"मनुष्य बली नहीं, समय होत बलवान"
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गत 17 जुलाई की बात है, मै जयपुर के लिए निकल रहा था और छत पर गमले में कुछ नींबू लगे थे, सोचा आने तक गिर जायेंगे और शायद खराब भी हो जायेंगे, इसलिए तोड़कर फ्रिज में रख देता हूँ, गलती से जल्दी में स्लीपर पांव में नहीं थी, तोड़ने में नींबू का एक छोटा सा काँटा बाये पैर की एड़ी में चुभ गया, मैंने तुरंत खींचकर निकाल दिया, थोड़ी देर दर्द होता रहा - पर लगा कि ठीक हो जायेगा
उसके बाद मैं निकल गया यात्राओं पर, दो - चार दिन बाद एड़ी में दर्द शुरू हुआ और लगा कि एड़ी में कुछ चुभ रहा है, फिर याद आया कि यह तो वही काँटा है, उसके बाद असहनीय दर्द, चलने में दिक्कत, रात को नींद नहीं और एड़ी में लगातार जैसे शूल चुभ रहें हो, सारा ध्यान इस पर ही लगा रहता हर दम
मित्रों, परिजनों और शुभ चिंतकों ने - जैसा कि होता है ज्ञानदान शुरू किया - "आंकड़े के दूध से लेकर नींबू बाँधना, गुड का चटखा, गुड - हल्दी गर्म करके बांधना,अजवाइन, अंबी हल्दी को चुने के साथ मदार के पत्ते में बांधकर सोना" और तमाम तरह के इलाज, पर ये काँटा भाजपा सरकार की ईवीएम मशीन की तरह से फंस गया पूरे सिस्टम में जो निकले ही नहीं और दर्द बढ़ता जा रहा था
शुगर होने से बहुत ज्यादा डर लग रहा था, और हम हिंदुस्तानी लोग ऐसे - ऐसे उदाहरण देते है कि सांस रूक जाए सुनकर ही - "निकला लो, गैंगरीन हो जायेगा, सेप्टिक हो जायेगा, पैर काटना पड़ेगा, बैसाखी से चलने की तैयारी कर लो, स्थाई विकलांगता होगी पर अब सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी अब, साठ के हो गए बुढ़ापा कैसे कटेगा एक पांव से, मेडिकल प्रमाणपत्र बनवा भी लिया तो विकलांग पेंशन लेने में दिक्कत होगी" यह सब सुनकर और नींद नहीं आती
सोनोग्राफी करवाई, सर्जन को दिखाया - उस दिन बैंगलोर एयरपोर्ट के पास में तो बोला "शुगर नॉर्मल करिए फिर ऑपरेट कर दूंगा, तीन सेंटीमीटर भीतर है पर रेस्ट करना होगा, 632 फास्टिंग की शुगर पर चीरा लगाना बहुत बड़ी रिस्क है सर "
हालत खराब हो रही थी, पांव गर्म हो जाता और शूल चुभते पूरे पंजे पर, कल भी रात भर नींद नहीं आई, अपने लाड़ले पुत्रवत और छात्र डॉक्टर अर्पण दुबे को पूछा, जो इंदौर मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्राध्यापक है, तो अर्पण ने कहा कि - "गुरुदेव यहां आ जाइए कोई भी काटकर निकाल देगा, या मैं ही कर दूंगा यह नेक काम", पर मन नहीं मान रहा था, बचपन में सच में शुगर के कई मरीजों को इस हालत में देखा है
आखिर आज राखी के शुभ अवसर कर हिम्मत की, तेज धार वाले चाकू और एक बड़े सुए को गैस की आंच पर खूब गर्म किया, खूब सारे डेटॉल में डाला और आँख बंद करके खुरचना चालू किया, थोड़ा मवाद पड़ रहा था, फिर चाकू से चीरा लगाया और जब तीन - चार सेंटीमीटर चाकू अंदर गया तो सुए को धीरे से डाला और जैसे ही यह दुश्मन नजर आया तो खींचकर निकाल लिया, दर्द तो पूछो मत, पर आँसूं पोछने वाला जब कोई ना हो - तो आँसूं भी कमबख्त सूख जाते है
