"पूस की रात" जैसी प्रसिद्ध कहानी प्रेमचंद ने सागर जिले के देवरी गांव में बैठकर पूस की रात को महसूस करते हुए लिखी थी, प्रेमचंद की बेटी और दामाद वहां रहते थे और सागर उनका आना - जाना लगा रहता था
मुझे आज यह मालूम पड़ा - देवास में आयोजित परसाई जन्मशती के एक कार्यक्रम में, क्या आपको यह बात मालूम थी
मेरी आधी अधूरी जानकारी यह भी है कि गुनाहो के देवता की नायिका सुधा भी शायद सागर विवि के अंग्रेजी विभाग में पढ़ाती थी, यह बात धर्मवीर भारती ने किसी से कही थी एक निजी बातचीत में, मित्र इसे दुरुस्त करें
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राहुल नहीं वो आंधी है
देश का आधुनिक गांधी है
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अभी एक वीडियो देखा जिसमें युवा कह रहे है कि मोदी राहुल से तीस मिनट डिबेट कर लें तो हम पुनः मोदी को वोट देंगे
मोदी में एक वाक्य मन से बोलने की हिम्मत नहीं, मीडिया के गली मुहल्ले वाले टुच्चे पत्रकार से बात करने की हिम्मत नहीं, जिस मीडिया को पंद्रह वर्षों तक दूध पिलाया वह तो सांप ही निकली पर सोशल मीडिया को तमाम कोशिशों और कानूनी दांव पेंच में दबाने के बाद भी गालियां सुनना पड़ रही है यह कम है क्या, ना दलित साथ है - ना बामन, बनिये या ठाकुर
ज्यूडिशियरी को खरीदने चला था, दो कौड़ी की इज्जत नहीं बची लोगों में, सीजेआई जैसे पद का जितना अपमान और चरित्रहन इस दौरान हुआ और लोगों ने खुलकर सवाल उठाएं उससे लगा कि हरेक को यही भुगतना पड़ता है, आज कोई फैसला या सद्वाक्य सुप्रीम कोर्ट कहता है तो जवाब में दो सौ अस्सी करोड़ कमेंटस में जवाब दिया जाता है , न्याय या कानून या संविधान की समझ अब किसी की बपौती नहीं, बीसीआई के मनन मिश्रा से लेकर सूर्यकांत का विरोध युवा कर रहें है जगह जगह वह भी सोचने योग्य है कि आखिर संविधानिक पदों की इतनी बेइज्जती के लिए कौन जिम्मेदार है - यही मोदी रात के बारह बजे सीजेआई के चैंबर से राफेल की फ़ाइल्स उठा ले गया था तो अब क्यों सवाल उठ रहे हैं
इतने बड़े देश का प्रतिनिधि होने के बाद किसी राष्ट्राध्यक्ष से खीं खीं खीं के अलावा कुछ आता नहीं
देश के इतिहास, सामाजिक शास्त्र, भूगोल, विज्ञान, अर्थ शास्त्र की समझ नहीं, कोकिला बेन अस्पताल के उदघाटन के समय मुंबई में बोला था कि कर्ण के पैदा होने वाली तकनीक को ईजाद करें डाक्टर, मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ - मतलब अवैज्ञानिक और कुतर्कों के अनेक उदाहरण मौजूद है रिकॉर्ड पर
देश की समस्याओं की समझ नहीं, शिक्षा स्वास्थ्य या विकास पैमानों की समझ नहीं और एक नई शिक्षा नीति बनाई उसे आज तो कोई ना समझ पा रहा ना लागू कर पा रहा
पैदल चलना तो दूर, एक कदम अपनी मर्जी से चल नहीं सकता, सिवाय हवाई यात्रा की अय्याशी, विदेश घूमना, कपड़े बदलना और स्वांग करते रहना जैसे कोई मुहल्ले में आने वाला भांड हो - जो रोज बहुरूपिया बनकर ठगने आता है लोगों को
धूर्त, कपटी, धोखेबाज़, मक्कार, भ्रष्ट और हरामखोरों के भरोसे सरकार चलाए - उसकी क्या बिसात जो राहुल तो दूर एक आम किसान से बात कर लें बगैर स्क्रिप्ट या कैमरे के
