1 सच - झूठ, सही - गलत, उम्मीद - नाउम्मीद, पाप - पुण्य, गुनाहों और गुनगुने पछतावों के बीच सारी ज़िंदगी हर शाम अपने आपसे और सबसे मुआफ़ी मांगते हुए गुजार दी, हर उस शख्स को माफ़ भी कर दिया जो निजी जीवन में किसी तीर की भाँति घुस आया और भावनाओं को बेधकर चला गया पर इस सबके बाद भी हाथ नही आया कुछ जीवन में लड़ झगड़कर, झिकते हुए मुश्किल से जो भी जीने लायक और भोगने लायक मिला - उसे प्रार्थना के बुदबुदाते पलों में आँखें मिंच कर बीता दिया और जब सब कुछ सामने था भोगने को तो अनचाही जवाबदेहियों का वज़न काँधों पर आ पड़ा इसी सबमें सब कुछ नष्ट हो गया पर अब खुलकर जीना है और नई सुबह की बेला में नए संकल्प नही, नये क्षितिज छूना है फिर वो किसी भी व्योम में हो कहते है सुख से जीना है तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, जो बहुत प्यारा है उसे विलोपित करना पड़ता है, अब तक की जीवन यात्रा में जिन शब्दों को तिरोहित कर रहा उनमें से पहला शब्द "माफ़ी' है 2 जन्म के पहले से शुरू होती है और मरने के बाद भी सदियों तक बनी रहती है, हर कोई इसी में जीता जाता है और सिर्फ अपने लिये नही पर जन्म के समय माँ के साथ जुड़े गर्भ नाल के अलग होने के ...
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