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Khari Khari, Man Ko Chiththii and other Posts from 25 to 27 May 2026

माननीय सुप्रीम कोर्ट आज SIR को वैध कर देगा किस्सा खत्म, कल्लो आपको जो करना है, उखाड़ लो - जो उखाड़ना है, इत्ते पढ़े लिखें और वरिष्ठ अधिकारी ज्ञानेश बाबू क्या गलत करेंगे, क्या बो देस पीरेमी नई है, और पद पर बने रैने के लिए सरकार का थोड़ा सा काम कर दिया तो क्या गलत किया और फेर की फर्क पैंदा पाजी, तुसी नाराज मत हो यारा
और सुन लो, अब नागरिक होने की पहचान केचुआ ही करेगा, जिसका नाम SIR में ज्ञानेश सर ने नहीं लिखा - वे देश छोड़कर चले जाएं, हाँ नई तो महंगाई बढ़ रही इनकी वजह से
सबको राज्यसभा अच्छी लगती है - इसलिए सर्फ एक्सेल वाले दाग़ अच्छे है
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गणित, भाषा, विज्ञान, नागरिक शास्त्र, इतिहास, कला, संगीत, वाद्य, व्यवहार, नैतिकता, मूल्य बोध, और वो सब सीखता रहा - जो जीवन चलाने के कौशल और दक्षताओं में शामिल था, इन्हीं का इस्तेमाल करके आवश्यकता अनुसार अकिंचित सी लक्ष्मी कमाई और बाद में शिक्षक की भूमिका में भी रहा लंबे समय तक, अपने चालीस वर्षीय व्यवसायिक जीवन में पंद्रह वर्ष स्कूल, निजी कॉलेज, फिर दो - तीन स्कूल्स में प्राचार्य भी रहा और बच्चों को युवाओं को विज्ञान, अंग्रेजी सीखाई, सामाजिक क्षेत्र में अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा का ही काम किया - क्योंकि तब तक यह समझ आ गया था कि "लक्ष्मी आते हुए अच्छी लगती है और सरस्वती जाते हुए", पर इस सबमें अब जब पलटकर देखता हूँ तो लगता है क्या यही सब सच था, क्या यही भाषा, गणित, मूल्य, विज्ञान या इतिहास था - जो कही से स्थानांतरित होकर मेरे पास आया और मैने बेहद चलताऊ ढंग से आगे बढ़ा दिया - साल दर साल और जीवन का ढर्रा अपनी गति से लुढ़कते हुए साठ की उम्र में लगभग क्वथनांक बिंदु पर पहुंच कर उबाल मार रहा है
जो सीखा वो गणित नहीं था, भाषा नहीं थी, विज्ञान या इतिहास नहीं था, मूल्य तो हरगिज ही नहीं थे, तमाम एषणाओं के बीच एक व्यवसायिक मजबूरी थी आगे बढ़ने, दूसरों को पछाड़ने और ज्यादा अर्जित करने की और कालांतर ने वही किया भी - भाषा या विज्ञान के नाम पर अनेक प्रकार के बोगस सिद्धांत लाखों को सिखा दिए, जो चीजें किसी के जीवन में कभी काम नहीं आएंगी वो जबरन सीखाकर पीढ़ियां बर्बाद कर दी, पर बिरले ही वो सब सीख - समझ पाएं जिसे सीखना कहते है और आज समझ आ रहा है कि मेरा सच कभी दूसरों का सच नहीं बन सका या दूसरे का कटु सत्य मेरा, और बल्कि अब तो अपना सच भी शंका के घेरे में है और बेहद कमजोर इच्छाशक्ति और लाचार जीवन पद्धतियों के बीच रहकर मैने अपने सभी सचों से मुंह मोड़ लिया है और निरासक्त, निरापद और निर्वैयक्तिक होकर उस मोड़ पर खड़ा हो गया हूँ कि सब त्याग कर रहा हूँ
एक ऐसी दौड़ का संवाहक बन रहा हूँ कि अपने पर सवाल उठाता हूँ - भाषा, गणित, विज्ञान, नैतिकता और मूल्यों को परिभाषित करते हुए समझना चाहता हूँ कि सच क्या है - वो सब जो जीवन में कर्तव्य, नौकरी या समर्पण करते हुए पिछले साठ बरस यूँ ही खाली बिता दिए और अंत में हाथ कुछ नहीं लगा, या अब आगे आने वाले भयावह समय जिसकी ओर ताकते हुए लगता है कि अब तो शरीर भी साथ देने लायक शेष नहीं रह गया है और सच का साया बेहद कुटिल और त्रासदी पूर्ण होने वाला है, अपने एकांत में रहना और मनन करना भाता है, अभी किसी ने कहा कि चलो यहां - वहां हो आते है, तो एक झटके में मुकर गया और मना कर दिया कि बाहर की यात्राएं बहुत हो गई - अब भीतर के तमस को टटोलते हुए अंदर की तरफ लंबी गहरी यात्रा करनी है - जो एक ऐसे मकाम पर छोड़ देगी - जहां भाषा, गणित, विज्ञान, मूल्य और सारे बोध छूट जायेंगे और ना लक्ष्मी का आना होगा - ना सरस्वती का जाना संभव हो सकेगा
