Skip to main content

Khari Khari, Man Ko Chiththi and other Posts from 3 to 8 Aug 2026

Legal Practice and Implications
__________
The legal profession demands rigorous study, ethical conduct, and dedicated service to clients. Increasingly, however, social media appears to be filled with lawyers showcasing professionally designed posters, podcasts, reels, and self-promotional content. It often raises a genuine question: when do they find the time to read case law, prepare matters, meet clients, and appear before courts? Even senior or junior AORs are into pomp & show these days
There is nothing wrong with sharing legal awareness or educating the public. In fact, legal literacy is a valuable service. But there is a fine line between public legal education and self-promotion.
The professional ethics governing advocates in India require restraint in advertising and solicitation. The Bar Council of India Rules prohibit advocates from directly or indirectly advertising their professional services or using exaggerated publicity to attract clients. The dignity of the profession lies in competence, integrity, and courtroom advocacy—not in social media popularity.
As lawyers, our primary focus should be ;-
• Continuous study of law and judgments.
• Better preparation for our clients' cases.
• Upholding professional ethics.
• Contributing to legal awareness without turning the profession into a branding exercise.
Another concerning trend is the culture of excessive self-glorification, where every intern or junior is projected as an extraordinary legal expert after a few weeks of training. Mentorship is important, but the legal profession is built through years of disciplined learning, practice, and humility—not through catchy posters or viral videos.
The strength of a lawyer should be reflected in well-prepared arguments, ethical practice, and respect earned in court—not merely in social media engagement. Just a thought for introspection within our fraternity.
________
विधिक व्यवसाय और उसके निहितार्थ
विधिक व्यवसाय (Legal Profession) गंभीर अध्ययन, उच्च नैतिक आचरण तथा मुवक्किलों के प्रति पूर्ण समर्पण की अपेक्षा करता है - किंतु आजकल सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में अधिवक्ता आकर्षक पोस्टर, पॉडकास्ट, रील्स और स्वयं के प्रचार-प्रसार से जुड़ी सामग्री साझा करते दिखाई देते हैं, ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उन्हें कानून का अध्ययन करने, नवीनतम निर्णय (Case Laws) पढ़ने, मुकदमों की तैयारी करने, मुवक्किलों से मिलने और न्यायालय में प्रभावी पैरवी करने का समय कब मिलता है, आज तो अनेक वरिष्ठ एवं कनिष्ठ एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) भी इस दिखावे की संस्कृति का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं
जनसाधारण में विधिक जागरूकता फैलाना या कानून की जानकारी साझा करना निश्चय ही एक सराहनीय कार्य है, विधिक साक्षरता समाज की महत्वपूर्ण सेवा है, किंतु जनहित में कानूनी जानकारी उपलब्ध कराने और स्वयं का प्रचार करने के बीच एक स्पष्ट एवं महत्वपूर्ण अंतर है