जो मणिपुर जैसे दंगाग्रस्त इलाकों में अभी तक नहीं गया, 370 हटने के बाद कश्मीर में पंडितों को नहीं बसा पाया या कश्मीर नहीं गया, चुनाव के अलावा कही जाता नहीं बंदा - उससे क्या उम्मीद करें कि वह देश की नब्ज़ को जानता है, साथ ही चाय बेचने के झूठ से लेकर फर्जी डिग्री का भ्रम फैलाकर युवाओं के बीच जो इमेज बनाई थी या नैरेटिव बनाया था - वो पांचवीं पास युवाओं ने तोड़ दिया है और अब वे सवाल कर रहे है, हिम्मत हो तो किसी भी विश्वविद्यालय के परिसर में घुसकर देखें - सारे जवाब भी मिल जाएंगे और सारे हिंदू राष्ट्र और संघ में प्रचारक के रूप में बीताए चौंतीस साल याद आ जायेंगे, लैगिंग्स खोलकर भागना पड़ेगा परिसर से
कुल मिलाकर बात यह है कि इसके दिन हो गए है पूरे, सारा देश विरोध में है और अब सिवाय ईवीएम मशीन के इस मक्कार, धूर्त, कपटी, अयोग्य, कारपोरेट के गुलाम और अनपढ़ सरकार को कोई नहीं बचा सकता, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट और केचुआ ने ईवीएम मशीन हटाकर बेलेट पेपर से चुनाव करवाने का आदेश जारी कर दिया - यकीन मानिए ये और इसका शाह देश छोड़कर भाग जायेंगे
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"राहुल नहीं वो आंधी है
देश का आधुनिक गांधी है"
तारीफ की बात नहीं पर जिस अंदाज में वो देश के हर कोने में जाकर पैदल यात्रा कर रहा है, किसान, महिलाओं और युवाओं से मिल रहा है, लड़कियों से मिल रहा है, अलग - अलग किस्म के काम करने वालों से मिल रहा है, मीडिया से मिलने में कोई संकोच नहीं और दोस्ताना अंदाज में मीडिया से मिलना और खुलकर अपनी कमियों और अच्छाई को स्वीकार करना - साथ ही एक युवा के साथ हुई पुलिस की दरिंदगी को लेकर एफआईआर लिखवाने के लिए खुद थाने में जाना - आपको अभी भी समझ नहीं आ रहा तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं है
नरेन्द्र मोदी में ना हिम्मत है, ना समझ और ना ही अक्ल, सिवाय अडानी और अंबानी के किसी से मिलता नहीं, विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से मिलता है तो पका देता है उन्हें और इस तरह से गत चौदह वर्षों में जो भी साम्राज्य खड़ा किया था - झूठ, धोखे और षडयंत्र के तहत वह भरभरा कर गिर चुका है, जगह - जगह से युवा, बच्चे और समाज का हर तबका विरोध के स्वर तेज करके खुलेआम गालियां दे रहा है और बगैर डर के अपनी बात कहते हुए सरकार और खासककरके मोदी - शाह की बुराई कर रहें है वह काबिले तारीफ़ है, गडकरी, निर्मला, राजनाथ, योगी के साथ मुख्य मंत्रियों की जो जूतम पैजार हुई है इन एक दो माहों में वह सराहनीय है
अंधभक्तों को लेकर जो मजाक बनाया जा रहा है - वह भी तारीफ़ करने योग्य है पर अंधभक्त भी परेशान है, एक ट्रांसजेंडर समुदाय पटना में मोदी का मंदिर बना रहा - इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा
जमाना बदल रहा है, और नई हवा का आगाज़ हो गया है, यह सरकार मीडिया की भी किरकिरी बन गई है और अब ब्राह्मण - बनिए - ठाकुर भी जंतर - मंतर पर खुलकर गाली दे रहे है - इससे ज्यादा बेइज्जती किसी चुनी हुई सरकार की क्या होगी