मेरा ख्याल है यह चैतन्य अवस्था है जो लगभग आठ दशक के बाद आती है - जब इंद्रियाँ और लोलुप हो जाती है, किसी एक इन्द्री कर आकर सचेत हो जाती है और फिर इसी इंद्री की समस्त मांगों और आवश्यकताओं के लिए शेष जीवन में तमाम प्रकार के रंग मंचों पर मनुष्य नाटक करते हुए इंद्री की क्षुधा को शांत करते हुए एक दिन हमेशा के लिए चुप हो जाता है, पर कुछ भाग्यशाली ऐसे होते है - जो साठ वर्षों में एक सौ बीस बरस जी लेते है और सब कुछ छोड़कर अपने में रम जाते है और अपनी ही धधकती हुई धुनी पर बैठकर, सबको छोड़कर आत्मलीन हो जाते है - और उस अनंतिम घर की तलाश करते है जिसे कबीर कहते है - "वा घर सबसे न्यारा, जहाँ पूरण पुरुष हमारा"
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ये कहां आ गए हम
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त्वीशा शर्मा की हत्या या मौत ने BNS, BNSS and BSA को धोकर रख दिया है और कानून के विद्यार्थियों के साथ पूरी ज्यूडिशियरी, वकील बिरादरी, पुलिस, प्रशासन मतलब मप्र शासन के सामान्य प्रशासन विभाग को हर पल सोचना पड़ रहा है कि अगला एक्शन क्या हो और माननीय हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेते समय सोचना पड़ रहा है कि कानून क्या था, एक्शन क्या लेना है और ऑर्डर क्या पास करना है, मेडिकल के डाक्टर्स को भी पोस्टमार्टम और एंटीमार्टम फिर से सीखना पड़ रहा है
और व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि इस सबके पीछे मुख्य कारण है समर्थ की माँ और त्वीशा की सास रही भोपाल की पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह की बुद्धि - जिसने पूरे मामले को एक देश व्यापी बहस ही नहीं बना दिया, बल्कि कानून के रास्ते में बरगद जैसी अड़चनें पैदा करके रख दी है, और अपनी अग्रिम जमानत करके बैठ गई घर में, यह महिला आत्ममुग्ध इतनी है कि दिन भर गत बारह दिनों से मीडिया के सामने बयान दे रही है, दहेज अधिनियम कानून फिर एक बार सवालों के घेरे में है और पुलिस, प्रशासन से लेकर मेडिकल के साथ न्याय और Rule of Law भी समझ नहीं आ रहा
गिरिबाला सिंह के वकील इनोश जॉर्ज कारोल ने आज मीडिया के सामने क्या नाटक किया कि "मेरे पाँव पर गाड़ी चढ़ा दी", इस केस को कानूनी रूप से समझने के लिए इंस्टाग्राम से लेकर कानून के इंस्टाग्राम पेजेस पर करीब पचास रील देखी और तीनों कानून हाथ में लेकर बेयर एक्ट्स देखता - समझता रहा, पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा रे बाबा
गजब है कानून की दुनिया, और कानून के रखवाले
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संसार में, देश में, प्रदेश में, जिले में, शहर में, यहाँ तक कि आसपास के मोहल्लों में भी इतने आयोजन होते रहते हैं कि यदि हर जगह शामिल होना चाहें, तो एक जीवन भी कम पड़ जाए, आजकल मैंने लगभग सभी प्रकार के आयोजनों में शिरकत करना बंद कर दिया है - इसके मुख्य रूप से दो-तीन कारण हैं
पहला, साहित्य, लेखन और पठन-पाठन से विश्वास उठता जा रहा है, क्योंकि आजकल के अधिकांश साहित्यकार — और कई पुराने लोग भी — केवल आत्ममुग्धता में डूबे दिखाई देते हैं, वे अपनी ही प्रशंसा में लगे रहते हैं, अपने परिचितों की किताबों, कविताओं और कहानियों की चर्चा करते हैं, जबकि बाकी दुनिया जाए भाड़ में — जैसी मानसिकता हावी है