भारत में अधिवक्ताओं के लिए निर्धारित व्यावसायिक आचार-संहिता (Professional Ethics) विज्ञापन और ग्राहकों को आकर्षित करने के प्रयासों में संयम की अपेक्षा करती है, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार कोई भी अधिवक्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी पेशेवर सेवाओं का विज्ञापन नहीं कर सकता तथा न ही अतिरंजित प्रचार के माध्यम से मुवक्किलों को आकर्षित कर सकता है, इस प्रतिष्ठित पेशे की गरिमा सोशल मीडिया की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि विधिक दक्षता, ईमानदारी, नैतिक आचरण और न्यायालय में प्रभावी पैरवी से स्थापित होती है
एक अधिवक्ता के रूप में हमारी प्राथमिकताएँ निम्नलिखित होनी चाहिए ;—
1- कानून, नवीनतम निर्णयों और विधिक सिद्धांतों का सतत अध्ययन
2- प्रत्येक मुकदमे की गहन एवं प्रभावी तैयारी।
3- व्यावसायिक नैतिकता और गरिमा का पालन
4- विधिक जागरूकता का प्रसार, बिना इसे व्यक्तिगत ब्रांडिंग या प्रचार का माध्यम बनाए
एक अन्य चिंताजनक प्रवृत्ति अत्यधिक आत्म-प्रशंसा (Self-glorification) की है, जहाँ कुछ ही सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद प्रत्येक इंटर्न या जूनियर को असाधारण विधि विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगता है, मार्गदर्शन (Mentorship) निस्संदेह आवश्यक है, किंतु विधिक व्यवसाय वर्षों के अनुशासित अध्ययन, निरंतर अभ्यास, अनुभव और विनम्रता से विकसित होता है—न कि आकर्षक पोस्टरों, रील्स या वायरल वीडियो से
एक अधिवक्ता की वास्तविक पहचान उसके सुविचारित तर्कों, न्यायालय में उसकी तैयारी, उसके नैतिक आचरण और न्यायपालिका व समाज से अर्जित सम्मान से होनी चाहिए, न कि केवल सोशल मीडिया पर उसकी सक्रियता या लोकप्रियता से
***
When the Life is Blur
"रो पड़ा वो फ़क़ीर मिरी हाथों की लकीरें देखकर
कहता है तुझे मौत नहीं, किसी की याद मारेगी"
• जौन एलिया
"मैं मरूंगा सुखी, मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है"
• अज्ञेय
"एक दिन मर जाओगे - सब ठीक हो जायेगा"
• पाश [शायद]
________
कभी - कभी एक छोटा सा शेर, कविता की दो पंक्तियां, आपको कितने बड़े सबक दे जाती है, कह नहीं सकते, खासकरके जब आप जीवन के मुश्किल दिनों में हो, गहन अंधियारे में डूबकर उजास के किसी छोटे से कोने की तलाश में हो - तो ये सब सुकून देता है, अचानक से सारे भय, अवसाद और चिंताएं दूर हो जाती है और मन बहुत हल्का हो जाता है
***
युवाओं को सहानुभूति और समझाने की जरूरत है
मो भा
______
गुरू जी, बहुत बना लिया युवाओं को संस्कृति के नाम पर खेल, ईर्ष्या, भड़काने और बरगलाने का काम, सौ साल से इसके सिवा कुछ नहीं किया तुम लोगों ने, इतनी ही चिंता है तो अपना पद छोड़ो और किसी महिला, दलित या युवा को सौंप दो, अरे तुम लोगों ने जगह - जगह शाखा लगाकर युवाओं को पढ़ाई से लेकर कौशल, दक्षताओं से वंचित रखा और खेल - संस्कृति की आड़ में बच्चों, किशोरों और युवाओं को शिक्षा से दूर रखा, सौ सालों में देश के भीतर हर जगह, हर तंत्र में भ्रष्ट, बेकाबू और कुंठित मानसिकता के लोग बैठा दिए और जिसके फलस्वरूप संविधान में निहित मूल्यों का सत्यानाश हो गया, कांग्रेस ने तो जो किया वह निन्दनीय था ही, पर तुम लोग तो बौद्धिक से लेकर बाल पत्रिकाओं में जहर परोसते रहें, शिशु मंदिरों ने शिक्षा नहीं दी बल्कि नफरत के बीज बोये है जिसका मैं स्वयं साक्षी हूँ
आज कह रहे हो कि जेन ज़ी से बात करना है और समझना है जब वे नौकरी, रोजी रोटी, शिक्षा और अपने घर - परिवार के साथ अपने लिए इस देश में सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहे है, तुम जैसे लोगों की वजह से व्यापमं, मणिपुर, इथेनॉल जैसे मुद्दें उभरे - जिसने आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है - मोदी, शाह, योगी से लेकर तमाम जोकर जो नेता के नाम पर कलंक है, ने देश का सत्यानाश किया और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर देश की बेइज्जती की, गली - मुहल्ले में बैंक या सरकारी नौकरी में भ्रष्टाचार करके निकले साधु - संतों ने करोड़ो कमाया, धर्म के नाम पर लोगों को लड़वाया और हद तो तब हुई जब राम के नाम पर 1992 से चले आ रहे अभियान का अंत चंदा चोरी के रूप में देश ने देखा