आखिर काँटा निकला, मवाद को दबा - दबाकर बाहर किया और फिर बिटाडीन की ट्यूब लगाकर ड्रेसिंग किया, इन महाशय की तस्वीर खींची
कुल मिलाकर एक - डेढ़ सेंटीमीटर का काँटा था, जो इतने बड़े शरीर में फंसा था - 17 जुलाई से, पर इसने जो तकलीफ दी - वह बर्दाश्त के बाहर थी, मित्रों जीवन में बहुत सारी समस्याएं, अपने या पराए लोग, मित्र, सहकर्मी ठीक इसी तरह से होते है जो फंस जाते है और हमारा जीवन नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, सारे देशी - विदेशी इलाज के बावजूद वे तकलीफ़ देते रहते है चौबीसों घंटे - बस थोड़ी हिम्मत कीजिए और कुरेदकर निकाल बाहर कीजिये, तकलीफ एक बार ही होगी, पर आराम मिलेगा - यकीन मानिए
जीवन एक ही है - ना आगे, ना पीछे कोई जन्म है और इसे बग़ैर किसी की परवाह किए या लोकलाज या लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए मत गंभीरता से लीजिए - अपने हिसाब से जीये और यदि कोई काँटा फंसता है तो कुरेदकर फेंक दीजिए - घाव जरूर होगा पर याद रखिए - "मनुष्य बली नहीं, समय होत बलवान" सब ठीक हो जायेगा
एक काँटा और निकल गया आज जीवन से
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साई ताम्हणकर, चिन्मय मांडलेकर, सुबोध भावे, माधुरी भारती, धनञ्जय सरदेशपांडे, पद्मनाभ सिंह, अमृता वकील एवं संभाजी सासाने जैसे मंजे हुए कुल आठ कलाकारों से बनी "बोल - बोल राणी" मराठी फिल्म सिद विंचुरकर के सधे हुए निर्देशन में बनी अदभुत फिल्म है
जरूर देखिए मजा भी आयेगा और प्रेम, रूपया, बाजार के साथ समर्पण, कुंठा, अपराध, द्वेष और राग - अनुराग भी समझ आयेगा
अमेजन प्राईम पर उपलब्ध है
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ये किस मकाम पे तुझे सूझी बिछड़ने की
कि अब तो जा के कही दिन सँवरने वाले थे
* जमाल एहसानी
मिला जिन्हें उन्हें उफ़्तादगी से ओज मिला
उन्हीं ने खाई है ठोकर जो सर उठाकर चले,
अनीस! दम का भरोसा नहीं, ठहर जाओ
चराग़ ले के कहाँ सामने हवा के चले
• मीर अनीस
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मीडिया की आज जो हालत है - वह देखकर दुख नहीं होता अब क्योंकि हमने या मेरी पीढ़ी ने मीडिया का सर्वश्रेष्ठ समय देखा है, वैसे तो इंदौर के विश्वभ्रमण, नवभारत, इंदौर समाचार, स्वदेश, नईदुनिया, फ्री प्रेस और बाद में इंदौर आए दैनिक भास्कर से लम्बा जुड़ाव रहा है, पर इस सबमें सबसे ज्यादा जुड़ाव लगाव और अपनत्व नईदुनिया से मिला
बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग पर स्थित नईदुनिया का दफ्तर नहीं वो घर था - हम सब मालवा वालों के लिए, जहाँ वर्तनी मिलाने से लिखना सीखना और समझ बनाने का काम बहुत ही अनौपचारिक रूप से किया जाता था, रज्जू बाबू, प्रभाष जी, शरद जोशी जी, से लेकर राहुल बारपुते जी वो स्तम्भ थे - जिन्होंने नईदुनिया को अखबार का दफ्तर नहीं मालवा के लिए सबका घर बनाया, जहाँ पत्रकारिता, संगीत, संस्कृति, नाटक, कला और विकास की धाराएं नित्य बहती थी