दूसरा, ये लोग जरूरी सामाजिक और मानवीय मुद्दों को छोड़कर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों में उलझे रहते हैं, जिनका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता
तीसरा, अधिकांश लोग भयानक किस्म के नेपोटिज़्म में व्यस्त हैं और उसी को बढ़ावा दे रहे हैं, इसलिए अब इन लोगों से बात करने या बहस करने का भी कोई अर्थ नहीं बचा है
पहले किताबों और पत्रिकाओं के प्रति बहुत श्रद्धा थी, पुरानी खरीदी हुई किताबें और पत्रिकाएँ आज भी सहेजकर रखी हुई हैं, पर अब न उन्हें बेचने की इच्छा होती है, न किसी को देने की, परंतु अब जो किताबें आ रही हैं, वे अधिकतर एक-दूसरे को उपकृत करने के लिए छापी जा रही हैं — चाहे वह अनुवाद हो, नया लेखन हो, या अपनी ही कविताओं और कहानियों को नए-नए लेबल लगाकर बार-बार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति - यह सब बेहद शर्मनाक लगता है, और अब तो इस पर बात करना भी लगभग पाप जैसा प्रतीत होता है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश आयोजनों के स्थल ऐसे होते हैं, जहाँ जाने से सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा मिलती है, वही लोग, वही चेहरे, वही नकली मुस्कुराहटें, वही भेदभाव, वही जाति-पाँति, वही निंदा, और चरण-पादुकाएँ चूमने में सिद्धहस्त चापलूसों का पूरा गिरोह — जिन्हें सिर्फ अखबार, पत्रिका या फेसबुक पर फोटो छपवाकर महान बनना है - जबकि इन चीजों का वास्तविक महत्व दो कौड़ी का भी नहीं है
बहरहाल, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से बेहतर है कि घर पर दो घंटे आराम से सो लिया जाए, मनपसंद गाने सुन लिए जाएँ, या कुछ नहीं तो इंस्टाग्राम की रील्स ही देख ली जाएँ
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साठ की उम्र हो चली है, बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था में या प्रौढ़ होने पर कभी पता ही नहीं चला कि ईद, क्रिसमस, होली - दीवाली या बाकी त्यौहार कब आए और चले गए, हमेशा खुशी के माहौल में मिलना - जुलना होता था, मिठाई - पकवान आदि में दिन गुजर जाते थे, खूब प्यार से गले मिलते थे, मस्ती करते थे, ईदी मिलती तो गुलछर्रे उड़ाते थे, देर रात घर आते थे - सादिक का घर हो फ्रांसिस का या मेरा घर
पर इधर दस बीस वर्षों से खासकरके 1992 के बाद त्योहारों में एक विभाजन रेखा खींच गई और 2014 से तो त्योहार दहशत गर्द हो गए है और आज की ईद पर भाजपा सरकार और विभिन्न राज्यों के अहमक और मूर्ख मुख्य मंत्रियों ने जो नौटंकी की है वह अत्यंत शर्मनाक और निंदनीय है
ये भी गुजर जायेगा पर इतिहास इन उज़बकों को कभी माफ नहीं करेगा , असल में ना हिंदू कम है - जो मेजोरिटी एवं सत्ता में होने का फायदा उठा रहे है और ना ही मुस्लिम कम है जो पढ़ाई - लिखाई के बजाय दंगों और झगड़े - फसाद में समय नष्ट कर रहें है
धैर्य रखिए, सिकंदर, हिटलर, चंगेज खान से लेकर सद्दाम हुसैन जैसे आए और गये और खाली हाथ गए तो इनका क्या है , पूरी धरती पर एक उंगल की जगह या नाम नहीं है इनका , बस इस समय पहचानते रहिए अपने आसपास के लोगों को ताकि सनद रहें फिर वो नेता हो, साहित्यकार हो, ब्यूरोक्रेट्स हो या मीडिया के दल्ले हो
एक सवाल मन में उठता है कि आज हामिद किसी ईद के मेले में जाता तो क्या खरीदता - अपनी दादी के लिए - चिमटा या अपने लिए कोई चाकू, तलवार या कट्टा
बहरहाल, सभी को बकरा ईद की मुबारकबाद