क्यों नहीं मोहन भागवत अयोध्या जाकर लोगों से बात करते है और चंदा चोरी पर बात करते है या देश के तमाम मंदिरों की बात करते है - जहां पंडितों और स्थानीय लोगों ने ने रणनीतिक रूप से अरबों रुपए हजम कर लिए
युवाओं को जिन्हें अठारह की उम्र के बाद वोट देने का अधिकार है - उन्हें आप और आपके प्रवक्ता "बच्चे" कहते है, पहले अपनी भाषा सुधार लो तुम सब लोग, वे वयस्क है तो बाकी बातें करना और अब वे तुम्हारी गोल - गोल बातों में आने वाले नहीं है
सीधी बात, सत्तर पार के लोग घर बैठो या कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक, पतंजलि पीठ या मुंगेर के आश्रम में जाकर अपने बीपी - शुगर का इलाज करवाओ, देश को चैन से रहने दो, सारे सत्तर पार लोगों को जूते लगाओ और भगाओ हर जगह से , इन हरामखोरों ने हर जगह - हर संस्थान में कबाड़ा किया है और इनके रुपए कमाने की हवस खत्म नहीं हो रही, अब ये खुद सम्हल जाएं या इन्हें सड़क पर दौड़ाकर बुरी तरह से निपटाया जाये - बहुत हो गया इन बूढ़ो का चुतियापा, साले कॉपी पेस्ट और बकवास करके सबको दीमकों की तरह से बर्बाद कर रहें है, इनको हर बात में समस्या है, हर सतावेज में काड़ी करते है, हर आदमी के काम में टाँग अड़ाते है
तुम लोग क्या संवाद करोगे युवाओं से - जिन्हें खुद एकालाप करने की आदत है, निकलो अब शराफ़त से वरना .... समझ रहे हो ना
***
राहुल जब मोदी के बोले तथाकथित सदवाक्यों को उद्धत करके यानी कोट करके बोलते है तो ओम बिड़ला का चेहरा ऐसा हो जाता है कि अब रोया - तब रोया और बेचारा ऐसे पिनपिना जाता है - जैसे इसका घोड़ा मार लिया हो राहुल ने
कसम से ओम बिड़ला और उसका खानदान अगली सात पीढ़ी तक राजनीति में नहीं आयेगा और आ भी गया तो अध्यक्ष कभी नहीं बनेगा, बेचारे दो कौड़ी के आदमी की इज्जत ही शब्दकोष से हटा दी राहुल, संजय सिंह, अखिलेश और महुआ टाईप सांसदों ने
मै सबको कहता हूँ अब कि बुरे से बुरा दुश्मन हो पर उसे ओम बिड़ला के रूप में अगला जन्म ना मिलें यह दुआ करता हूँ, और अब यही हालत अमित शाह और मोदी की हो गई कि रेणुका, राहुल, संजय या अखिलेश बोलना शुरू ही करते है और इनके चेहरे पर ही जुलाब शुरू हो जाते है
***
बोलो देश के उपचुनाव में का बा
_______
आज दो राज्यों के उपचुनाव में भाजपा की हार का मुख्य कारण मप्र और बिहार में सवर्णों की जबरदस्त उपेक्षा है - जो मोदी के आने के बाद बहुत ज़्यादा हुई है, क्योंकि संघ का हस्तक्षेप चुनावी रणनीति में शून्य हो गया है - इस बात को गंभीरता से समझिए जरा
नरोत्तम मिश्रा की हार के बाद कैलाश जी, नरेन्द्र तोमर और बाकी सारे अस्सी पार लोगों को समझ जाना चाहिए कि अब उनका समय गया और ये नए लोग है, नई पीढ़ी है - जो हिसाब भी मांगती है और विकास भी चाहती है और गाली देकर इस्तीफा लेना भी जानती है
पुराने विधायकों को भी सतर्क हो जाना चाहिए कि उनकी अकर्मण्यता और निकम्मेपन से जीतना तो दूर - दो कौड़ी की जो इज्जत बची है - वह भी नहीं मिलेगी, भ्रष्टाचार के कमीशन और दलाली से खरीदी गाड़ी पर पूर्व विधायक की तख्ती लगाना मुश्किल हो जाएगा
मप्र में मोहन यादव सरकार शपथ लेने के दिन से बुरी तरह से फैल सरकार है - जिसने पूरे प्रदेश का बंटाधार कर रखा है, मेरा मानना है कि मोहन यादव की नीयत ठीक है पर भीतर के लोग उन्हें लगातार परास्त होते देखना चाहते है, देवास - उज्जैन - इंदौर में हर दूसरा नागरिक इनके खुदाई अभियान और शहरों का सत्यानाश करने के लिए नरेन्द्र मोदी से ज्यादा गाली दे रहा है, कल उज्जैन में था, आज देवास में गया था - कुछ सामान लेने पर जितना कबाड़ा इन शहरों में विधायक और सांसदों के शहर में रहते हुए हो रहा है वह चिंता का नहीं बल्कि परिणाम स्वरूप