Khari Khari, Man Ko Chiththi, Sapne V/S Everyone and Why Marriage is Important and other Posts from 21 to 25 May 2026
संसार में, देश में, प्रदेश में, जिले में, शहर में, यहाँ तक कि आसपास के मोहल्लों में भी इतने आयोजन होते रहते हैं कि यदि हर जगह शामिल होना चाहें, तो एक जीवन भी कम पड़ जाए, आजकल मैंने लगभग सभी प्रकार के आयोजनों में शिरकत करना बंद कर दिया है - इसके मुख्य रूप से दो-तीन कारण हैं
पहला, साहित्य, लेखन और पठन-पाठन से विश्वास उठता जा रहा है, क्योंकि आजकल के अधिकांश साहित्यकार — और कई पुराने लोग भी — केवल आत्ममुग्धता में डूबे दिखाई देते हैं, वे अपनी ही प्रशंसा में लगे रहते हैं, अपने परिचितों की किताबों, कविताओं और कहानियों की चर्चा करते हैं, जबकि बाकी दुनिया जाए भाड़ में — जैसी मानसिकता हावी है
दूसरा, ये लोग जरूरी सामाजिक और मानवीय मुद्दों को छोड़कर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों में उलझे रहते हैं, जिनका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता
तीसरा, अधिकांश लोग भयानक किस्म के नेपोटिज़्म में व्यस्त हैं और उसी को बढ़ावा दे रहे हैं, इसलिए अब इन लोगों से बात करने या बहस करने का भी कोई अर्थ नहीं बचा है
पहले किताबों और पत्रिकाओं के प्रति बहुत श्रद्धा थी, पुरानी खरीदी हुई किताबें और पत्रिकाएँ आज भी सहेजकर रखी हुई हैं, पर अब न उन्हें बेचने की इच्छा होती है, न किसी को देने की, परंतु अब जो किताबें आ रही हैं, वे अधिकतर एक-दूसरे को उपकृत करने के लिए छापी जा रही हैं — चाहे वह अनुवाद हो, नया लेखन हो, या अपनी ही कविताओं और कहानियों को नए-नए लेबल लगाकर बार-बार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति - यह सब बेहद शर्मनाक लगता है, और अब तो इस पर बात करना भी लगभग पाप जैसा प्रतीत होता है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश आयोजनों के स्थल ऐसे होते हैं, जहाँ जाने से सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा मिलती है, वही लोग, वही चेहरे, वही नकली मुस्कुराहटें, वही भेदभाव, वही जाति-पाँति, वही निंदा, और चरण-पादुकाएँ चूमने में सिद्धहस्त चापलूसों का पूरा गिरोह — जिन्हें सिर्फ अखबार, पत्रिका या फेसबुक पर फोटो छपवाकर महान बनना है - जबकि इन चीजों का वास्तविक महत्व दो कौड़ी का भी नहीं है
बहरहाल, ऐसे कार्यक्रमों में जाने से बेहतर है कि घर पर दो घंटे आराम से सो लिया जाए, मनपसंद गाने सुन लिए जाएँ, या कुछ नहीं तो इंस्टाग्राम की रील्स ही देख ली जाएँ
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Vijay Rajoria जी [ मामला लीगल है - के मुंशी जी ] का शुक्रिया कैसे अदा करूं जिन्होंने यह अदभुत सीरीज देखने का सुझाव दिया , यह सिर्फ एक सीरीज नहीं बल्कि जीवन का यथार्थ, कड़वी सच्चाई और जटिल सामाजिक संरचनाओं के बीच व्यवसाय, रिश्तों को संभालने की जद्दोजहद और प्रेम की लंबी कहानी है जो इतने आख्यान बुनती है कि लगता है हम सबके साथ यह रोज हर पल घटित हो रही है
अम्बरीश वर्मा निर्देशित और अभिनीत इस सीरीज में उनके मुख्य किरदार के साथ मंजीत मलिक, विजयंत कोहली, और सबसे प्रभावी युवा परमवीर चीमा है - जिसके अभिनय का मुरीद हो गया हूँ, मध्यमवर्गीय परिवार का यह लड़का इतना सहज अभिनय कर रहा है सीरीज में कि इधर पंद्रह बीस वर्षों में मुझे इसके समकक्ष कोई लगा ही नहीं
आजकल युवाओं के फंडे समाज, व्यवसाय, राजनीति और तंत्र को लेकर इतने साफ हैं कि विश्वास करना मुश्किल है, इनकी भाषा, अभिनय, समझ, तर्क क्षमता और लेखन की अभिव्यक्ति का कोई तोड़ नहीं, पुराने सड़े-गले लोगों की और कुएँ के भीतर रहकर बदलाव की डींग हांकने वालों को इनका एक डायलॉग ही इनकी असलियत दिखा सकता है, एक छोटा सा क्लिप डाल रहा हूँ - जो अम्बरीश की प्रतिभा दर्शाता है
"सपने वर्सेस एवरी वन" - जो एमेजन प्राईम पर उपलब्ध है
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शादी - ब्याह क्या सचमुच जरूरी भी है ?