देवास से अक्सर स्व कुमार गंधर्व जी के साथ मैं इंदौर के नईदुनिया दफ्तर शाम को जाता था, बाबा बड़े प्यार से अपनी एम्बेसेडर में ले जाते और वहां कला गुरू विष्णु चिंचालकर, राहुल जी, बाबा डीके, और कुमार जी की संगत में बैठकर सारे गंभीर वार्तालाप सुनता, राहुल जी को अपना लिखा दिखाता तो वे पहले वर्तनी सुधारते अपने हरे पेन से फिर प्रदीप दीक्षित को दे देते कि देखो यह "पत्र संपादक के नाम" में छप सकता है क्या, चार वर्ष हिंदी की वर्तनी सुधारने के बाद पहली बार उस कॉलम में सन 1984 में देवगढ़ हत्याकांड जिसमें एक आदिवासी को पुलिस ने गोली मार दी थी पर पत्र छपा - जिसे पांच हजार रुपए का इनाम मिला था, स्व जाकिर अली 'महरूम' मप्र पत्र लेखक संघ के अध्यक्ष थे, और तत्कालीन दूरदर्शन के निदेशक कुबेरनाथ ने वो इनाम दिया था इंदौर में
नईदुनिया ने एक लंबी पीढ़ी तैयार की लेखकों की और अपनी टीम भी जिसमें रविन्द्र शुक्ला, रविंद्र शाह, प्रदीप दीक्षित, शचींद्र जलधारी, शाहिद मिर्जा, यशवंत व्यास से लेकर रविन्द्र व्यास तक जो कालान्तर में नईदुनिया छोड़कर यहां - वहां गए और बढ़िया काम किया, मुझे याद है रविन्द्र शुक्ला, रविन्द्र व्यास या शाहिद भाई सिर्फ रिपोर्टर नहीं - बल्कि मंजे हुए संस्कृति कर्मी थे, शाहिद भाई नाटक के उस्ताद थे और उनकी लिखी समीक्षाएं - उफ्फ, रविन्द्र शाह की रिपोर्टिंग, रविन्द्र शुक्ला की कृषि और बागवानी पर पकड़, साथ ही "तस्वीर गांवों की" नामक स्तंभ में जो विकास की खबर लेते थे - उससे शासन की नींद उड़ जाती थी , प्रदीप दीक्षित ने शायद जीवन भर पत्र संपादक का कॉलम सम्हाला और उसमें छपने के लिए लोग पसीना लगा देते थे, उन साप्ताहिक बैठकों के मजमे में तमाम लोग आते और अपने आइडियाज़ शेयर करते, अपनी बात, समस्या कहते, सुझाव देते और राहुल जी सबको संयत भाव से सुनते और कहते कि "देखता हूँ कैसे आपकी बात हम अपने अखबार में ले सकते है"
रामशरण जोशी जी से लेकर बसन्त कुमार तिवारी जी जैसे लोग थे जो नियमित लिखते थे - दिल्ली से रायपुर तक की रिपोर्ट और उस पर जो चर्चा होती और फिर बदलाव वह अदभुत था, मैंने कभी राहुल जी की उस बैठकी में नरेंद्र तिवारी जी या अभय छजलानी जी को झाँकते हुए नहीं देखा या संपादकीय से लेकर खबर में हस्तक्षेप करते नहीं देखा, संपादक को पूरी छूट थी और कोई दबाव नहीं था - लहलहाता हुआ अखबार होता और खबरों, आलेखों के फल और ठीक अगले दिन से खबरों पर प्रतिक्रियाएं , देवास से रमाशंकर चौधरी, डॉक्टर Prakash Kant जी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रभु जोशी के आलेख कॉलम में छपते, स्व नईम जी और होशंगाबाद के विनोद निगम जी के नवगीत छपते तो हम सब चाव से पढ़ते और चर्चा करते थे, मुख्य पृष्ठ पर एक तस्वीर का छपना भी चर्चा का मुद्दा होता फिर वो कैलाश सोनी की तस्वीर हो, सुबंधु दुबे, श्रेणिक जैन, Banshilal Parmar जी की, भालू मोंढे की या किसी और की