ये सब भाजपा की कब्र बनाएगा आगामी चुनावों में, देवास में वैसे भी सामंती परिवार ने गत पैंतीस वर्षों में शहर को शमशान बना दिया है विकास तो हुआ नहीं पर लोगों को नर्क दिखाने में कमी नहीं की, नौकरी, धंधा, उद्योग, पानी, कुप्रशासन, नशा, अपराध आदि की समस्याएं सब इनके खाते में है, शिवराज मेट्रो दे रहे थे पर विधायक ने इसे भी नहीं होने दिया, जनता इतनी बेवकूफ अब नहीं है गए जमाने बूढ़े पाँव पड़ते थे, अब युवा है जो आंख में आंख डालकर सवाल पूछेंगे कि शिक्षा - स्वास्थ्य और नौकरी का क्या किया आपने
भाजपा को इस हार से फर्क नहीं पड़ेगा, यह भी सच है पर, कांग्रेस जो वेंटीलेटर पर पड़ी थी - वह अचानक साँस भरने लगी है और "उम्मीद पर दुनिया कायम है" का बैनर लगा लिया है, कांग्रेस सन अठ्ठाईस में चुनाव जीतने का दम भर सकती है, पर कमलनाथ जैसे या दिग्विजय जैसे अति और निजी महत्वकांक्षी लोगों को अभी पार्टी से निष्कासित करना होगा, वरना जीतने के रोड़े ऐसे ही लोग है और अगर जीत भी गए तो ये ही लोग जोड़ - तोड़ कर नींव में गड्ढे करेंगे, जीतू पटवारी हालांकि समझदार है और इन्हें जानते है, पर अभी से इन्हें एकदम बाहर करें, नई युवा पीढ़ी को भरोसे में रखकर गांव, जिले से लेकर राज्य स्तर तक लोग भरें और जिम्मेदारी दें - बजाय इन सठियाए हुए ख़ुसट खिसके हुए साठ पार लोगों को भी अपने साथ रखने के, दूसरा कांग्रेस के बड़बोले प्रवक्ता और फर्जी आंकड़ों के साथ दलित आदिवासी के नाम पर फेसबुकिया ज्ञान, राजनीति कर ऐयाशी करने वाले, आंकड़ेबाजी, रोज नए - नए राज खोलने की और भविष्यवाणियां करने वालों को भी बाहर करें और यह काम नई उम्र के सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर को दें - ताकि वे नियम - कायदों और कानून के दायरों में रहकर तथ्यात्मक और प्रभावी तरीके से बात रख सकें और प्रोफेशनल्स को तो हरगिज झांकने ना दें रणनीति में, संघ और धार्मिक मानसिकता से आए ये लोग गिरगिट और सांप है
और लिखूंगा, आज जश्न मनाइए और नरोत्तम को भगवान सदबुद्धि दें, और सारे संघी और भाजपाई यह नोट कर लें कि गुंडाराज, आतंक, तानाशाही, भ्रष्टाचार, कमीशनबाजी और सामंतवाद नहीं चलेगा, लोगों को इज्जत दें, उनकी बात सुने और काम करें
मीडिया जैसी वेश्या के बारे में बोले बिना यह पोस्ट पूरी नहीं होगी, वरिष्ठ और समझदार मीडिया कर्मी तो धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे, मोदी के इंस्टाग्राम पर आने, घटिया रील बनाने, अमित शाह पर इस्तीफे के दबाव और लोकसभा के मानसून सत्र को देखकर समझ ही गए है कि हवा का रूख बदल गया है, आज के परिणामों ने मीडिया के उन दलालों को जुलाब दे दिया है जो विधायक - सांसद, जाति, दो रूपये के लालच में वेश्या से ज्यादा गिर चुके है, खासकरके वो दलाल जिनको लिखने - पढ़ने से ज्यादा चापलूसी और तलवे चाटना आता है, इन सुअरों को भी जंतर - मंतर पर पीटा गया है, अब बारी उन हॉकर्स की है - जो सुबह अखबार बाँटते है, दिन में कैमरा उठाकर बकलोली करते है और ब्लैकमेल करते है, अब इनका नम्बर है पिटाई और जूते खाने का
मोदी जी आज रात आ रहें हो क्या इंस्टाग्राम पर फ्रांडस बोलते हुए या नरोत्तम के घर जा रहे हो, नवीन बाबू बिहार में का बा, और अमित शाह संसद में आने की हिम्मत है या जुलाब बंद नहीं हुए अभी और योगी जी तुम्हारे कांवड़िये ही तुम्हारा तख्त छीनेंगे - याद रखना - सम्हाल लो अभी भी समय है छह माह है वरना लौट जाना गोरखपुर तीर्थ स्थल
***
Amol Palekar’s Letter to Students:
​Dear Brave Students,
​I am writing to you not merely to express solidarity, but with a deep sense of gratitude. Every generation inherits the unfinished work of democracy; your generation has embraced the responsibility to carry it forward, and you should take immense pride in that.
