ये अंधेरी शाम के साए है जो सदैव संग रहते हैं
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गर्मी में दोपहर लंबी, उबाऊ और अलसाई होती है, शामें उदासी से भरी और रातें एकाकी इतनी कि यदि रातभर बैठकर छत पर तारें गिनते रहें तो भी रक्त छोटी पर जाएं, गर्मी फिर भी मुझे भांति है क्योंकि इसके बाद ही वर्षा ऋतु आएगी और सब कुछ भिगोकर तृप्त कर देगी
ये जो पीले जर्द पत्ते आप गमलों की पंक्ति में देख रहे हैं - इन्हें सन सोलह में भोपाल के एक दफ्तर से लाया था, तब DFID में राज्य स्तर पर काम करता था, इसके पास नफीस का दिया हुआ अंजीर का पेड़ है, पीपल है, बरगद है, रबर है और नीम है - साथ ही चैताली जब इंदौर छोड़कर कोलकाता जा रही थी तब उसके बड़े से रेलवे क्वार्टर्स से निकाला हुआ कढ़ी पत्ते का पौधा है जो अब बड़ा हो गया है
दो नींबू के पौधे थे - जिन्हें बरसों से सम्हाल कर रखा था, लोग कहते है गमले में भी फल आ जाते है - पर नहीं आए, बहुत पानी पीते है तीसरे माले पर इन्हें पालने में अपनी जान जोखिम में डालकर, खुद प्यासा रहकर, गर्मी सहकर इन्हें पालता हूँ और सिर्फ नींबू नहीं - बल्कि अजवाइन, मनी प्लांट, और भी ढेरों सब्जियों के भी पौधे - जो मेरे लायक सब्जी दे देते है जैसे करेला, लौकी, हरी मिर्च, गिलकी या कभी कुछ सुंदर फूल
पर इधर गर्मी इतनी हो गई है कि मैं सब सह रहा, पर इन पौधों को पानी दे रहा हूँ, खुद मच्छरों में रहकर पंखे की हवा में सोने का जतन करता हूँ कि कूलर का इस्तेमाल ना करूं और एसी से तो चिढ़ है, पर मेरे पौधों को रोज पानी मिलना चाहिए पर अब लगता है पौधे भी मेरी तरह कमजोर हो रहें है और दम तोड़ते जा रहें है, चकोर की भांति ताकते है आसमान को और अभी तो रोहिणी नक्षत्र बाकी है, हर साल तापमान बढ़ते जा रहा है
सीताफल के पौधे में गत वर्ष दो सीताफल लगे थे, पर बहुत शैशव अवस्था में ही काले पड़कर झर गए - इसलिए फिर ध्यान नहीं दिया, कद्दू हर बार छत पर बेल के रूप में फैलता है , फल भी लगते है पर थोड़े बड़े होते ही खत्म हो जाते है, पपीता जितनी बार भी उगा - हर बार नर निकला तो उखाड़कर फेंकना पड़ा, इस साल नींबू का भी यही सोच रहा था, पर शायद मेरे इरादों को दोनों पौधे भांप गए थे तो दोनों पर आठ - दस नींबू आए है, अभी कच्चे है पर भोर में जाकर जब मैं इनके पास खड़ा रहता हूँ तो खटास वाली खुशबू मेरा मन प्रसन्न कर देती है और नींबू के पौधे भी मालिक को पास देखकर घबराते है और मानो कह रहे हो कि मालिक हम पूरा प्रयास कर रहे है, हरी मिर्च घर की उगी ज्यादा तीखी होती है यह कह सकता हूँ
वाटर लिली अभी सूख रहा है, रबर मुरझा रहा है, ग्वार पांठा भी हरापन छोड़ रहा है, सबसे ज्यादा खुश है तो कैक्टस के दो पौधे जो इस तापमान में हष्ट पुष्ट हो रहे है और उन्हें पानी की नहीं और ज्यादा गर्मी की जरूरत है, मनी प्लांट फैल रहा है और अजवाइन के पत्तों की महक तो जोरदार है पर इस गर्मी में पकौड़े खाने का मन नहीं, बस सादी दाल बना लेता हूँ और चावल कभी कभी बाकी तो सलाद से जीवन चल रहा, ककड़ी, टमाटर, गाजर, साबुत ऑलिव और चाट मसाला जीभ को तृप्त कर देते है दलिया के साथ