असल में कल Brajesh Kanungo भाई ने अभी प्रदीप दीक्षित जी के साथ एक तस्वीर साझा की और दोनों साथी देवास के है, साथ ही वर्षा मिर्ज़ा जी ने शाहिद भाई के बेटे के जन्मदिन की एक वीडियो क्लिप डाली तो मुझे याद आया कि मीडिया जैसा शब्द ही मेरे शब्दकोश में नहीं है, नईदुनिया घर था, भास्कर में यतीन्द्र भटनागर जी पहले संपादक के रूप में आए थे, उसी समय शायद DrPrakash Hindustani जी भी बिहार या मुंबई से इंदौर आए थे और ऐसा माहौल था कि अखबार हमारे लिए सहज, सुलभ और accessible थे, फिर क्या कारण हुआ कि अखबार - जो जनता और समुदाय के थे, सरकार के बनते चले गए और जनता से ही दूर हो गए
आज दुख तो होता है, पर लगता है उस स्वर्णकाल का साक्षी होना, उस समय में लगभग पांच सौ से ज्यादा आलेख नईदुनिया से लेकर जनसत्ता, फ्री प्रेस, भास्कर, संडे टाईम्स, नवभारत, स्वदेश, विश्व भ्रमण, हिंदुस्तान, जागरण, क्रानिकल, सुरेश सेठ के इंदौर समाचार से लेकर देश के प्रतिष्ठित अखबार पत्रिकाओं में छपना बड़ी बात थी, आज ना अखबारों में जगह है - ना छपने की कोई सदिच्छा और कोरोना के बाद से अखबार पढ़ना ही बंद कर दिया हैं - क्योंकि पढ़ने - लिखने की इच्छा ही नहीं होती
बहरहाल, एक संस्कृति को जीते हुए सुनहरा अतीत साथ हो तो जीवन ऊर्जा बची रहती है, और मुझे गर्व लगता है यह कहने में कि एक भरपूर परिवार और साथियों के संग समय बीताया है और यही धरोहर है मेरे लिए
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शस्य श्यामला सुजलाम सुफलाम
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आपको बड़े शहरों में बरसात के तांडव और उससे उपजी समस्या की हक़ीक़त दिखाते मीडिया की तस्वीरें विचलित नहीं करती, बस में बैठे बच्चों के चेहरे नहीं डराते, डरावनी सड़कों के गड्ढों में गिरती गाड़ियां, बाइक पर डूब कर मर रहे युवा, महिलाएं और बच्चे आतंकित नहीं करते, तो आप जिंदा नहीं मत चुके है, कायर और बुझदिल होने से, चुप रहने से आपका आत्महत्या कर लेना ही बेहतर है
मेरे शहर से शुरू करता हूँ - पिछले आठ - नौ बार से भाजपा के विधायक है और एक ही परिवार के - पहले पति थे और बाद में तीसरी बार उनकी पत्नी, नगर निगम भाजपा की है पिछली तीन भ्रष्ट पारियाँ खेल चुकी निगम परिषद् ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं पार कर दी है - पूरे शहर में एक भी कोना ऐसा नहीं है - जो खुदा नहीं है और बड़े - बड़े नाले गड्ढे और गंदा पानी, कचरा और कीचड़ नहीं है, मुख्य मार्ग एमजी रोड की जो हालत है - उस पर यमराज भी आने से डर रहें है, पर नीचता और हरामिपन की पराकाष्ठा यह है कि ना महापौर, ना विधायक और ना सांसद को फिक्र है और हमारी मीडिया दलाली करके इन तीनों के दरवाजों पर कुत्तों की तरह खड़ी पूंछ हिला रही है और रूपये कमा रही है