​Albert Camus’s play Caligula tells the story of an emperor who comes to believe he possesses unlimited power, making him accountable to no moral obligation. He believes that power alone dictates what is right, trapping himself within the confines of his own tyranny. He systematically dismantles every check on his rule because he believes authority gives him the license to do so. We were reminded of that eternal truth as my wife, Sandhya, and I watched the deeply disturbing events unfolding in Delhi.
​Despite police repression, the youth movement continues to spread fearlessly, filled with song and spirit. History has taught us this lesson time and again: from Tsarist Russia to the 1968 student uprising in Paris, from the youth struggles against Apartheid in South Africa to Tiananmen Square and the 1974 Navnirman movement in Gujarat—attempts to suppress the voice of the youth have never extinguished the yearning for freedom. Authority can enforce its decrees for a time, but it can never permanently capture the conscience of a generation.
​The images of brutality inflicted upon you have filled us with grief and outrage. It is within its universities that a society learns to question itself. Asking questions of those who hold power over your future is not a privilege you are demanding; it is a democratic duty you are fulfilling. When questions are met with batons instead of reason, it does not diminish the dignity of the students—it diminishes the legitimacy of the state.
​Reflecting on his years in a Siberian prison, Fyodor Dostoevsky noted that the degree of civilization in a society can be judged by entering its prisons and observing how it treats its inmates. Today, extending that thought, one can say that the health of a democracy is judged by how it treats its students and citizens. In this regard, our democracy has failed. By resorting to force rather than dialogue, those in power have not demonstrated strength—they have shown how afraid they truly are.
​If I was not there beside you in person, it was for two reasons. The first is one I deeply regret: age has imposed physical limits on my body that my mind refuses to accept. If I could not march with you, it was certainly not because my conscience hesitated. The second was a conscious choice: I did not want to divert attention from where it rightfully belongs. This is your movement. This is your voice. This is your moment of moral courage. You do not need the validation of a celebrity. Democratic movements derive their legitimacy from the courage of those at their center, not the popularity of those standing beside them.
​However, being physically absent has never meant that we are not with you. Please keep this in mind: Sandhya and I will stand by you in every way possible. If this struggle requires legal aid, medical assistance, or financial support within our capacity, do not hesitate to reach out to us.
​You are not merely the seeds of change; you are its first green shoots. Today you may be called students, but tomorrow you will be remembered as the generation that chose courage over silence. The future belongs to those who refuse to abandon their humanity. Today’s slogans and today’s rulers will fade with time, but history will always remember your courage.
​Take care of one another. Protect your compassion and your hope. Do not let anger turn into hatred. Stand firm. Allow neither bitterness nor fear into your hearts. Move forward without hesitation.