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शादियां कितनी रिस्की और भयावह हो गई है, यह सोनम एवं राजा रघुवंशी या ट्वीशा और समर्थ सिंह के केस को देखकर समझा जा सकता है, इसके अलावा आसपास, मुहल्लों, घरों और रिश्तेदारियों में जरा झांककर देखिए - कुछ भी सहीं नहीं चल रहा है, यदि मेरी बात पर यकीन ना आयें तो कोर्ट में जाकर कुटुंब न्यायालय में देख आईये - सारे मुगालते दूर हो जायेंगे
इसलिए ध्यान दें -
• युवाओं को पर्याप्त समय दें - सोचने और निर्णय करने को
• जबरदस्ती ना करें कि अलाना - फलाना मरने के पहले उसे बहु या दामाद का मुँह दिखा दें
• उनकी पसंद को सर्वोच्च मानें और स्वीकार करें
• उनकी मर्जी के बगैर शादी ना करें
• शादी के बाद उनकी निजता में ना दखल डालें - ना अपनी अपेक्षाएं थोपें, खासकर लड़की से काम या संस्कार की अपेक्षा तो बिल्कुल ना करें
• उनके खाने-पीने, घूमने-फिरने, कपड़े खरीदी या निज बातों में दखल ना दें - अब सास-ससुर-देवर-जेठ-ननद वाला तानाशाही का जमाना गुजर गया है, लड़कियां या लड़कों को आपकी ना अपेक्षाओं की फिक्र है और ना उनके लिए आपका कोई महत्व है
• उनके ओरियंटेशन को भी समझें जिसकी आजकल बहुत जरूरत है, आपके पुरातन एवं सड़े - गले विचारों के बंधन इनपर जबरन ना लादें, आजकल कानून ने सब तरह के संबंधों को जायज ठहराया है इसलिए ज्यादा ज्ञान ना दें किसी को और आप मां - बाप है तो किसी की जिंदगी पर आपका हक नहीं है
• नौकरी के कारण वे महानगरों में रहते है - जहां वे उन्मुक्त और स्वच्छंद तरीके से रहते है - अपने बनाए संसार और स्पेस में, उनके पास पर्याप्त पैसा है और उन्हें आपके ना पैसे चाहिए - ना पुराने जमाने के देशी कमोड वाले या लकड़ी के सोफे वाले घर, इसलिए ये लालच उन्हें बाँध नहीं सकता, उन्हें स्पेस दें - बजाय अपनी बातें थोपने के
• और सबसे अंत में शादी के बारे में बेहतर हो कि बात ही ना करें, वे अठारह या इक्कीस साल बड़े है तो अपना भला - बुरा वे सोच लेंगे, आपके कर्तव्य और रिश्तेदारी में दिखावे के लिए आप अपने बच्चों की कुर्बानी ना दें - शादी की जरूरत होगी तो वे स्वत: कह देंगे या कर लेंगे
• मेरे अपने खानदान में, मेरे आसपास और मेरे पूर्व छात्रों के वृहद समूहों में दर्जनों उदाहरण है - जहां बच्चे शादी के बंधन में बंधकर पीस रहें है, तलाक के लिए या रोज अदालतों में चक्कर काट कर वकीलों को तगड़ी फीस दे रहें है, वे बर्बाद हो गए है, ये बच्चे और युवा कानूनी प्रक्रियाओं में हार्ट अटैक झेल रहे है - मात्र तीस - बत्तीस की उम्र में, उन्हें स्टेंट डलवाना पड़ रहें है - सिर्फ इसलिए कि आपने उन्हें मजबूर कर दिया शादी के लिए और वे फंसकर रह गए है और अब अपना जीवन बर्बाद कर रहें है, उनके चेहरों से हंसी गायब हो गई है ; वे ना पति या पत्नी के हो पा रहे - ना मां - बाप के और एकाकी जीवन में सिर्फ कमाना, शराब पीना, एकांत में रहना और चुपचाप जीवन रूपी जहर को पीते रहना - उनकी क्रूर नियति बन गई है, वे दो - तीन बरस तक दिल्ली, गुड़गांव, बैंगलोर, पुणे या हैदराबाद से घर नहीं आते कि - "क्या करूंगा या करूंगी घर जाकर, वही रोना - धोना है, नहीं जाना - बल्कि गोवा चले जाओ दिवाली में या मसूरी, घर की कीच - कीच तो नहीं झेलना पड़ेगी"
आपकी संतान राजा रघुवंशी या ट्वीशा बन जाएं - इसके पहले आप खुद सम्हल जाइये और बड़े बच्चों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप, रोकना, टोकना और गंदी भाषा में कहूँ तो "उंगली करना" बंद कर दीजिए,
ये पीढ़ी हमसे ज्यादा अक्लमंद, समझदार और निर्भीक है, अपना अच्छा बुरा वे आपसे हमसे बेहतर जानते और समझते है, मेहरबानी करके उन्हें जीने दें