देवास से दिल्ली तक इंफ्रा स्ट्रक्चर की हालत सन 2014 से तुलना करके देख लीजिए, आपकी अंध भक्ति और मोदी प्रेम जाए भाड़ में - उसकी पोंगली बनाकर आपको जहां डालना है - डाल लीजिए, पर एक बार इस देश के नागरिक होने के नाते सोच लीजिए कि किस देश में और किन सुविधाओं के बरक्स आप जी रहें है - भाड़ में जाने दीजिए पेट्रोल, शक्कर या महंगाई को, पर आपको सड़क, बिजली, पानी और साफ हवा तो चाहिए ना - इसमें कांग्रेस या भाजपा क्या करेगी, पर इस मोदी सरकार और इसके नितिन गडकरी जैसे भ्रष्ट मंत्रियों ने जो सत्यानाश आपके जीवन का किया है - वह आपको नहीं दिख रहा, आपको पानी की निकासी वाला तंत्र अस्सी सालों में नहीं मिल पाया, नाली से पानी सही तरीके से निकल जाएं, सड़कों पर जल जमाव ना हो अगर यह हमारा प्रशासन और IITs, IIMs के दक्ष इंजीनियर या प्रबंधन के तंत्र, क्रीम कहे जाने वाले ब्यूरोक्रेट्स नहीं कर पा रहे, तो बंद कर दो सब और सबको निरक्षर रहने दो, सही प्रबंधन की ग्यारंटी सरकार को लेना चाहिए, पर उस कपड़े बदलू आत्ममुग्ध और विदेश प्रेमी, धूर्त प्रधानमंत्री और चौबीस घंटे विधायक - सांसद खरीदने और मारने के लिए जुगाड़ में व्यस्त गृह मंत्री को क्यों बर्दाश्त कर रहें हो
मतलब शर्मनाक यह है कि देश के सबसे साफ शहर इंदौर में निगम का पानी पीने से सैकड़ों लोग मर जाते है और कही कोई इस्तीफा या कार्यवाही नहीं होती, इंदौर के सरकारी अस्पतालों का पानी इतना खतरनाक है कि फसलों के लायक भी नहीं, पर मरीज पी रहे है, बालाघाट में तीस से ज्यादा आदिवासी बच्चे पानी और कुपोषण से मर जाते है पर जूँ नहीं रेंगती और सिंहस्थ के लिए पैंतीस हजार करोड़ रूपया स्वीकृत हो जाता है और निठल्ले पोंगा पंथी साधु - संतों के नाम पर, धर्म के नाम पर बर्बाद होने को रख दिए जाते है वो भी पंथ निरपेक्ष राज्य में
शर्म नहीं आती इस देश के नालायक नेताओं को कि बच्चे घंटों बस के भीतर भी घुटनों तक डूबे पानी में बैठे घर जाने का इंतजार घंटों तक कर रहें हैं, मजदूर सड़कों पर पानी में खुले में बैठे है, किस वंदे मातरम की बात करता है अमित शाह - इस्तीफा देकर कही पंसारी की दुकान क्यों नहीं खोल लेता, जिस गुरूग्राम में पचास करोड़ का फ्लैट लेकर लोग रह रहे है और दुनिया की श्रेष्ठ साइबर सीटी कह रहे हो - वहां जीवन सिर्फ पानी की निकासी ना होने से बर्बाद हो रहा है, वहां का मंत्री मंडल बर्बाद होकर मर जाए - ऐसी दुआ तो हम इस देश के गरिमामयी नागरिक कर सकते है
सिवाय भ्रष्टाचार, घूमना - फिरना और षडयंत्र करके लोगों को खरीदना, बेचना और देश को बर्बाद करने के अलावा इस सरकार ने 2014 से आजतक कुछ किया हो तो बताइए, नोट बंदी से लेकर पेपर लीक भी भूल जाइए - पर मूल सुविधाएं भी यदि कोई सरकार नहीं दे सकती तो उस सरकार का खत्म होना जरूरी है, क्या दिल्ली, क्या मुंबई, क्या कोलकाता या क्या कोई गांव, क्या हुआ आदर्श सांसद ग्रामों का, स्मार्ट सीटी परियोजना का, सांसद - विधायक निधि का कोई हिसाब है - इन कमबख्तों के पास
