Skip to main content

नये साल के संकल्प - Posts of December 2023

1
सच - झूठ, सही - गलत, उम्मीद - नाउम्मीद, पाप - पुण्य, गुनाहों और गुनगुने पछतावों के बीच सारी ज़िंदगी हर शाम अपने आपसे और सबसे मुआफ़ी मांगते हुए गुजार दी, हर उस शख्स को माफ़ भी कर दिया जो निजी जीवन में किसी तीर की भाँति घुस आया और भावनाओं को बेधकर चला गया पर इस सबके बाद भी हाथ नही आया कुछ
जीवन में लड़ झगड़कर, झिकते हुए मुश्किल से जो भी जीने लायक और भोगने लायक मिला - उसे प्रार्थना के बुदबुदाते पलों में आँखें मिंच कर बीता दिया और जब सब कुछ सामने था भोगने को तो अनचाही जवाबदेहियों का वज़न काँधों पर आ पड़ा
इसी सबमें सब कुछ नष्ट हो गया पर अब खुलकर जीना है और नई सुबह की बेला में नए संकल्प नही, नये क्षितिज छूना है फिर वो किसी भी व्योम में हो
कहते है सुख से जीना है तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, जो बहुत प्यारा है उसे विलोपित करना पड़ता है, अब तक की जीवन यात्रा में जिन शब्दों को तिरोहित कर रहा उनमें से पहला शब्द "माफ़ी' है
2
जन्म के पहले से शुरू होती है और मरने के बाद भी सदियों तक बनी रहती है, हर कोई इसी में जीता जाता है और सिर्फ अपने लिये नही पर जन्म के समय माँ के साथ जुड़े गर्भ नाल के अलग होने के बाद पिता, बन्धु - बांधव, सहोदर और परिवार, कुनबा, अड़ोस - पड़ोस और फिर मृत्यु तक आते - आते एक वृहद समाज से हम सब जुड़ ही जाते है
इस सबमें सबसे ज़्यादा समय हम जिसे देते है वह सिर्फ अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों के लिए होती है, हम हमेशा सोचते हैं कि इसका, उसका, सबका क्या होगा ; इसके पहले क्या होगा, इसके बाद क्या होगा, यदि यह हुआ तो क्या होगा और यदि यह नहीं हुआ तो क्या होगा और यह सब करते-करते हम इतने मशगुल हो जाते हैं कि हमें समझ नहीं आता कि जीवन कब इस शब्द का पर्याय बन गया - हालांकि हमने इसे मिटाने के कई तरीके खोजे - दवाईयां, शराब, मनोरंजन, शिकार, खेल, शौक से लेकर और भी बहुत कुछ, पर यह जो जीवन का स्थाई भाव बन गया था वह मिटा नही, पेट की तरह जुड़ा आदिम निशान हममें बना हुआ है और बना रहेगा
इसी सबमें सब कुछ नष्ट हो गया पर अब खुलकर जीना है और नई सुबह की बेला में नए संकल्प नही, नये क्षितिज छूना है फिर वो किसी भी व्योम में हो
कहते है सुख से जीना है तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, जो बहुत प्यारा है उसे विलोपित करना पड़ता है, अब तक की जीवन यात्रा में जिन शब्दों को तिरोहित कर रहा - उनमें से दूसरा शब्द "फ़िक्र" है

3
जन्म के साथ ही जीवन का दूसरा नाम उम्मीद हो जाता है, और इसी के सहारे हम लटकते - लटकते जीवन नैया पार करने लगते है, हर बार गहन निराशाओं के बीच, संसार की सबसे उदास सुबह को, जीवन की सबसे काली सांझ में और निस्तब्ध रात में जो एक चीज नजर आती है वह है - उम्मीद , पर दिल पर हाथ रखकर अपने आप से पूछता हूँ तो लगता है कि उम्मीद के लिए भी उम्मीद नहीं मिली कभी, बल्कि उम्मीद के बरक्स हमेशा मुझे उद्दंड निराशाएं मिली, जिन्होंने मेरा मार्ग प्रशस्त किया और रास्ता दिखाया, मेरे सबसे कठिन दिनों में मुझे एक सूखी नदी के पास ले गई और डुबो दिया जिससे मै लगातार मजबूत होता रहा, ऊँचे पहाड़ पर एक सूखे पेड़ ने मुझे हौंसला दिया और पगडंडियों ने सीखाया कि जीवन चौड़ी सडकों पर नहीं अंधेरों और संकरे तलहटी में ही सम्पूर्ण होता है

अब लगता है कि उम्मीद के भरोसे जीवन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा व्यर्थ चला गया और अंत में जब कुछ हासिल नहीं तो शायद हम सब व्यर्थ ही जीने का स्वांग किये रहते है और लगे रहते है कि वो सुबह कभी तो आयेगी, पर जीवन की अपनी चाल है, अपना एक ढर्रा है - जिस पर घिसते हुए हम देह धरे के दण्ड के पाप को हम भुगतते रहते है और हर पल व्योम में तकते है कि अगला पल, अगला दिन, अगली शाम या अगली रात सुहानी होगी, चाँदनी से भरा आँगन होगा और हम झूम के नाचेंगे, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है

शब्दों के किसी बाजीगर ने ऐसा मायाजाल बुना है कि हम शब्दों के भंवर जाल फंसते चले गए और अंत में अपने ही बनायें जाल में उलझ कर रह गए है, इस ढलती सांझ पर शब्दों के खोखले अर्थ प्रकट हो रहें है और मै रेशा - रेशा इनमे उलझकर भीतर पड़ी गांठों को सुलझा रहा हूँ तो मायने समझ आ रहें है

इसी सबमें सब कुछ नष्ट हो गया पर अब खुलकर जीना है और नई सुबह की बेला में नए संकल्प नही, नये क्षितिज छूना है फिर वो किसी भी व्योम में हो

कहते है सुख से जीना है तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, जो बहुत प्यारा है उसे विलोपित करना पड़ता है, अब तक की जीवन यात्रा में जिन शब्दों को तिरोहित कर रहा उनमें से तीसरा शब्द "उम्मीद" है







Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...