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दो जज मिलकर ज्ञानेश कुमार यानी चुनाव आयोग को सबसे ज्यादा अधिकार दे देते है, इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय बेंच को रिवीजन के लिए सौंपा जाना चाहिए, पचास साल पुराने जबलपुर वाले फैसले की तरह का यह फैसला है और अड़तीस जजों में से सिर्फ दो जज के फैसले को सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान लेना कहां तक उचित है भले ही इसमें माननीय सीजेआई शामिल हो
कल से चुनाव आयोग सभी नीतियों और निर्णयों के लेने के लिए स्वतंत्र होगा, राष्ट्रपति का पद यदि हमारे यहां रबर स्टैंप नहीं होता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते और सत्ता के घोड़े भी बेलगाम नहीं होते
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इंदौर देवास में पानी का भयानक संकट है, आपको लगता है पढ़े लिखे महापौर बन जाए तो समस्या कम होती है तो बता दूँ इंदौर महापौर मप्र शासन के अतिरिक्त महाधिवक्ता रह चुके है, काबिल वकील थे, पर कल इंदौर की जनता ने बगावत कर उनके बैंड बाजे बजा दिए, सारी वकालत और ज्ञान की थू थू हो गई पंडित जी की, वैसे ही आपसी कलह में ये कई लोगों को पानी पिलाकर मार चुके है और पुण्य लाभ ले रहें है, इतने पैदल है कि मेट्रो के स्टेशन बन गए पर एक भी स्टेशन पर पार्किंग नहीं बना मतलब भूल गए, ये हालत है बड़े समझदार लोगों के
देवास में एक महाराजा थे जो इंदौर नगर निगम से पानी खरीद कर सप्लाई करवाते थे तो नर्मदा नायक बन गए, गत तीन बार से उनकी पत्नी विधायक है वो भी यही कर रही, पानी देना और शहर का विकास तो दूर ओर शहर को भगवान भरोसे छोड़ रखा है, उनका शहर में एक दफ्तर नहीं जहां जाकर कोई शिकायत कर सकें, महल में रहती है, लोगों को गुलामी की आदत है हमारे देवास में, भुगतेंगे पर वोट सामंतवाद को ही देंगे
आज महापौर परिषद ने इंदौर से नर्मदा पानी खरीदकर जो देवास शहर में पानी तीन दिन या चार दिन में पानी बांट रहे है, की उपेक्षा कर मांगलिया को पानी देने का प्रस्ताव पारित कर दिया, सत्ता पक्ष के नेता श्री मनीष सेन के विरोध के बाद भी महापौर परिषद का यह निर्णय बेतुका और तानाशाही भरा है
अजीब मूर्खता है दोनों जगहों पर - वर्षों से भाजपा के लोग नगर निगम चला रहे है और इनकी प्रबंधन क्षमता शून्य ही नहीं, एकदम घटिया है, देवास में तो महिला महापौर है पर एमपी साहब यानी महापौर पति उनकी कुर्सी पर बैठते है और निर्णय लेते है, इन्होंने और इनके गुर्गों ने पूरे शहर को खोदकर नर्क बना दिया है जालिमों ने और अब कमीशन खाने के नित नए उपाय खोज रहें है
शिक्षित - दीक्षित और संघ की पृष्ठभूमि से आए ये सारे नेता कितने उजबक है - आप समझ सकते है, पानी की व्यवस्था करने के बजाय लोगों को प्यासा मारकर बेच रहे है - शर्मनाक
पता नहीं जब भगवान या अल्लाह ईश्वर अक्ल बांट रहा था तो क्या ये सब लोग चलनी लेकर खड़े थे
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माननीय सुप्रीम कोर्ट आज SIR को वैध कर देगा किस्सा खत्म, कल्लो आपको जो करना है, उखाड़ लो - जो उखाड़ना है, इत्ते पढ़े लिखें और वरिष्ठ अधिकारी ज्ञानेश बाबू क्या गलत करेंगे, क्या बो देस पीरेमी नई है, और पद पर बने रैने के लिए सरकार का थोड़ा सा काम कर दिया तो क्या गलत किया और फेर की फर्क पैंदा पाजी, तुसी नाराज मत हो यारा
और सुन लो, अब नागरिक होने की पहचान केचुआ ही करेगा, जिसका नाम SIR में ज्ञानेश सर ने नहीं लिखा - वे देश छोड़कर चले जाएं, हाँ नई तो महंगाई बढ़ रही इनकी वजह से
सबको राज्यसभा अच्छी लगती है - इसलिए सर्फ एक्सेल वाले दाग़ अच्छे है

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