मुझे कल से गुरुग्राम की स्कूल बसों में फंसे बच्चों के चेहरे देखकर दहशत हो रही है, अपने शहर में सब्जी लेने भी बाजार जाना हो तो हिम्मत नहीं हो रही - ऐसे में बताइए क्या वंदे मातरम के छह पैरा याद करके गाऊँ सीख भी लिया तो कहां गाऊँ
आक थू
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दो सौ शब्दों में नाप - तौल कर लिखी गई एक तथाकथित गैंग और उसमें कुछ उपकृत रचनाकारों की अर्ध शतकीय कहानियां एक पोर्टल पर पढ़ी , बस मुश्किल से दस प्रतिशत ही ठीक लगी लघुकथा के रूप में, बाकी तो जबरन का काफ्का, नीत्शे, गोर्की, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, टॉलस्टॉय से लेकर प्रेमचंद बनें कुंठित युवाओं, उधारी लेकर बदनाम हुए लेखकों की और किसी धन - बल और यश - कीर्ति की आशा में मोहपाश में उमड़कर पचास की संख्या पूर्ण करने के लिए ठूंस दिए गए रचनाकारों की कहानियां पढ़कर सोच रहा हूँ कि जो पीड़ा मैंने कहानी के नाम पर सही और समय बर्बाद किया - अधिकांश घटिया लेखकों को नवाचार और प्रयोग के नाम पर पढ़ते हुए - उसका हर्जाना कौन देगा
फिर बहुत साल पहले छपे "पहल" - संपादक स्व ज्ञानरंजन याद आए - जिन्होंने एक मध्यम वर्गीय परिवार के मुखिया द्वारा लिखित दो - तीन माह के घर के हिसाब - किताब को बाकायदा उसी तरह से कॉलम में कहानी बनाकर पहल में छापा था, मैंने तब भी ज्ञान जी को कहा था कि "नवाचार के नाम पर साहित्य का बंटाधार ना करें", पर अब तो बाकायदा पोर्टल बनाकर खेमों को समुदाय बना रहे है, गैंग बाज औरतों को स्थापित करने की होड़ है और अपनी लाइन बड़ी करने के चक्कर में जोकर्स की पीढ़ी बना रहे है चम्पादक
एक सड़ा'नीरा या छिंदवी कम था साहित्य के दिशा मैदान को जाने के लिए - जो मैदान में एक और पोर्टल उतार लाए, गंदा है पर अच्छा खासा धंधा है
[ जिसे समझ नहीं, हिंदी का इतिहास बोध नहीं और सम - सामयिक चम्पू लेखकों, दिल्ली की गैंग बाज स्त्रियों की समझ नहीं और अंतरराष्ट्रीय अ - स्तर के फर्जी जुगाड़ू और सेटिंगबाज संपादकों को जानता नहीं - वो यहां ज्ञान ना फैलाएं ]
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"पूस की रात" जैसी प्रसिद्ध कहानी प्रेमचंद ने सागर जिले के देवरी गांव में बैठकर पूस की रात को महसूस करते हुए लिखी थी, प्रेमचंद की बेटी और दामाद वहां रहते थे और सागर उनका आना - जाना लगा रहता था
मुझे आज यह मालूम पड़ा - देवास में आयोजित परसाई जन्मशती के एक कार्यक्रम में, क्या आपको यह बात मालूम थी
मेरी आधी अधूरी जानकारी यह भी है कि गुनाहो के देवता की नायिका सुधा भी शायद सागर विवि के अंग्रेजी विभाग में पढ़ाती थी, यह बात धर्मवीर भारती ने किसी से कही थी एक निजी बातचीत में, मित्र इसे दुरुस्त करें
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