मैं जहाँ सब छोड़ आया था, उस सबको याद करने का कोई अर्थ नहीं है अब, बहुधा हम बूझ चुकी छायाओं से प्रेरणा पाने की उम्मीद करते है - जो एक समय के बाद भूतहा हो चुकी होती है, इन सबके बीच रंग, मौसम, कायदे बदलते रहते है, जैसे अभी थोड़े दिन पहले पलाश के सुर्ख रंग दिल के बेहद करीब थे और आग में सुकून था, उसके पहले वसंत में ताज़े महकते फूल, सप्तपर्णी से लेकर डेहलिया या गुलाब या किसी और फूल का नाम लो पर सब समय के साथ खत्म हो जाता है, हर दफे नए की उम्मीद बनी रहती है - यह तसल्ली कम है क्या जीने को - जो दिल-दिमाग में राहत देती है, पर अब काले बादलों के बीच उनसे और पानी की बूँदों के बीच प्यास एक सिरे से गायब है, दिन - दिन भर हो जाता है कि पानी की याद नहीं आती - जैसे सब स्मृति से लोप हो जाता है एक समय के बाद - वैसे ही सब भूलना पड़ता है
जीवन कभी - कभी थोड़ा पीला, थोड़ा जामुनी और थोड़ा सफ़ेद बन जाता है और इन्हीं के बीच सुगंध लेते हुए जीने का स्वांग भरना पड़ता है, कोई चारा है भी और इसके सिवाय - बस, इन दिनों ज़िंदगी गुलज़ार है, इन सबमें ही गुत्थम - गुत्था है
मौसम और जीवन के बदलावों में अपनी पसंद के रंगों संग जीना ही जीवन है - बाकी तो सब माया है
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Today, I removed nearly 1,345 mobile numbers from my phonebook, there is little value in holding on to unnecessary contacts
If someone never bothers to call, reply to a message, respond on WhatsApp, or even answer during an emergency, it is better to let go of that connection in time
Tomorrow, I'll be doing the same with my social media contacts, sometimes, having a few genuine people around you is far more valuable than maintaining a long list of meaningless connections
Quality always matters more than quantity
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आज मैंने अपने फ़ोनबुक से लगभग 1,345 मोबाइल नंबर हटा दिए
आख़िर ऐसे अनावश्यक संपर्कों को सहेजकर रखने का क्या औचित्य, जो कभी न फ़ोन करते हैं, न संदेश भेजते हैं, न व्हाट्सऐप पर जवाब देते हैं और न ही ज़रूरत या आपातकाल में कॉल उठाने की ज़हमत उठाते हैं, ऐसे संबंधों से समय रहते मुक्त हो जाना ही बेहतर होता है
कल यही काम अपने सोशल मीडिया संपर्कों के साथ भी करूँगा
ज़िंदगी में दिखावटी भीड़ से कहीं अधिक मूल्यवान कुछ सच्चे और भरोसेमंद लोगों का होना है
अब मेरे लिए संख्या नहीं, संबंधों की गुणवत्ता ही वास्तव में मायने रखती है
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सच और झूठ असल में कुछ होता ही नहीं है - ना ही इससे कुछ फर्क पड़ता है जीवन में, असली बात यह है कि - सच हो या झूठ, फर्क इससे पड़ता है कि आपने अपने लिए इसका इस्तेमाल किया या अपनों के लिए
ईमानदारी बहुत सापेक्ष होती है - ना इसे दिखाने की आवश्यकता होती है - ना इसका प्रचार करके बाज़ार या कार्यक्षेत्र में बड़ा या बिकाऊ मुद्दा बनाने की ज़रूरत है, ईमानदारी अपने आप से होती है कि आप कैसे चीजों को देखते, परखते और विश्वास करके अंततः लोगों के साथ व्यवहार करते है, यदि आप ईमानदारी को सिर्फ झंडा बनाकर, इसके ऊंचे - पर खोखले डंडे को अकेले हाथ में पकड़कर मैदान में खड़े है और पूरे भौंडेपन से प्रदर्शित कर रहें है तो शायद आपको अपने भीतर झांककर आत्मावलोकन की सख्त ज़रूरत है
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एक जिला अदालत की कहानी है
सन 1969 में यहां जिला एवं सत्र न्यायालय की शुरूवात हुई और अभी तक 28 जिला न्यायाधीश रह चुके है जिसमें मात्र दो बार महिला जिला एवं सत्र न्यायाधीश रही बाकी 26 बार पुरुष न्यायाधीश रहें
सवाल स्वाभाविक है कि क्या संविधान में जो समता, स्वतंत्रता या बाकी बराबरी की बात की गई है वह कागज़ी है या योग्य महिलाएं ही ज्यूडिशियरी में नहीं है
यदि यही आंकड़ा हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक देखा जाए तो बहुत चौंकाने वाले आंकड़े आयेंगे
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