कायदा तो कहता है कि इस्तीफ़ा दें और कही जाकर डूब मरें, पर सब बड़े वाले मणिशंकर है ना तो छोड़ेंगे नहीं, गद्दी से खींचकर जनता सड़कों पर दौड़ाएगी - तब भी समझ नहीं आयेगा इन्हें
अंधभक्त ज्ञान ना दें यहां, मूर्खों के लिए कोई जगह नहीं इस पोस्ट पर, दो कौड़ी के अतार्किक और अंधभक्तों को बेइज्जत करके भगाया जायेगा
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शिक्षा की रेल चली शिक्षा की रेल
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शिक्षा और स्कूलों की जो जर्जर हालत अभी तो हुई है उसके लिए आजाद भारत के सभी शिक्षा मंत्री जिम्मेदार है - जिन्होंने संविधान या ईश्वर अल्लाह की शपथ लेकर पद तो ग्रहण किया, ये सभी अपराधी है और सज़ा के हक़दार है, आज भी भवन से लेकर गुणवत्ता इन सबने इतनी बर्बाद कर दी कि आधे से ज्यादा बच्चे स्कूल की बाउंड्री के बाहर है या अस्सी साल बाद अनपढ़, गँवार और रूपये के लालची लोगों के फर्जी स्कूलों में बैठे है, और बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे है, इन निजी स्कूल के बच्चों को ना बेसिक गणित आता है, ना भाषा और विज्ञान की बात ही मत करिए - वरना आज अंधभक्तों की यह बड़ी नाजायज भीड़ नजर नहीं आती
सीजेआई सूर्यकांत के काकरोच कहने से जो शिक्षा का मुद्दा talk of the town बना या the table turned हुआ - वह भी कमाल है, पहली बार bring back pride to the govt schools जैसी बात विमर्श के केंद्र में आई और अब जनता से लेकर हुक्मरानों को दलित, वंचित बच्चों के साथ शिक्षक, सामग्री, ढाँचे और पानी - शौचालय की बात समझ आ रही है और यह भी साफ समझ आ रहा कि कैसे गांवों में जातिवाद, सामंतवाद , गुलाम बनाए रखने की ब्राह्मणी, राजपूती, बनिया दिमाग से कमाई की पद्धति बच्चों के साथ पूरे देश को पिछड़ा रखकर मजदूर और अकुशल जाहिल नागरिक बना रही है और इनमें से ज्यादातर दक्षिणपंथी है - जो शिशु मंदिर, रामकृष्ण मिशन, वनवासी कल्याण के नाम पर समाज के वृहद हिस्से को बंधुआ बनाकर धर्म और जड़ मानसिकता में बांधकर रख रहें है
कितना शर्मनाक है कि तबेले में स्कूल की सच्चाई है और सिर्फ पूछने पर पिटाई की जा रही है, कांग्रेस का तो काड़र कभी रहा नहीं, पर भाजपा और संघी लोग पिछले चौदह वर्षों से जो देश बर्बाद करने के साथ व्यापक पैमाने पर दस लाख से ज्यादा स्कूल बंद करके बैठ गए है - इन नालायकों से कौन हिसाब पूछेगा, निजीकरण के नाम पर अजीम प्रेम फाउंडेशन और तमाम एनजीओ को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए जो अनुदान और नवाचार के खेल में उस्ताद निकलें और अपने घर भर लिए, विवि के सफेद हाथी खोलकर बैठ गए
अब की बार का चुनाव यानि 2029 का केंद्रीय मुद्दा "जनशिक्षा" होना चाहिए और इसके लिए जो प्रयास किए जाए - वो सब किए जाना चाहिए, "समान स्कूल - समान शिक्षा" का मुद्दा फिर से टेबल पर आए और निजी स्कूलों को और उनके अय्याश संचालकों को धक्का मारकर बाहर किया जाए - यह सबसे जरूरी पहल और फोकस होना चाहिए
