Skip to main content

Posts of 29 Dec 15

कितने साल समाज को छलते रहोगे अपने फायदे के लिए । जाति बताओ नया नारा आने वाला है अब कुमार और सिर्फ उपनाम से या किसी फेंकू नाम से काम नही चलेगा

*****
यदि केंद्र सरकार में दम हो तो सब्सीडी के साथ साथ आरक्षण हटाये नहीं तो सुधारों की और विकास की बात करना बंद करें. बहुत हो गई बयानबाजी और मूर्खताएं.
दस लाख से ज्यादा वालों को आरक्षण की जरुरत है नही है शिक्षा, नौकरी और प्रमोशन में और अब जिन लोगों ने ले लिया है उसका लेखा जोखा तो हर विभाग से लेकर हर जगह मौजूद है बस करें उनका खाता खत्म करो और बंद करो.
और अगर यह करने का दम नहीं है तो फ़ालतू बातें करना बंद करो और बुद्धिजीविता मत झाड़ों. क्योकि आरक्षण की मलाई तो वो चाट रहे है जो सवर्ण बन गए है और अपने सरनेम भी शर्मा, भार्गव, कुमार या कविराज स्टाईल में कोई घटिया सा उपनाम लगा कर अपनी जाति छुपा रहे है, तमाम प्रशासन और बड़े पदों पर बैठे बेशर्म लोग अपनी जाति परदे के पीछे छुपाकर फ़ायदा ले रहे है और सिर्फ नौकरी या शिक्षा में प्रवेश नहीं वरन आय ए एस जैसे काडर में भी प्रमोशन ले लेते है या विदेश चले जाते है फेलोशिप लेकर या उच्च शिक्षा प्राप्त करने या आय आय एम् में सरकारी कोटे से और जनता की कमाई से कोर्स करने चले जाते है. यह भी नैतिक भ्रष्टाचार है.
अगर देना ही है तो मंडला, डिंडोरी, झाबुआ, आलीराजपुर, बालाघाट जैसे भयंकर पिछड़े क्षेत्र के आदिवासियों को दो जिन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा और सदियों से पीसते चले आ रहे है.

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास.    बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है) मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण.............. तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले......... चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास  यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास.    यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी व...