कैसा होता है ना जीवन - यही सब कुछ है, मुझे ना किसी आध्यात्म को सीखना है, ना धर्म - कर्म को, न मानवता को और ना किसी क्लाइमेट चेंज के फंडों को, मेरी छोटी सी छत पर बसें ये बीस - पच्चीस पौधे ही मेरे असली शिक्षक है, मेरे सारथी है, मेरे मार्गदर्शक और मेरे गुरू जिनकी मेंटरशिप में मैं अपना जीवन बस जीते जा रहा हूँ
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आजकल देख रहा कि फेसबुक पर किसी को रीच नहीं और इसके लिए बड़े और स्थापित लेखक या चालू किस्म के छर्रे भी @Fillower @Highlight करके अपनी अच्छी से लेकर घटिया पोस्ट में लगाकर जबरन डिस्टर्ब करते है , लगता है सबको लेखन और विचार या तार्किक बहस के अलावा Facebook Monetization का चस्का लग गया है
एक स्थापित पचहत्तर पार स्थापित कवयित्री को जब बोला कि आपके पांव तो अब कब्र में लटके है, कब तक इस लाइक और कमेंट की चाहत में ये दोनों लिखकर अमरता के रास्ते खोजती रहेंगी तो बोली मुझे अनफालो कर दो या लिस्ट से हटा दो, मुझे तो लाइक कमेंट चाहिए़, और यकीन मानिए मुझे लगा कि या ये तो पगला गई है या सच में दिमाग का संतुलन खो बैठी है
ऐसे ही एक वरिष्ठ पद से रिटायर्ड आदमी दिनभर इन दोनों का इस्तेमाल करके इनबाक्स में भेजा करता है, अरे बाबा तेरा खानदान महान होगा, तू महान है, तेरी औलादें, बीबी, साली और कुत्ते - बिल्ली सब महान है पर हमें क्यों ज्ञान दे रहा है, बोला कि मैसेज बॉक्स में पोस्ट्स, दस-बारह वीडियो,फोटो आदि मत भेजो और टैग मत करो तो भड़क गया , ससुर को ब्लॉक करना पड़ा, सत्तर पार है पर बेसिक अक्ल नहीं है
फेसबुक से लेकर इंस्टाग्राम पर भी ये चले आते है और जब नहीं हो रहा कुछ तो कुछ बूढ़े साहित्यकारों ने बीस हजार मासिक वेतन पर युवा मॉडरेटर रख लिए जो दिनभर इनके पोतडे धोते रहते है , शर्म मगर उनको आती नहीं, इस सबमें उन ब्यूरोक्रेट्स को छोड़ दें - जिन्होंने साहित्य में दो कौड़ी की रुचि रखने वाले मातहतों को दफ्तर के समय में कविता - कहानी की किताबों की समीक्षा का काम देकर अपने नाम से छापने का काम और बत्तीसी दिखाते थोबड़े पूरी श्रद्धा से कर रहें है
कुछ लेखकों के अन्य स्रोत हैं रीच पाने के मसलन, शोधार्थी, छात्र, शहर भर के गोलू मोलू टाईप नेता, सब्जी वालों से लेकर गाड़ी वाला कचरा निकाल के ड्राईवर , बीबी बच्चे, ससुराल वाले, विश्वास मानिए एक लेखक के साले ने कहा कि - "जियाजी की पोस्ट शेयर नहीं की तो वो दीदी को प्रताड़ित करते है" , आप सोच सकते है कितने कुंठित है हिंदी के साहित्यकार
कमाल यह है कि लगभग सारे लोग इन दोनों टैग्स का इस्तेमाल बेशर्मी से कर रहे हैं और जनता को पेल रहे है, यारा एक काम करो - कही जाकर डूब मरो
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The Last Tenant
"प्यार प्रायश्चित कभी नहीं हो सकता" - अमर और अप्रतिम कलाकार इरफान साहब की यह फिल्म सिर्फ 43.45 सेकेंड्स की है, यूट्यूब पर है, जरूर देख लीजिए बहुत कुछ समझ आ जायेगा
प्यार, फोकस, जीवन का उद्देश्य, एकाकीपन, संगीत, और अंत में समर्पण