इस पूरी लड़ाई में जो लोग युवाओं और स्कूलों के सोशल आडिट का विरोध कर रहें है उन्हें सीधा जेल में डाला जाए - तभी यह मुद्दा केंद्रीय मुद्दा बनेगा और जनपहल की सार्थक शुरूवात होगी और जो भी लोग बाबाओं, ढोंगियों और साधु - संतों, मुल्लाओं, पादरियों के साथ मिलकर रोज जुलूस, धार्मिक आयोजन और हवन यज्ञ करके शिक्षा की बात कर रहें है - उनका सामाजिक बॉय कॉट किया जायें, ये कलंक है समाज में नेतृत्व के नाम पर और सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर
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हिंदवी पर रिच की जब भी कमी होती है मूर्ख और कुंठित संपादक स्तन, गुदा और तमाम अश्लील किस्म का माल सप्लाई करने लगता है या किसी कवयित्री की तस्वीर सहित दो अश्लील लाइना पोस्ट कर देता है
अभी किसी कुशाग्र अद्वैत की दो पंक्तियां लगाई है, ये अश्लील ही नहीं - किसी भी कोण से कविता नहीं है
हिंदी का सत्यानाश जितना सदानीरा, हिंदवी और इस तरह के घटिया पोर्टल्स ने किया है - वह अक्षम्य है
शुक्र है कुछ तथाकथित युवा कवि और स्त्रैण कवि अब संघ और भाजपा के प्रचार की सामग्री कहानी, कविता और उपन्यास के रूप में लिख रहे है, वरना अश्लीलता में इनसे बड़ा कोई इतिहास में नहीं हुआ
हिंदवी और सदानीरा जैसी साईटस का विरोध होना चाहिये
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इथेनॉल 20 का असर यह हुआ कि पेट्रोल के लिए गन्ना कम पड़ने लगा तो सरकार ने सड़करी के लिए शक्कर महंगी कर दी
आज का ताजा भाव है
80 - 120 नॉर्मल रेंज
और
120 के ऊपर मतलब इंसुलिन के बराबर
बापड़े डाक्टर्स पर तरस आ रहा है, धंधा कैसे चलेगा उनका
अब मत कहना कि मोती है तो नामुमकिन कुछ नहीं
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वस्तुतः हम कभी कही जाते ही नहीं, भौतिक रूप से चले भी जाए तो लौटते नहीं और यदि यह आना - जाना हो भी जाए तो हम अपने ही बनाए जाल में जकड़े रहते है, इतने कि आना और जाना असंभव हो जाता है, स्मृतियों के बोझ और स्मृति घरों में नए बनने वाले क्षणों की दास्तान हमें कही भी जाने नहीं देती और ना ही लौटने देती है, हम जन्म के पहले से स्थिर रहें है और यही स्थिरता हमें अपने श्रेष्ठ समय की ओर ऐसे ले जाती है कि हम जाने के बाद कभी लौट नहीं पातें हैं
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जीवन में पीड़ा की अनुभूति बहुत सघन होती है और यह पीड़ा जब सीमा से परे चली जाती है तो फिर कुछ सोचने विचारने को बचता नहीं, इस बड़े से अस्पताल में पिछले डेढ़ - दो साल से, बल्कि तीन साल से हर छोटा बड़ा डॉक्टर, कर्मचारी, वार्डबॉय या आने जाने वाले दवाई बेचने वाले एजेंट भी वाकिफ हो गए है उससे और अब हर कोई सहानुभूति की मुस्कान या दया भाव से नहीं देखता है
