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साहित्य के मेले और दुर्गति के ठिकाने 29 Jan 2019


साहित्य के मेले और दुर्गति के ठिकाने


अफसोस कि प्रगतिशीलता और लेखन भी समानांतर हो गया है - इससे ज़्यादा साहित्य की दुर्गति क्या होगी।
कोई अर्थ नही लिखने, पढ़ने और दुनिया को ज्ञान बांटने का, साहित्यकार - लेखक को अपने अंतर्मन में झांकने की जरूरत है - सेटिंग, जुगाड़ और पुरस्कारों की महिमा में वेश्याओं की तरह अपने आपको बेच देने के बजाय।
कितने - कितने गुटों और खेमों में बंटे ये टुच्चे भर लोग अपने घर, परिवार और औलादों को सुधार नही पाएं, खुद पतित रहें और समाज में अपने गुण दोषों की वजह से बिरले बने रहें, कुछ को छोड़कर अधिकांश बर्बाद भी हुए और बर्बाद भी किया - विध्वंसक होकर, फिर किस बात की विचारधारा और प्रतिबद्धता।
लिटरेचर फेस्टिवल के नाम पर विशुद्ध गुटबाजी, गुंडागर्दी, कार्पोरेट्स के दलाल, संक्रमित विचारधारा के कीड़े मकौड़े, नेताओं और हस्तियों को साधने का काम करते ये कलम के परजीवी क्या कर रहें है वहां भड़ैती और बकर के सिवा, एक अंधी दौड़ में शामिल हर गांव -कस्बे के लोग अब फेस्टिवल कर इतिहास में अमर होना चाहते है, हर टटपुँजिया लेखक इसमें शामिल होकर शहीद होना चाहता है जबकि झेलने को ना पाठक है वहां और ना श्रोता या दर्शक।
एक छोटा सा लेखक समाज है साला इत्ते बड़े देश में वह भी एक नही, यही है जो शब्दों की भाषा, कलाकारी, बाजीगरी और चमत्कार जानता है - वह भी इस कदर अनैतिक, भ्रष्ट, दुर्व्यसनी और दुष्प्रेरण में संलग्न हो गया है कि उसे अब अनुतोष का मतलब शराब, रुपया, पुरस्कार और छपास में समझ आता है।
रही - सही कसर बेस्ट सेलर के नाम पर उग आए मीडिया और हिन्द युग्म टाईप प्रकाशनों के समूहों और इनके पले टट्टूओं ने पूरी कर दी है जो भिखमंगों की तरह से कचरा लिखकर गर्दा फैलाने का दुष्कर कार्य कर रहें है - केरल से कश्मीर और नार्थ ईस्ट से लेकर गुजरात तक युवाओं की एक ऐसी साहित्यिक नशेड़ी फ़ौज पैदा हो गई है जो इस सब तरह के काम मे माहिर ही नही , निष्णात और पारंगत है।
यकीन मानिए जिस तरह से साहित्य के इन भांड और चारणों ने साहित्य का बीड़ा उठा लिया है - वह घातक है और देखिएगा जल्दी ही "सरकार नामक जानवर" इसे अपने कब्जे में ले लेगा - फिर जश्ने रेख़्ता हो या जयपुर फेस्टिवल या समानांतर फेस्टिवल और फिर सिंहस्थों एवं कुम्भ की तरह अखाड़े सजेंगे और किन्नरों में महामंडलेश्वर बनने के लिए लड़ाई तेज होगी।
मुआफ़ कीजिये - साहित्य समाज का वह गंदा कुआं बन गया है जहां हम अपने पिछवाड़े का कूड़ा और भगवान की मूर्ति से उतारा निर्माल्य चौबीसों घँटे फेंक आते है और पूरी बेशर्मी से ठहठाकर हंसते है गीदड़ों और धूर्त लोमड़ियों के समूह में।
एक बार एक मनुष्य होकर भी सोचिए कि आप किसके साथ है - बेस्ट सेलर की भीड़, प्रकाशक के दांव पेंच, लिट्रेचर फेस्टिवल के नंगे खतरनाक खेल, जुगाड़, सेटिंगबाजी, पुरस्कारों की अवांगर्द भीड़, परिवार, समाज अपने भीतर खो गए मनुष्य के साथ या सच मे साहित्य के साथ क्योकि मेरा मानना है कि दुनिया की कोई भी भाषा या संस्कृति का साहित्य पोम्प एंड शो में यकीन नही करता ना ही खेमों की राजनीति में।
दुखद यह है कि हमारे प्रबुद्ध लेखक, प्राध्यापक, शिक्षक, युवा साहित्यकार और तथाकथित बौद्धिक भी इस सारे खेल में शामिल है और गर्व से भौंडे प्रदर्शन में आत्म मुग्ध है
साधौ, साधौ, साधौ .......
क्या तन माँजता रे , एक दिन माटी में मिल जाना
[ सारे मित्रों, अनुजों, अग्रजों, सम्पादकों और मनुष्यों से मुआफ़ी सहित ]
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