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इक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई ताबिश मैंने एक बार कहा था मुझे डर लगता है.. घर के दरवाजे खोल रखे है मैने,,,, देखते है कौन आता है मुझे मनाने के लिए,,,,,,,,, ये दर्द अपना है ,किसी गैर का नहीं जख्म है , भर जाने दो ... मरहम लगाने कोई आएगा नहीं ...
'फ़िराक' एक-एक हसरत मिट रही है ये मातम रात भर है और मैं हूँ. -फ़िराक
गुज़र जाएगी ज़िन्दगी उस के बगैर भी "फ़राज़", वोह हसरत-ए-ज़िन्दगी है शर्त-ए-ज़िन्दगी तो नहीं!

यह वैराग्य है, मतिभ्रम या मोह भंग

ये शहर जिसका नाम देवास है, इसके गली मोहल्ले कितने बदल गए है, वो चौबारे भी अब खत्म हो गए है जहां मै पला बढ़ा और अब देहलीज से निकल कर अपनी मंजिल की ओर हूँ......हर बार आता हूँ तो एक किसी जगह पर मृत्यु पर संवेदनाएं व्यक्त करने जाना ही पडता है अपने परिचित लोग धीरे धीरे खत्म हो रहे है वो लोग जिनके साये में मै बड़ा हुआ या साथ के लोग जिनके साथ एक साझी विरासत शेयर की थी, या वो लोग जो मेरे सामने पैदा हुए, बड़े हुए और बस स्थापित हो ही रहे थे दुनियादारी सम्हाल ही रहे थे कि काल के विशाल गाल में समा गए.....निश्चित ही मुझे शिकायत है इस शहर से --क्यों लील रहा है इन अबोधो को, अभी अभी एक पुराने मठकरी परिवार में होकर आ रहा हूँ जहां मौत ने एक स्टेप आगे बढ़कर उनकी बेटी को छीन लिया....मौत का क्रन्दन और जीवन पर मौत का परिहास मेरे कानो में गूँज रहा है. शहर में अट्टालिकाएं खडी हो गयी है गाड़ी घोड़े बढ़ गए है, युवाओं के चेहरे की दमक और लक-झक भी बढ़ गयी है पर एक चिर शान्ति मुझे कही दिखाई नहीं दी.हडबड़ाहट है पता नहीं ये कस्बे को क्या हो गया है जीवन में मजे ले लों की तर्ज पर सब कुछ चल रहा है जो गलत नहीं है बस अपने आप क...

उसकी किरचिया धूप में ढून्ढ सकू.........

Ajay Singh बहुत पुराना जिगरी, यार, दोस्त और सखा आज उससे मिला, उसके आलीशान घर में बीबी बच्चो के साथ, कहने लगा कि तू तो साधू हो गया है मै सिर्फ हंस दिया...............क्या कहता..........दुनियावी पैमाने में अनफिट और मोह माया से दूर, ना कुछ पास में ना कुछ हाथ में बस एक छः फीट लंबी जुबान और थोड़ी बहुत अक्ल जिसके सहारे गुजर बसर चल रही है और शायद थोड़ी सी बेहतर सम्प्रेषण क्षमता वो हिन्दी, मराठी और अंगरेजी में- सरकारी स्कूलों में पढ़ी हमारी पीढ़ी के पास यह एक लगभग असेट ही है जिसके सहारे जीवन चल रहा है..धन दौलत, वैभव विलास और अकूत संपत्ति तो है नहीं........कई बार लगता है कि अभी भी समय है कि दुनियावी पैमानों में फिट हो जाऊ और फ़िर से एक नया जीवन शुरू करू और सब कुछ हासिल कर लू पर वो सब कुछ है क्या.........धन दौलत, मोटर गाड़ी, बँगला, पद-प्रतिष्ठा-पैसा या कुछ और.......पता नहीं !!! थोड़े से गुनगुने पछतावे तो जरूर है पर बहुत ज्यादा पश्चाताप नहीं है-- जो है सब ठीक ही है...शायद इससे बेहतर कुछ हो सकता था, पर अब तो यह मानने लगा हूँ कि जो घर जाले आपना चले हमारे साथ!!! मेरे साथ के ही कॉमरेडो ने चल-अचल संपत्ति इक...

Nityanand Gayen के ब्लॉग से

मेरा वजूद मैं नही चाहता मरने के बाद अपनी चर्चा तुम्हारी किसी महफिल में जीते जी थोड़ा मिल जाये वही बहुत है आधी उम्र तो बीत चुकी है जीने की लड़ाई में बस मान लो इतना कि मैं भी इन्सान हूँ यही बहुत है यही मेरा वज़ूद है तुम्हारा पता मेरे पास नहीं है तुम्हारा पता और मुझे खुद का खबर नहीं पर मैं खोया हुआ नहीं हूँ ज़मीन की बात है हूँ कहीं इसी जमीं पर ख़ोज सको तो ख़ोज लो देर होने से पहले ........ दरारें दरारें बहुत घातक होती है चाहे कहीं हो दीवार में या रिश्तों में बालू -सीमेंट भर सकती हैं दीवार की दरारें किन्तु - रिश्तों की दरारें नही भरती किसी भी सीमेंट से बचा के रखिये रिश्तों को -- हर दरार से ........... वादे सारे वादे तुम्हारे मैंने रख दिया है दिल की किताब में सूख चुके हैं सभी वादे किताब की फूल की तरह छूने से डरता हूं टूट न जाये कहीं.........

एक बार फ़िर गुलज़ार

तुम्हारे ग़म की डली उठा कर जबां पे रख ली है, देखो मैंने वो क़तरा क़तरा पिघल रही है, मैं क़तरा क़तरा ही जी रहा हूं किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे कभी गोदी में लेते थे कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा वो शायद अब नही होंगे !! -गुलज़ार