पता नहीं एक हल्के से बुखार से शुरू हुआ था फ़साना, अपनी छोटी जगह के डाक्टर की दवा के पहले अजवाईन, हल्दी, सौंफ, बड़ी पीपल, हरड़, आँवला, नीम से लेकर तमाम नुस्खे आजमाएं फिर उस डाक्टर की दवा, फिर पास के शहर जाकर टट्टी - पेशाब की जांच, छाती का बलगम, एक्सरे, सोनोग्राफी और फिर भी कुछ सधा नहीं तो और बड़े शहर ले जाना पड़ा, पैसा तो यूं जा रहा था जैसे नाले में बरसात का बहता हुआ कलुषित जल, पर हल नहीं निकल रहा था, घर के लोग ले जाते, रिपोर्ट आती तो और उसके साथ आती अनगिनत रंग - बिरंगी गोलियां, शीशी, पर्चे, रिपोर्ट, एक्सरे के काले कागज़ और फिल्में, साथ ही हिदायतों की ढेरों किश्तें, खाने पीने के परहेज
थोड़े दिन कुछ ठीक सा रहता और फिर वही, तंग आ गए थे घर वाले भी, आखिर उन्होंने दूर के भतीजे को फोन कर उसके माथे मढ़ दिया कि जाओ अब उसी महानगर और हर माह कुछ भेजते रहेंगे, पच्चीस मंजिल अस्पताल रहा होगा, ना दवाई की बदबू आती, ना किसी की कोई खबर लगती, भतीजे ने ना जाने किस लालच और प्रेम में यहां लाकर पटक दिया और एक जनरल वार्ड का कोना उसके नाम हो गया - ऊपर एक पंखा, एक टेबल , एक स्टूल, दो थाली, एक ग्लास, एक कटोरी और अस्पताल के बदबू मारते भूरे रंग के गाउन, इसी के साथ अपने शहर के एक्सरे वाले की बड़ी सी प्लास्टिक की थैली - जिसमें उसके कुछ कपड़े, कागज, फोन नंबर की डायरी और वो सब था - जो उसके बाद निश्चित ही कचरे में फेंक दिया जाएगा
तीन साल हो गए, भतीजे ने आना बंद कर दिया, सोशल वर्क वाले लोग आते तो उसे साफ कर जाते और कुछ फल भी मिल जाते बाकी चैरिटी के दम पर वो जिंदा था, चार - चाह माह में सामाजिक सुरक्षा निधि की पेंशन आती तो भतीजा आ जाता चेक लेकर और उससे भरवाकर ले जाता, पर मजाल कि एक चीज उसके लिए ले आए कुछ खाने या पहनने - ओढ़ने को
उसके लिये जीवन खत्म हो गया था, बचा था तो एक सपना कि कम से कम वह अपने घर में मरना चाहता है, पर इस महानगर से अपने घर गांव जाने का ना रास्ता मालूम था और ना ही उसे कैसे जाना है - यह ज्ञात था, बस यही सोचकर वह काँप जाता - इलाज, सुइयाँ, नलियाँ, मशीनें, जाँचे उसे अब घबराती नहीं थी, इतना आदि हो गया इन सबका वह कि शरीर का मोह ही छोड़ दिया था
उसे अपने गांव के खेत में जलकर मरना है - यही उसकी एक तमन्ना है और हर आने जाने वाले को कहता - "मेरे मरने के बाद मुझे अहमदपुर छोड़ देना, कांति और परसराम के बगल में जो जगह खाली है, वही जला देना, उस मेढ़ पर बबूल के काँटे है, दूर इमली लगी रहती है और उस पीपल के पास में सप्तपर्णी का पेड़ लगा है - जो मौसम में खूब खुशबू देता है, ऊपर बेल फ़ल लटकते है, बस वही - ठीक वही जलाना, और मेरे फूल दक्षिण दिशा को जाने वाले जंगल के रस्ते में जो बावड़ी है उसमें डाल देना, उसका पानी कोई नहीं पीता, सारे पुरखों की अस्थियां उसी में है....
आज वह मर गया है इसी पलंग पर , किसी को नहीं पता अहमदपुर कहां है, उसके भतीजे का मोबाइल नम्बर अस्पताल में नहीं है, बाबू खुश है - एक पलंग खाली हो गया, एक बूढ़ी नर्स अभी आई थी - उसके चेहरे पर सफेद चादर डाल गई है, एक कागज भर कर चली गई है, किसी को फर्क नहीं पड़ रहा उसकी मौत से
Sugar Spiked, eyesite damaged, severe Angina followed by Cardiac arrest, CRF, Advanced stage of Fatty Liver - causes of death ......