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आदमी का एकांत एक ऐसी सिम्फनी है - जिसके देर तक बजने पर भी राग, आरोह - अवरोह और सुरताल का कोई ध्यान नहीं रहता, कभी - कभी गहरी चुप्पी और एकालाप से भी उकताकर हम प्रकृति में वह सब ढूंढने लगते है - जो कभी अस्तित्व में था ही नहीं, सारी कपोल कल्पनाएं मिथ्या साबित होती है, यह ठीक वैसा ही है - जैसे एक लंबी अंधेरी सुरंग में घुसता हुआ अकेला आदमी पीठ पर लदे जिम्मेदारियों के बोझ को भूल पीछे पलटकर उपलब्ध उजालों को जी भरकर अपनी आँखों में भर लेना चाहता है, लम्बे समय तक चलने वाले ऑपरेशन का कोई मरीज - जिसे पुनः लौटकर ना आने की पूरी ख़ात्री हो - आपरेशन थियेटर के बाहर अपने नथुनों में जी भरकर साँस भर लेना चाहता है, लंबी और ना खत्म होने वाली दुरूह यात्रा पर निकलने के पहले मजबूर मुसाफ़िर अपने घर और गली को स्मृतियों में संजो लेना चाहता है और ये सब तब ही संभव है - जब हम एकांत के अर्थ, परिप्रेक्ष्य और महत्ता को समझ सकें
एकांत जीवन का सबसे कठिन और सबसे सहज योग है - जिसे साध पाना सबके बस की बात नहीं
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"इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है"
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कॉकरोच जनता पार्टी के फॉलोअर इंस्टाग्राम पर भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा हो गए, उसके संस्थापक ने आज सुबह सभी से अनुरोध किया है कि भारतीय जनता पार्टी को अनफॉलो करना शुरू कर दें
मुझे लगता है कि यह एक तरह का शुभ संकेत है - भले ही युवा लोग जोश में आकर पार्टी ज्वाइन कर रहे हैं और हो सकता है कि वह थोड़े दिनों में कुछ धमाल भी करें, करना भी चाहिए - जब देश में 70 - 80 साल से ज्यादा के लोग अपनी राजनीतिक और निजी महत्वाकांक्षाओं, हवस और दिखावे के लिए जनता के रूपयों पर धमाल और कमाल दोनों कर रहे हैं, नीचता के स्तर को पार करके बेहद घटिया हरकतें कर रहे हैं ऐसे में यह युवा शक्ति यदि रोजगार, भ्रष्टाचार और उनकी उपेक्षा के साथ उन्हें गाली देने वाले को सामने रखकर संगठित हो रही है - तो यह प्रशंसनीय है
सुप्रीम कोर्ट के माननीय सीजेआई साहब को इस बात की बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने अपना हिडन एजेंडा इस बहाने सामने कर दिया और पूरी युवा शक्ति को संगठित कर दिया, हमें निश्चित रूप से इस पार्टी को ज्वाइन भी करना चाहिए और दूसरे लोगों को प्रेरित भी करना चाहिए कि वे आगे आए और लाभ उठाएं - "कॉकरोच का साथ और सबका विकास"
बहुत जरूरी और आवश्यक पहल है, कांग्रेस ने देश का कबाड़ा किया और भाजपा ने कांग्रेस को गाली देने के अलावा कुछ नहीं किया कुल मिलाकर 12 वर्षों में और इसके पहले के कार्यकालों में भाजपा की सरकारों ने सिवाय कॉर्पोरेट लाबी को मजबूत करने के कुछ नहीं किया तभी टाटा, गोदरेज मित्तल, खेतान, अडानी, अंबानी जैसे दीमक और पूरे सिस्टम में यानी कि गटर में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, न्यायाधीश, मीडिया, फिल्म इंडस्ट्री के भांड, ब्यूरोक्रेट्स और गुंडे - मवाली पैदा हो गए - जिन्होंने आम आदमी को सांस लेना मुश्किल कर दिया है
स्वागत किया जाना चाहिए इस नई पार्टी का, भले ही अनुभव न हो - पर काम करने की इच्छा और जोश पर्याप्त है, ऐसे ही बेवकूफ और दिग्भ्रमित करके बनाकर संघ और भाजपा ने देश पर कब्जा कर लिया, केजरीवाल, अण्णा हजारे , मनीष सिसोदिया, प्रशांत किशोर या ऐसे अनेक नगीने गली - मुहल्ले में मिल जायेंगे कमबख्त, तो इन्हें भी एक अवसर दें , देखें क्या नया होता है, स्व दुष्यंत कुमार कहते थे -
"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए,
तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए"
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