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Khari Khari, Women's day 8 March 2021 and Drama of Tarun Fulwar, Magazines Posts of 6 and 7 March 2021

 दो घँटे बर्बाद करने का मुआवजा दिलवा दो

◆◆◆
एक नाटक देखने गया था, कोरोना काल के बाद लगा था कि कुछ सार्थक देखने को मिलेगा पर एकदम फड़तूस किस्म का था, सात बजे का लिखा था, आधे घँटे बाद चालू हुआ - जबकि निमंत्रण में समय का विशेष रूप से लिखा गया था, फिर स्वागत, वंदन,
अभिनंदन
- अंत में आखिर नाटक हुआ, और पता ही नही चला कब खत्म हो गया उसके बाद वक्ताओं ने मंच काबिज़ कर लिया, बहुतेरी संस्थाएं चढ़ गई मंच पर और गमछे, शाल, नारियल भेंट - फिर ज्ञानवाणी और ना जाने क्या क्या कुल मिलाकर दो घँटे की विशुद्ध बर्बादी
पता नही क्यों लोग "मंच - माईक" देखकर बौरा क्यो जाते है, इतिहास गिनाना शुरू करते है वो भी गलत सलत - देवास संगीत साहित्य के साथ नाट्यकला का भी बड़ा केंद्र रहा है - मराठी के अप्रतिम और अभी तक के सबसे लोकप्रिय नाटक "एकच प्याला" के लेखक स्वर्गीय गडकरी साहब यही रहें, स्व गजानन पुराणिक से लेकर तमाम बड़े लोग यहाँ रहें, राजकवि स्व झोकरकर साहब ने भी अप्रतिम नाटक लिखें - लोगों को यदि इतिहास से अनभिज्ञ हो या सही जानकारी ना हो तो जबरन महान बनने की हौस में फालतू ज्ञान नही पेलना चाहिये
दूसरा कला, संगीत, चित्रकला या आनुषंगिक कलाओं के कार्यक्रमों में कम से कम मुख्य अतिथि या अध्यक्ष के रूप में बड़े बाबू टाईप प्रशासनिक लोगों को बुलाना नही चाहिये - जो पता नही किस अकड़ में देरी से आते है और फिर उनके आगे - पीछे मलेरिया के मच्छर और कोविड पॉजिटव की फौज चली आती है जो पूरे कार्यक्रम के दौरान संक्रमण फैलाते रहते है
वक्ताओं को बोलने का और ज्ञान झाड़ने का मौका छोड़ना चाहिये - हर कही मुंह उठाकर पेलने लगते है, कला के मंच का सम्मान होना चाहिये; छोटे कस्बों - शहरों में हर कोई हार - फूल और भद्दे किस्म के प्रमाणपत्र लेकर चढ़ जाते है - अरे भाई यह कला का मंच है या राजनीति का अखाड़ा
बहरहाल, नाटक था ही नही कही और ना संगीत, ना संवाद, ना प्रकाश का संयोजन, ना निर्देशन - किसी भी कूड़े कचरे को उठाकर मंच पर भौंडे ढंग से प्रदर्शित कर देना कोई नाटक नही है - जबकि बड़ी सँख्या में गुणवान प्रेक्षक उपस्थित थे - ये सब उन लोगों का अपमान है
पहले "क - ख - ग - घ" सीखिए - निर्देशक बनने की जल्दी में अपने कैरियर की वाट मत लगाईये - कभी कही ना देखी जाने वाली फिल्म में 30 सेकेंड का काम कर लेने से विजय तेंदुलकर या बाबा कारन्त, रंजीत कपूर, या मोहन महर्षि नही बन जाते उस्ताद
***
तोड़ो बंधन
◆◆◆
सुबह उठो, अपने आपको च्यूंटी काटो
जागो, अपने उन दो पाँवों को निहारो जो आगे बढ़ते है सदैव
इन्हीं पाँवों पर तन - मन और आत्मा के साथ सपनों का बोझ डालो
अपने मुंह के भीतर जुबाँ घूमाओ और खुद का नाम पुकारो जोर से
खिड़की खोलो, दरवाज़े को धक्का मारकर खोलो, रोशनी का स्वागत करो
आंखों को मलो और दीदे फाड़कर सूरज को घूरकर देखो