शायद उस नर्स की अंग्रेजी कमजोर रही होगी
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युवाओं के प्रदर्शन और मांगों को रोकने का एक ही तरीका है - सबको कांवड़ दे दी जाए, रांची वाले देवघर जाए और बाकी दिल्ली वाले उज्जैन, बनारस, ओंकारेश्वर आदि जगह जा सकते है
सब पर हवाई फूलों की वर्षा हो, भोजन आदि का मुफ्त इंतजाम सरकार करें - योगी, मोदी, शाह, राजनाथ, निर्मला, राहुल, रिजिजू आदि सभी लोग कांवड़ यात्रा को नेतृत्व दें, पुलिस वाले भी तलवों की मालिश करेंगे बजाय पीटने के
देखो दो घंटे में सब शांत न हो जाए तो कहना
कर के देख लो, मुफ्त का सुझाव है - मान लो
बोल बम
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ये शर्ट हमको दे दें ठाकुर
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राहुल की सभाएं, राहुल के भाषण और युवाओं की उपस्थिति के साथ उनके जोश, तालियों को देखकर अंधभक्तों और मोती, शेरू, झब्रीला, गबरीला, कालू, टॉमी, रूबी, लूसी, कंटीली और लालू की जलन को देखकर मजा आता है
भले हारे या जीतें - पर आज जो खून जल रहा है, उसे महसूस कर याद आता है कि इसी पप्पू को बनाने में मोती का बड़ा हाथ रहा है, और अब सत्ता हाथ से जाते दिख रही है नीच कुल के लोगों को तो टसूये बहा रहें है नामुराद
मजा तो तब आ रहा - जब घर में अंधभक्तों के बच्चे बदलाव की बात कर रहे है, चंदा चोरों को गाली दे रहे है, धर्म एवं ध्वजा के खिलाफ बोल रहे है, महंगी शिक्षा, रोजगार और अदाणी - अंबानी सेठ के बहाने सरकार नामक गुलामों पर सवाल उठा रहे है, संघियों के प्रचारकों को मुफ्त का भोजन देना बंद करवा रहे है, मुख्य धारा के मीडिया को गलिया कर वैकल्पिक मीडिया देख रहे है और अपने - अपने यूट्युब बना रहें है, इंस्टाग्राम पर रील डाल रहे है, स्थानीय दो कौड़ी के हॉकर्स को जूते मारकर उपेक्षित कर रहें हैं
मोदी जैसी सरकार में जो निकम्मे, डरपोक और कायर है - उनकी हालत खराब है, वे सारे हरामी ख़ौफ़ में है - जो मोती जैसा भद्दा चेहरा दिखाकर जीत रहें थे, गत तेरह वर्षों में इन्होंने कुछ नहीं किया और अब दस्त लग रहे है कि इस पनौती के चेहरे को दिखाकर इस चुनाव को कैसे जीतेंगे, इसलिए कांवड़ से लेकर तमाम तरह के दांव - पेंच खेलकर बागेश्वर से लेकर राम - रहीम तक को अपना रहें है, पर ससुरों तुम्हारी अब एक ना चलेगी, राहुल या कांग्रेस हारे या जीतें - पर तुमको दस्त और उल्टी ना लगवा दी तो देख लेना, परिवार के वाट्सअप समूह में शेर बनें भाई बहन अब चुप है, फट कर गले में आ गई है, रिटायर्ड अंकल अभी भी उम्मीद पर जिंदा है और जबरन की आग मूत रहे है, पर वे अपनी ही अग्नि में जल जायेंगे, कोई फीनिक्स तो है नहीं जो पुनः जन्मेंगे
