नरोत्तम, कैलाश, नरेंद्र युग की मप्र में समाप्ति
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नरोत्तम मिश्रा प्रकरण यह दर्शाता है कि एक दिन भाजपा के लोग आपस में ही लड़ भिड़कर अपना सर्वनाश कर लेंगे और यह पार्टी खत्म हो जाएगी, इंतजार कीजिए
धर्म, यज्ञ, अनुष्ठान, मंदिर, कालीचरण जैसे बलात्कारी साधुओं के साथ मिलकर करोड़ों रूपये खर्च करके दतिया में जो ढांचे मिश्रा जी ने खड़े किए गए - उन्होंने भी कोई मदद नहीं की,याद रखिए मंदिर - मस्जिद और धर्म अलग है और राजनीति अलग,भाजपा का आलाकमान यह अच्छे से समझता है
असल में खतरा भाजपा को कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, नरेन्द्र तोमर जैसे लोगों से है - जो येन केन प्रकार से मप्र की सत्ता हासिल कर शीर्ष पर बैठना चाहते है, अठारह वर्ष शिवराज सिंह चौहान ने किसी को आगे नहीं आने दिया - उमा भारती, बाबूलाल गौर, राघव जी, लक्ष्मीकांत शर्मा, नरोत्तम मिश्रा, नरेंद्र तोमर, कैलाश गौड, स्व लक्ष्मण गौड से लेकर कितने ही लोगों ने कोशिश कर ली कि वे मप्र के सिरमौर बने पर कुटिलता में माहिर शिवराज ने व्यापमं जैसा कांड करने के बाद और अवैध खनिज से लेकर नर्मदा से रेत खनन, नर्मदा किनारे फर्जी वृक्षारोपण और लगातार कई वर्षों तक इन्वेस्टर्स मीट जैसे बड़े घोटालों के बाद भी अपनी सीट सुरक्षित रखी और अंत में मलाई खाने दिल्ली चले गए पर इनमें से किसी को कुछ नहीं मिला
इस समय सत्तर पार ये तीन - चार लोग कुर्सी पर बैठने को तरस रहे है - क्योंकि मोहन यादव इनके सामने एकदम जूनियर है और ये बिल्कुल सहन नहीं कर पा रहें है कि प्रदेश के विकास से लेकर सिंहस्थ 28 की मलाई वे अकेले खायें - इसलिए सारे कौरव एकसाथ इकठ्ठे हो गए है इस उज्जैनी कान्हा के सामने - "अभी नहीं तो कभी नहीं" की तर्ज पर लड़ाई जारी है
हालांकि इससे दतिया ही नहीं प्रदेश की, खासकरके चम्बल और बुंदेलखंड की ब्राह्मण लॉबी नाराज है, पर अब समय आ गया है कि इन सत्तर पार लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाए, दतिया मैं कई बार गया हूँ और वहां के लोग अपेक्षाकृत सीधे है और नरोत्तम के खौफ़, भय और बदले की भावना के शिकार है, ये जो भीड़ टिकिट मांगने का स्वांग कर रही है - वो बाहरी है, इनमें स्थानीय मुश्किल से दस - बीस प्रतिशत होंगे, अमित शाह और भाजपा के इस निर्णय से मैं ही नहीं, प्रदेश के समझदार लोग सहमत है कि नरोत्तम को टिकिट नहीं मिलना चाहिए
इस फैसले से अब घबराहट उन विधायकों और सांसदों में है - जो हर सीट को अपनी बपौती समझकर गत तीस - चालीस वर्षों से निठल्ले हो गए है और सामंतवाद, गुंडागर्दी और तानाशाही करके अपने - अपने क्षेत्रों में कुछ नहीं करके सिर्फ और सिर्फ रूपया कमा रहे है और तमाम अवैध काम कर रहे है - फिर वो बीफ निर्यात का हो या जमीन खरीदने का या शराब सप्लाई करने का, अब समय आ गया हैं कि देवास से लेकर उन तमाम जगहों के विधायक और सांसद बदले जाएं जो बेकाबू और निकम्मे हो गए है, यदि भाजपा यह कर पाई तो ही मप्र में अगली सरकार बनने की संभावना है - अन्यथा ये लोग आपस में लड़कर मर जायेंगे
माँ पीताम्बरा सबका भला करें और नरोत्तम मिश्रा को सदबुद्धि दें
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देश के सुप्रीम कोर्ट में आज जो हुआ वह आज़ादी के बाद सबसे शर्मनाक है, डीजेआई सूर्यकांत जी को सोचना चाहिए कि देश के न्याय की स्थिति क्या है, इतने छोटे से कार्यकाल के जूते के बाद आज एक युवा वकील ने बेहद अश्लील तरीके से गालियां दी और कहा कि - "I order you to lodge an FIR and also this fellow said I am sovereign"
