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Posts of 8 to 12 May 2020

एक वायरस ने सब ध्वस्त कर दिया - हम अवसर को उपलब्धि में बदलें ◆◆◆ ●प्री और पोस्ट कोरोना और वैश्विकता ●आत्मनिर्भरता ●उपकरणों की अनुपलब्धता और आज का प्रोडक्शन 2 लाख प्रतिदिन ●आपदा को अवसर में बदलने की दृष्टि ●अर्थ केंद्रित बनाम मानव केंद्रित वैश्वीकरण ●आशा की किरण ●संस्कृति संस्कार ●वसुधैव कुटुम्बकम ●संसार के सुख सहयोग और शांति की चिंता ●जय जगत की बात ●जीव मात्र का कल्याण ●एक सुखी समृद्ध विश्व की संभावना ●भारत के लक्ष्यों का प्रभाव विश्व कल्याण ●खुले में शौच, कुपोषण, पोलियो का असर ●ग्लोबल वार्मिंग ●योगा दिवस उपहार है ●भारत की दवाईयां आशा है ●दुनिया में भूरी भूरी प्रशंसा और विश्वास हम श्रेष्ठ दे सकते है ●आत्म निर्भरता का संकल्प ●सदियों का गौरवपूर्ण इतिहास ●सोने की चिड़िया के समय विश्व कल्याण ●गुलामी की जंजीर में विकास की तड़फ ●Y2K संकट से हमने निकाला ●बेहतरीन टेलेंट है हमारे पास ●सप्लाय चैन आधुनिक बनाएंगे ●कोई लक्ष्य असम्भव नही - कच्छ के समय किया ●5 स्तम्भ - अर्थ बाजार क्वांटम जम्प वाली, इंफ्रास्ट्रक्चर , सिस्टम जो ट्रक्नॉलॉय ड...

Aniruddha and Shreya's Marriage in LockDown 12 May 2020

दुनिया बदल रही है हमारे लाड़ले चि.अनिरुद्ध की शादी 15/16 अप्रैल को सौ. श्रेया के साथ तय हुई थी, परन्तु लॉक डाउन के कारण यह सम्भव हो नही पाया, सबको बुलाना था, पत्रिकाओं से लेकर सब तैयारी हो गई थी श्रेया और अनिरुद्ध क्रमशः पूना और मुंबई में काम करते है, दोनो पेशे से इंजीनियर, प्रबंधन की उच्च डिग्री प्राप्त युवा और दक्ष लोग है - अपने काम में बेहद मुस्तैद और कौशल से पूर्ण इन दिनों घर आये हुए थे, वर्क फ्रॉम होम चल रहा था - दोनो ख़ुश है यही हम सबके लिए बड़ी खुशी की बात है और दोनो ने श ादी सादगी से करने की अनुमति दी यह भी बड़ी आश्वस्ति थी - काम के सिलसिले में महीने में 15 से 20 दिन दुनिया जहान घूमते रहते है तो सादगी का महत्व वे जानते ही थे, घर में मुश्किल से 10 दिन वरना जर्मनी, जापान, फ्रांस, लंदन, दुबई, अमेरिका और ना जाने कहाँ कहाँ परन्तु 24 तारीख से इस विपदा के कारण उन निर्धारित तारीखों में विवाह हो नही पाया , हमें रविवार को सीमित संख्या की उपस्थिति में विवाह करने की अनुमति मिली, हड़बड़ी में कल कुछ रीति रिवाज किये और आज अभी शादी घर में ही सम्पन्न हुई बदले परिवेश में यह अनूठी शादी अ...