मीडिया के दलाल और भांड - जो विधायक से लेकर सांसद, पार्षद, महापौर और सरपंचों की चमचा गिरी करते है, कैमरा उठाकर दिनभर दाढ़की करते है - कच्ची दारू के लिए - वे भी त्रस्त है, उनके चरण धोकर पी रहें है, रोज जगह - जगह जाकर शादी - ब्याह के लड्डू खाकर फोटो हिंच रहें है, हर जगह मुंह मारने चले जाते है, एक दो रूपये के पेन और फ्री के लेटर पेड पर बिक जाने वाले, एक कट चाय और दो बिस्किट पर ईमान बेचने वाले ये क्या जाने मीडिया क्या होता है और दलाली कर अपनी निकम्मी औलादों को पाल रहे है या जमीन खरीद रहे है, हिंदी लिखना आता नहीं इन अनपढ़ों को पर ज्ञानी बने रहते है, उन सबको यही युवा सड़कों पर नंगा करेंगे, घसीटेंगे और पीटेंगे - याद रखियेगा, तुम्हारे अखबार, कैमरे और तुम्हारी भड़वई बुरी तरह से निकलेगी, जनाजे का इंतजार करो अपने
इस बीच एनजीओ, लेखक संगठनो के मिश्रा, तिवारी, जोशी, पांडे, सक्सेना, श्रीवास्तव, रघुवंशी, भटनागर, अटेल, पटेल, चौधरी, सिंह, राजपूत, ठाकुर, कुलकर्णी, शर्मा, वर्मा, सोलंकी, चौहान, या और कोई भी दलित या वामपंथी आदि भी मुंह छुपाकर बैठे है, इन सब घटिया लोगों से भी हिसाब होगा - जब तुम्हारी दो कौड़ी की किताबों और कहानी - कविताओं में ही तुम्हारी देह को जलाया जायेगा - क्योंकि तुम आज तटस्थ बने बैठे हो और मलाई चांप रहें हो, एनजीओ को मोदी सरकार ने बर्बाद कर दिया, फिर भी ये धूर्त और मक्कार लोग डरपोक और कायर बनकर चापलूसी में लगे है, घबराहट में अपना जमीर खो बैठे है और इतने अंदर सिमट गए है कि घर वाली से भी बात करना बंद कर दिया है, परसाई सही कहते थे - "ईश्वर इन्हें माफ मत करना, ये सब जानते है कि ये क्या कर रहे हैं"
विष-विद्यालयों के कुल-पतितो, नीच प्राध्यापक और हरामखोर गिड़गिड़ाते हुए शोधार्थियों जो संघ कार्यालय से लोक सेवा आयोगों में अपना नाम सरकारी नौकरी में भिजवाने को लालायित हो, कब तक बचोगे, संघी जो खुद ना आजादी में थे कभी ना देश के विकास में वो क्या तुम्हे नौकरी दिलवा रहे है, गुलाम बना रहें है ताकि तुम माड़साब बन जाओ और माखनलाल या TISS जैसे विवि में जाकर गौशाला खोलो और गोबर कर शोध करो और कंडे यानी उपले थापों, किसी विभाग में बाबू बनकर जीवन भर इनकी गुलामी करो, यही किया है शिक्षाविदों ने, सारे कुलपति और प्राध्यापकगणों ने अपनी इज्जत नीलाम करके अनपढ़ और कुपढ़ो की गुलामी स्वीकार ली, थूकता हूँ तुम्हारी शिक्षा और गुलामी पर, अपनी औलादों को क्या मुंह दिखाओगे नालायकों - कभी सोचा है
और चापलूस, रीढ़विहीन ब्यूरोक्रेट्स की तो पूछो मत चौराहों पर जिंदा जलाया जायेगा भ्रष्ट लोगों, तुम्हारी Pampering और सेवा में लगी लबासना को जब तक नए पाठ्यक्रम - जो लोकतंत्रात्मक होगा, में नहीं ढाला जाता - तुम सुधरोगे नहीं, बहुत ग़ुरूर है ना रट्टा मारकर परीक्षा में पास होने का - सबका हिसाब होगा, याद रखना गिरगिटों इस बात का
पेपर लीक तो बहाना है असली में मोदी सरकार को हटाना है
बहुत हुई मन की बात
अब करना पड़ेगी जन की बात
जिंदाबाद रहेगा इन युवाओं के लिए
और
लभ यू राहुल के लिए जिसने मुर्दों में जान फूंक दी है
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