी जिसने लम्बे समय तक देश पर राज किया. इंदिरा गांधी भी आपातकाल में सत्ता हारने के बाद तीन सालों में फिर से पुरी ताकत के साथ खडी हुई और फिर से सत्ता पर काबीज हुई परन्तु पिछले दस बरसों में जिस तरह से इस पार्टी के सितारे गर्दिश में गए है वह शोचनीय है. डा मन मोहन सिंह ने कठपुतली प्रधानमंत्री का रोल बखूबी निभाया यह हम सब जानते है, वे पार्टी की छबि सुधारने के लिए कुछ कर भी नहीं सकते थे. जागरुक होती देश की जनता ने धीरे धीरे कांग्रेस को हाशिये पर धकेलना शुरू किया. भ्रष्टाचार का मुद्दा और अन्ना का आन्दोलन इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ था और फिर जो कांग्रेस की गाड़ी बिगड़ी है वह पटरी पर नहीं आ पाई. सोनिया और राहुल की व्यक्तिगत मिल्कियत बनी पार्टी में प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शरद पवार से लेकर चिदंबरम जैसे नेता थे और आज भी है परन्तु वंशवाद की परम्परा और लगातार लचीले होते अकुशल नेतृत्व के कारण कांग्रेस की दशा आज यह हो गयी है कि एक समय में सहोदर रहे सारे दल भी छिटक कर दूर हो ग...
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