Posts of 4 to 8 May 2020 Corona

मशरूम की बनी ये रोटियाँ कमबख्त पचा नही पायें और पटरी पर छोड़कर मर गए अब ये लोकसभा के कैंटीन में भिजवा दो और कुछ पटरियां वहां से भी निकाल दो - बेशर्मों का ज़मीर ना संसद हमले में मरता है, ना दंगों में, ना बीमारी में , ना महामारी में, ना हवा में, ना सड़कों पर और ना कभी पटरी पर इन रोटियों को इनके घर - दफ्तर तक भिजवाओ - इनके बच्चों और बीबी, माँ - बाप तक पहुँचा दो - शायद इनमें से ही किसी का ज़मीर मर जाये या हो सकता है इनमें से ही कोई मर जाये अबकी बार रोटियों की ना जात होती है ना धर्म और ना राज्यों की सीमाएँ - यह समझ है भी है कि नही इन मशरूमों की # खरी_खरी *** औरँगाबाद में मरे मजदूर हादसे में मरे क्या बिल्कुल हादसा है जनाब गलती मजदूरों की है साले यहाँ पैदा ही क्यों हुए, पलायन पर जाते क्यों है - ऐश करते है बाहर जाकर, इनकी लड़कियां और औरतें धँधा कर खूब कमाती है बड़े शहरों में, ठेकेदारों से फंसी रहती है और सुनो लॉक डाउन सरकार की मजबूरी है मजदूरों की नही , सरकार तो कह रही यही रुको , फोकट में खाओ और मौज उड़ाओ, मस्त दारू पियो - ठेके खुल गए घर जाकर क्या करोगे तुम ये सबके सब साले बदम...

आकाश की जात बता रे, प्रगति के रास्ते बाई और खुलेंगे Posts from 30 April to 3 May 2020

प्रगति के रास्ते बाई ओर खुलेंगे - सकारात्मक बने रहिये ◆◆◆ आया समय बड़ा बेढंगा नाच रहा नर होकर नंगा - स्व प्रदीप भूख, गरीबी, पलायन, कुपोषण, सुशासन, बेरोज़गारी, तानाशाही, बदइन्तजामात, शोषण, देश भक्ति के नाम पर आज फिर आम आदमी का मखौल उड़ाया गया संगठित स्तर से बड़े पैमाने पर इस देश मे टैक्स पेयर्स, जीएसटी और तमाम तरह के कर्जों के तले दबे लोगों के रुपयों की बर्बादी यह सरकार या तो इस तरह से करती है या कुछ हरामखोर उद्योगपतियों के कर्ज माफ करके करती है या अम्बानी अडानी जैसे आकाओं को सबका रुपया सौंपकर करती है या विजय माल्या और नीरज मोदी को देश से भगाकर करती है या मूर्तियां बनवाकर करती है - जैसी अक्ल वैसी करनी इतिहास याद रखेगा कि 40 हजार से ज्यादा लोग महामारी से पीड़ित थे और प्रतिदिन लोग मर रहें थे तो सरकार के नीरो तमाशेबाज बनें वाहवाही कमाने में लगे थे धूर्त व्यापारियों से और क्या उम्मीद कर सकते है जो लाशों की भीड़ में इमोशन का सौदा करके ख़ुश हो रहें है , गरीब मजदूरों से घर जाने का किराया मांग रहे पर इस तरह की नौटँकी के लिए रुपये की कमी नही - शर्म है या नही पता नही और जनता...

Posts of 28 and 29 April 2020 - मप्र में नरक यात्रा

मप्र में नरक यात्रा फर्क नही नरक और अस्पताल में - क्योंकि एमपी अजब है सबसे गजब है 15 वर्षों तक एक ही व्यक्ति एक ही पार्टी सरकार रही प्रदेश में आज जो शिक्षा स्वास्थ्य की हालत है वह कितनी शोचनीय है यह बताना मुश्किल है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में गत 15 वर्षों में जो अरबो रुपया आया - प्रशिक्षण, उपकरण और सेवाओं के नाम पर और बावजूद इसके जिला अस्पताल खुद आईसीयू में है बाकी पीएचसी और उपस्वास्थ्य केंद्र तो छोड़ ही दीजिये और सामुदायिक केंद्र तो भ्रष्टाचार और लापरवाही के संगठित अड्डे है ही डॉक्टरों की कमी का रोना भारत सरकार रोती है तो मप्र की बात ही मत कीजिये सिर्फ आशा के भरोसे चल रहे इस पूरे तंत्र को समझने की कोशिश करें जो ब्यूरोक्रेट्स द्वारा नियंत्रित है और डॉक्टर्स सिर्फ घरों में लैब्स, नर्सिंग होम और दवाई की दुकानें खोलकर बैठे है कल इंदौर के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी से बात हुई जिन्होंने कहा कि " डॉक्टर्स इस समय मे भाग गए और यह कोरोना की लड़ाई का सबसे बड़ा दुखद पहलू है " मप्र में यूनिसेफ से लेकर तमाम संस्थाओं के कंसल्टेंट झोला उठाकर आंकड़ेबाजी में व्यस्त र...