​With affection,
​Amol Palekar
July 23, 2026
________
विद्यार्थियों के नाम अमोल पालेकर का संदेश
प्रिय साहसी विद्यार्थियों,
मैं यह पत्र केवल आपके संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए नहीं, बल्कि आपके साहस के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए लिख रहा हूँ, लोकतंत्र का निर्माण कभी पूरा नहीं होता; हर पीढ़ी को उसे आगे बढ़ाने का दायित्व विरासत में मिलता है, आपकी पीढ़ी ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया है, इसके लिए आप सम्मान और गर्व के पात्र हैं
फ्रांसीसी दार्शनिक और साहित्यकार अल्बेर कामू के प्रसिद्ध नाटक कैलीगुला में एक ऐसे शासक की कहानी है, जिसे यह भ्रम हो जाता है कि उसकी सत्ता असीमित है और इसलिए वह किसी नैतिक उत्तरदायित्व से बंधा नहीं है - उसे लगता है कि शक्ति ही सत्य है और अधिकार ही न्याय का स्रोत है, इसी अहंकार में वह अपने शासन पर लगे हर नियंत्रण को समाप्त कर देता है और अंततः अपनी ही तानाशाही का कैदी बन जाता है, मेरी पत्नी संध्या और मैंने जब दिल्ली में घट रही पीड़ादायक घटनाओं को देखा, तो हमें यह शाश्वत सत्य फिर से याद आया
पुलिस दमन के बावजूद आपका आंदोलन निर्भीकता के साथ आगे बढ़ रहा है, उसमें गीत हैं, उम्मीद है और परिवर्तन का विश्वास है, इतिहास गवाह है कि युवाओं की आवाज़ को कभी स्थायी रूप से दबाया नहीं जा सका - चाहे जारशाही रूस हो, 1968 का पेरिस छात्र आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध युवाओं का संघर्ष, तियानआनमेन चौक का प्रतिरोध या 1974 का गुजरात का नव निर्माण आंदोलन—हर दौर ने यही साबित किया कि सत्ता कुछ समय के लिए लोगों को चुप करा सकती है, लेकिन किसी पीढ़ी की अंतरात्मा को कभी पराजित नहीं कर सकती
आपके साथ हुई बर्बरता के दृश्य देखकर हमारा हृदय दुख और आक्रोश से भर उठा। विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं होते; वे वह स्थान हैं जहाँ समाज स्वयं से प्रश्न करना सीखता है, अपने भविष्य का निर्णय लेने वालों से सवाल पूछना आपका कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि आपका लोकतांत्रिक दायित्व है, यदि प्रश्नों का उत्तर तर्क के स्थान पर लाठियों से दिया जाए, तो इससे विद्यार्थियों की गरिमा कम नहीं होती; बल्कि राज्य की नैतिक और लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है
महान रूसी साहित्यकार फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की ने साइबेरिया की जेलों में बिताए अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था कि किसी समाज की सभ्यता का आकलन उसकी जेलों में कैदियों के साथ होने वाले व्यवहार से किया जा सकता है, आज उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि किसी लोकतंत्र का वास्तविक मूल्य इस बात से तय होता है कि वह अपने विद्यार्थियों और नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, इस कसौटी पर हमारा लोकतंत्र गंभीर परीक्षा में असफल दिखाई देता है, संवाद के स्थान पर बल प्रयोग करने वालों ने अपनी शक्ति नहीं, बल्कि अपने भय को उजागर किया है
यदि मैं आपके साथ सड़कों पर उपस्थित नहीं हो सका, तो उसके दो कारण हैं; पहला कारण वह है जिसका मुझे गहरा दुःख है—उम्र ने मेरे शरीर पर ऐसी सीमाएँ लगा दी हैं, जिन्हें मेरा मन आज भी स्वीकार नहीं कर पाया है, यदि मैं आपके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सका, तो इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरी अंतरात्मा आपके साथ नहीं थी
दूसरा कारण मेरा एक सचेत निर्णय था। मैं नहीं चाहता था कि लोगों का ध्यान उस मूल उद्देश्य से भटक जाए, जिसके लिए आप संघर्ष कर रहे हैं - यह आपका आंदोलन है, यह आपकी आवाज़ है, यह आपके नैतिक साहस का क्षण है - किसी लोकतांत्रिक आंदोलन को किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की उपस्थिति से वैधता नहीं मिलती; उसकी वास्तविक शक्ति उन साधारण लोगों के असाधारण साहस में निहित होती है, जो उसके केंद्र में खड़े होकर संघर्ष करते हैं