चूल्हे की आग को अपने आँचल में सामने रखो ताकि जलती हुई अग्निप्रभा सबको दिखाई दें, और फिर सबके सामने से सिर ऊंचा करके निकलो और पीछे सुनाई दे रहें शोर की उपेक्षा करो - हम लोग सिर्फ शोर ही कर सकते है और कुछ नही
बाहर निकलो, रोज यही करो, इसी तरह से हरेक दिन को सार्थक बनाओ
कभी किसी को महिला दिवस की
बधाई
कहने का मौका मत दो
हर दिन तुम्हारा है, हर पल तुम्हारा है, मैं कोई
बधाई
नही दूँगा 8 मार्च की किसी को
ये सब जाल है, इनसे बचो, एक दिन होने मनाने से बाकी सबको खारिज करता है समाज
बचो, बचो, बचो इन घाघ लोगों से बचो - अपने निर्णय खुद लो, सीखने - सीखाने से लेकर आने जाने, खर्च करने और मनमर्जी से जीने के, नई गलियों में झांकने के, गहरे कुओं में उतरने के, नदी - समुंदर लांघने के, पहाड़ से ऊँचा उठने के और आसमान पार जाने के
जब लगें उदासी, निराशा, संत्रास, उलझन या पछतावा - भोग्या होने का तो और जोर से च्यूंटी काटो - खुद को नही - उन सबको जो राह के रोड़े बन रहे है और इन सबको लताड़ते हुए निकल जाओ दूर, सबको पछाड़ते हुए - ऐसे में दिल नही, दिमाग नही, हौंसले से काम लो, ऊंची उड़ान भरो - कोई नही रोक सकता तुम्हें - क्योकि तुम आजाद हो
सृष्टि दोनो से है - ईडन गार्डन से दोनो साथ निकले थे, दोनों ने संसार रचा था, दोनो ही घटक थे महत्वपूर्ण, फिर ऐसा क्या हुआ, किस छल - बल से करामात हुई कि तुम पीछे - पीछे और सबसे पीछे रह गई, अब सब भूलकर आगे - आगे और आगे जाना है, इतना आगे कि फिर दोनो बराबर हो जाये और कोई किसी को छल ना सकें और इसके लिए ताक़त तुम्हे ही जुटाना होगी
कोई दिवस - महिला दिवस नही है - हर दिन तुम्हारा है
***
एक जमाने में शायद 2005-06 में तीन चार पत्रिकाओं की आजीवन सदस्यता ली थी, वैधता 2020 तक लिखा आता था लिफ़ाफ़े पर , इधर एक दो और पत्रिकाओं की त्रैवार्षिक सदस्यता ली थी
इनकी सबकी वैधता कब खत्म हो गई याद नही रहा, पर वे सज्जन लोग बहुत सह्रदयता से पत्रिकाएँ नियमित भेजते रहें आजतक
आज सुबह 3 बजे ही नींद खुल गई थी पत्रिकाओं के ताज़ा अंक रखें थे, उन्हें पढ़ा इत्मीनान से और फिर बहुत सोचा लगा कि यह बेईमानी है
हिंदी की दर्जनों पत्रिकाओं के नाम बता सकता हूँ जिनके चंदे भरें और एक भी अंक नही आया और फोन करने पर धौंस अलग मिली कि "मत पढ़ो किसने कहा था चंदा भेजने को" - कुल मिलाकर एक ओर वे लोग है जो वार्षिक चंदा लेकर भी पत्रिकाएँ नही भेजते, कोविड के नाम पर पीडीएफ की सुरसुरी भेज देते है और एक ओर ये लगनशील और मेहनती लोग है जो बिना नागा नियमित पत्रिकाएँ भेज रहें हैं
आज सुबह से बहुत ग्लानि हुई - फिर अभी सबको एक - एक मेल लिखकर शुक्रिया अदा किया, शुभकामनाएँ दी और कह दिया कि अगले अंक से पत्रिकाएँ ना भेजें और वितरण सूची से नाम भी ख़ारिज कर दें
इन सब लोगों को बहुत प्यार, सम्मान और दुआएँ कि खूब यश कमायें और रचनात्मकता शिखर पर पहुँचे
अपना क्या है - कबीर कहते है ना
"मत कर माया का अभिमान
मत कर क़ाया का अहंकार
क़ाया गार से काची"

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