IIMC Products and Media Posts of 26/27 April 2020

एक पत्रकार महोदय से कल बहस हुई जो कम उम्र में भयंकर लिखकर छा जाना चाहते है हिंदी, अंग्रेजी अखबारों से लेकर मलयालम मनोरमा के सम्पादक बनने का इरादा रखते है अपनी 30 की उम्र पूरा होने से पहले कहने लगे " मेरी लेखनी रिसर्च आधारित है" जब रिसर्च का मतलब पूछा तो बोले - " वायर, प्रिंट, कारवाँ, हिन्दू, न्यूयार्क टाईम्स, डेक्कन हेराल्ड, अल जज़ीरा, सीएनएन, बीबीसी, और देश की गाय पट्टी के तेजी से बढ़ते घटते अख़बार को पढ़ - लिखकर समझकर और विश्लेषण कर लिखना ही रिसर्च है " " और जो विज्ञान कह रहा है, बड़े डॉक्टर्स इन दिनों जो लिख रहे है वो क्या है - उसका सन्दर्भ कही नही आता, क्या आपके लेख में उसकी जरूरत नही वैज्ञानिक तथ्यों की प्रामाणिकता जांचने के लिए, भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय, एम्स आदि का क्या " मेरा सवाल "अरे ये सब लोग बेवकूफ है, और इस रिसर्च से मेरे लेख की पठनीयता घटेगी और फिर शेयर्स, लाईक और कमेंट तो आएंगे नही और फिर मीडिया डॉन बनने का स्वप्न धूल धूसरित नही होगा - समय नही है, पत्रकारिता के संस्थान से निकला हूँ तो वहाँ के मास्टरों को भी बताना है कि...

बूमरेंग , Palghar, Mumbai 20 April 2020

बूमरेंग ◆◆◆ और हमें लग रहा था कि हम सिर्फ मुस्लिम को मारेंगे 47 के विभाजन में, भिवंडी में, मुज्जफरपुर में, गोधरा में, बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद, और तमाम तरह के लिंचिंग करके , हम सिर्फ सिखों को मारेंगे 1984 मे 1947 के पहले से जो जहर हमने बोया था , जो जाति सम्प्रदाय के इंजेक्शन खून में लगा दिए थे आखिर उनका रंग रुप तो एक सीन सामने आना ही था - बहुसंख्यक भीड़ आवारा होती है जो ना साधु देखती है ना पहरेदार सुबोध सिंह - उसे अपनी खून की प्यास और वर्चस्व की भूख मिटाने को टारगेट चाहिये और हमने यह अच्छे से सीख लिया है कि कैसे संगठित होकर जन भावनाएं भड़काकर हत्याएं की जायें पैटर्न देखिये और समझने की कोशिश करिये - कही भी कहा नही जाता कि जुलूस निकालो पर निकलते है, कोई नही कहता कि जय सियाराम के नारे लगाओ पर विक्षप्तों की तरह से अंधेरे में लोग चिल्लाते है, कोई नही कहता कि घर की अराजकों की तरह निकल पडों पर लोग चल देते है हमने 73 सालों में सीखें अनुशासन, पक्का इरादा, दृढ़ संकल्प, गरिमा, दृष्टि सब खो दिया है, हमारा कोई चरित्र नही, हम सब दृष्ट दुराचारी, व्याभिचारी, निरंकुश और अराजक है - और इसके...