फिर भी यह कभी मत समझिए कि हमारी शारीरिक अनुपस्थिति का अर्थ आपके संघर्ष से दूरी है, संध्या और मैं हर परिस्थिति में आपके साथ हैं - यदि इस संघर्ष के दौरान आपको कानूनी सहायता, चिकित्सा सहयोग या हमारी सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता की आवश्यकता हो, तो बिना किसी संकोच के हमसे संपर्क कीजिए
आप केवल परिवर्तन के बीज नहीं हैं; आप उस परिवर्तन की पहली हरित कोंपलें हैं, आज आप विद्यार्थी हैं, लेकिन आने वाला इतिहास आपको उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने मौन के स्थान पर साहस को चुना, आज के नारे, आज के शासक और आज की सत्ता समय के साथ बदल जाएगी, लेकिन आपका साहस इतिहास के पन्नों पर सदैव अंकित रहेगा
एक-दूसरे का हाथ थामे रखिए, अपनी करुणा, अपनी संवेदना और अपनी आशा को कभी मत खोइए, क्रोध को घृणा में मत बदलने दीजिए - अडिग रहिए, पर मन में कटुता या भय को स्थान मत दीजिए, निडर होकर आगे बढ़ते रहिए
स्नेह और विश्वास सहित,
अमोल पालेकर
23 जुलाई, 2026
***
वसुंधरा ताई की ग्यारहवीं पुण्यतिथि के अवसर पर "भानुकुल", देवास में आज पुणे के कलाकार - अपर्णा केलकर का गायन और सुयोग कुंडलकर का एकल हारमोनियम वादन हुआ, रामेन्द्र सोलंकी, कौशिक और दीपक संगत कलाकार थे
यह शायद देवास का सौभाग्य ही है कि स्व कुमार जी ने यहां जो संगीत की धारा बहाई थी, वह आज भी अविकल रूप से बह रही है, देवास के साथ मालवे के लोगों को पक्का गाना सुनने के दो - चार अवसर साल में मिल ही जाते है, विदुषी कलापिनी और भुवनेश के नेतृत्व में सफल आयोजन होते रहते हैं और आज के समय में घर पर निजी महफिलों के मानिंद लोगों का हुजूम उमड़ा रहता है, कही कोई अव्यवस्था नहीं और कोई खामी नहीं, यह अब बड़े शहरों में तो लुप्त ही हो गई है परम्परा
आज के कार्यक्रम में दो महत्वूर्ण मेरे अवलोकन रहें, अपर्णा जब गा रही थी तो दो मिनट के विश्राम के दौरान तानपुरे पर बैठी कोई युवा कलाकार थी, उसके हाथ से तानपुरा फिसल गया, गिरा तो नहीं और ना किसी को लगी, पर क्षणिक रूप से वह थोड़ा गिरने जैसा हुआ और उसने सम्हाल लिया, पर कलाकार बहुत विचलित हो गई जैसे कोई पाप हो गया हो, उसकी आँखों में आंसू आ गए और वह देर तक बुदबुदाती रही, शायद माफी, पश्चाताप जैसा कुछ कह रही हो - एक कलाकार का अपने वाद्य यंत्र के लिए यह सम्मान और श्रद्धा देखकर मैं चकित था
दूसरा कलापिनी और भुवनेश ने जब युवा हारमोनियम वादक सुयोग कुंडलकर का परिचय दिया और उनके काम, अनुभव के बारे में विस्तृत रूप से बताया कि कैसे वो उनके परिवार ही नहीं, देश के ख्यात गायकों के साथ संगत कर चुके है और यह भी कि जब वे स्व वसुंधरा ताई के साथ मंच पर संगत कलाकार होते थे तो ताई कहती थी -"आज सुयोग है तो कार्यक्रम अच्छा ही होगा" भुवनेश ने भी अपनी मित्रता का जिक्र करते हुए सुयोग की तारीफ की, यह सब स्वाभाविक था - जब वर्षों के संबंध हो, और संगीत, कला, साहित्य की दुनिया ही ऐसी है कि हम कोमल मन के लोग है और सबका एक वृहद परिवार बन ही जाता है, सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि सुयोग पूरी बातचीत के दौरान सिर झुकाकर सुनते रहें, अपनी तारीफ़ सुनकर उन्हें अटपटा लग रहा था और वे पूरे समय गर्दन हिलाकर मना करते रहें, उन्हें यह तारीफ पसंद नहीं आ रही थी, आखिर में उन्होंने कहा भी कि - "मैं इस जगह बैठकर बजाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हूँ, क्योंकि कुमार जी और वसुंधरा जी का काम इतना बड़ा है कि उसके सामने मैं कुछ भी नहीं, एक विद्यार्थी के सिवाय"
शायद अच्छे कलाकारों की पहचान यही है, विनम्र बने रहना और निर्जीव से भी प्यार और सम्मान जताना
आज मित्रता दिवस पर मित्र और ख्यात उपन्यासकार तरूण भटनागर से देवास में मिलना भी यादगार रहा
जीवन के कुछ अच्छे दिनों की श्रृंखला में यह दिन भी शामिल हो गया
***
एक दोस्त कम है जिंदगी के लिए और दो दोस्त बहुत ज़्यादा है, बस इसी तलाश में लगभग साठ बरस बीत गए
तलाश बाकी है अभी भी
मित्रता दिवस की शुभकामनाएं
***
Everything is Imitation and Manipulation
***

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...