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सकल हंस में राम बिराजे
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समय का कोई भरोसा नहीं और किसी से कुछ करना नहीं है, लेना देना नहीं इसलिए बेबाक रहिए, मस्त रहिए - अकेले थे, अकेले है और अकेले ही रहेंगे और अंत में अकेले ही जाना है, ये तेरा - ये मेरा करते हुए जो हम प्रपंच में पड़कर, रिश्तों का लिहाज करते हुए दूसरों के लिए सम्मान, भरोसा या विश्वास रखते है - यह सब व्यर्थ है, क्या आपको किसी से चरित्र प्रमाणपत्र लिखवाना है या नोबल पुरस्कार लेना है
आपने देखा होगा कि बहुत करीबी या बहुत शिष्ट लोग भी समय आने पर नीचता पूर्वक बात या व्यवहार करके आपका विश्वास डिगा देते है और तब आपको समझ आता है कि आप लिहाज करके व्यर्थ ही अपने जीवन में इन नीच और नालायकों को पर्याप्त से ज्यादा सम्मान और जगह दे रहे थे - जबकि ये दो कौड़ी के घटिया आदमी मुंह लगाने लायक नहीं है, दुनिया धूर्त और पाखंडियों से भरी पड़ी है, हर कोई आपको इस्तेमाल करना चाहता है - इसलिए इन लोगों से जितना दूर रहा जा सकता है - रहा जाएं
सारी वर्जनाओं, लिहाजों, गरिमा, दर्प और सम्मान आदि को छोड़कर जीना सीखिए - सिर्फ अपने लिए, अपने लिए मेहनत कीजिए और अपने लिए जीएं, अपने कम्फर्ट जोन बनाएं और अपना निजी स्पेस और बस उसी में रहें और वो सब करिए - जो आपको सुकून देता है और खुशी देता है, यदि आप खुश रहें और ठीक रहें तो आपके आसपास के परिजन, मित्र और वृहद समाज अपने आप खुशहाल होगा इसमें कोई शक नहीं
मरने के बाद आपको कोई याद नहीं रख रहा और ना ही आपकी स्तुति करते हुए अश्रुओं में डूबकर अपना शेष जीवन निकाल देगा, इसलिए जीना सीखिए - सिर्फ अपने लिए, जो अच्छा लगता है वो करें और बाकी वरिष्ठता, ग़रिष्ठता, ज्ञान, उसूल, सामाजिक बोध, इंसानियत और तमाम तरह की मूर्खताओं को ठेंगे पर रखकर खुलकर जिंदगी जीये, दूसरों के जीवन में जो हो रहा है उसके लिए आप दोषी नहीं और जैसा कि शेक्सपियर कहता है - "Time is out of joint, I was not born to set it Right" and ultimately every life is a tale told by an idiot"
याद रखिए - हर गुजरने वाला पल आपका आखिरी पल है - जो लौटकर नहीं आने वाला है, यदि आप ईश्वर मानते है तो यह विश्वास रखिए कि उसके पास आपके लिए बेहतरीन योजना है - जो समय आने पर पूरी होती जाएंगी, यदि आप निर्गुणी है तो फिर काहे की फिक्र, एक फकीर की भांति जीते हुए जीवन को बहने दीजिए , एक दिन ठौर पर लग ही जायेगा
शरीर, बीमारी, तनाव, रूपया, संसाधन और जिंदा रहने के लिए रोटी - कपड़ा - मकान आदि सब माया है, जीवन के इस सबके बहुत परे है, ऊंचा है तथा यह समीचीन है कि शांति - संतुष्टि और खुशी इन सबसे नहीं मिलती और उस ओर ही हमें लगातार जाने का प्रयास करते रहना है, जीत - हार का एक ही हश्र है - "पंच तत्वों का मिट्टी में मिल जाना" और यह शाश्वत सिद्धांत पूरे जीव जगत के लिए है - हाथी की विशालकाय काया हो या अमीबा का एक कोशीय जीवन
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