इस सबके लिए न्यायपालिका, कानून से जुड़ी बिरादरी, पुलिस और प्रशासन के साथ राजनीति जिम्मेदार है
बहुत उम्मीद और लोगों को न्याय दिलाने के लिए मैं लगभग सब छोड़कर अभिभाषक बना हूँ, परंतु दिन पर दिन जो हालात अपेक्स कोर्ट के और हाई कोर्ट्स के हो रहें है - वे बेहद चिंतनीय है, केजरीवाल के द्वारा जस्टिस स्वर्णकांता के मामले हो, वरिष्ठ अभिभाषक प्रशांत भूषण द्वारा सीजेआई और सरकार की भूमिका पर खुले सवाल हो या गर्मी की छुट्टियों में हुए सोशल मीडिया ट्रोल्स की बात हो - यह सब क्या है
सीजेआई सूर्यकांत जी का कार्यकाल इतना विवादास्पद और शर्मनाक रहेगा - सोचा नहीं था कभी
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सच, सिद्धांत, ईमानदारी, नैतिकता, उसूल, स्व-संस्तुति, साहस और आदर्श भले ही बहुत अच्छे मूल्य होंगे - जो सबको सीखना और सिखाना चाहिए, जीवन में अपनाना भी चाहिए पर जब बात जीवन को बचाने की आ जाएं तो इन सबका कोई अर्थ नहीं है, जीवन इस सबसे बहुत बड़ा होता है और इसे बचाने के लिए यदि ये सब कुछ कुर्बान करके भी जीवन को बचाया जा सकें तो बचाया जाना चाहिए हर कीमत और हर उसूल पर
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अपने पास वैसे ही नगद नारायण की कमी रहती है, मंदिरों, मजारों, लंगर और भण्डारों में फिर भी श्रद्धा अनुसार दे देता था, पर अब कसम खाई है कि एक रुपया तो दूर चवन्नी भी नहीं दूंगा और भंडारे तो दूर किसी को भी कोई चंदा नहीं दूंगा और इलेक्शन बॉन्ड खरीदने का तो सवाल ही नहीं - क्योंकि सब चोर है और अपना इंटरनेशनल चौकीदार संरक्षक है इन सबका
कही भी किसी भी मंदिर, मज़ार या किसी भी धर्म के मंदिर या पूजा स्थल के साथ बाबाओं, साधुओं, भिखारियों, आश्रमों, अनाथालयों और भंडारों में दान देना बंद करें, रुपया कमाना बहुत मुश्किल और श्रम का काम है और चोरी करके हजम कर जाना बेशर्मों का
चंपत राय बंसल से लेकर मोती, कालू, लालू, टकला और कल्लू मामा हर जगह है - बचकर रहिए
फिर मत कहना - बताया नहीं
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सारे कवि, कहानीकार, आलोचक, समीक्षक, कैथेटर सॉरी कथेतर, यात्रा वृतांत लिखने वाले और तथाकथित लेखक पुरस्कार के लालची और शिकारी निकलते है, फिर वो कब्र में लटके कवि हो, श्मशान में जल चुके कहानीकार हो, हिंदी के जुगाड़ू और नीच प्राध्यापक हो, अधेड़ उम्र के सेटिंगबाज छपास प्रेमी हो, दिन - रात रक्त चूसने वाले चापलूसों की चम्मचों वाली श्रृंखला हो, नए शिक्षार्थी और शोधार्थी हो या युवा लेखक, भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स हो जो इंस्टा से लेकर हर माध्यम पर अपने खानदान से लेकर कुत्ते बिल्ली के फोटो भी चस्पा करते रहते है, और वो सब जो स्थानीय अखबार से लेकर फेसबुकिया या इंस्टा पर नरम और बेहद कुरकुरी किस्म की महिलाओं के फोटू चैंपकर प्रेम - मुहब्बत की कविता टाईप कुछ भी लिखते हो - सबकी नियति और अंतिम क्रिया का जुलूस पुरस्कार की देहलीज पर ही खत्म होता है
बचकर रहिए इनसे, ये खुद तो जलेंगे आपको भी अपनी कपाल क्रिया में शामिल कर लेंगे और अंत में श्मशान की शोकसभा में लंबे बोरिंग भाषण सुनाकर ही मारेंगे
शर्मनाक है और हिंदी भाषा के लिए यह बेहद घातक है
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