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Drisht kavi and Anamika ji, Story Alexander Posts of 13 to 16 March 2021

 हार्दिक बधाई विदुषी #अनामिका जी


पहली बार कही इस पुरस्कार की निंदा, आलोचना, समालोचना नही देख रहा और लगता है कि यह कविता का सर्वश्रेष्ठ समय है - जब कविता, कवयित्री निर्विवाद रूप से सराहे जा रहें है और पूरा सोशल मीडिया रंगा पड़ा है प्रशस्ति गान से
कोरोना काल में लाइव, वेब पर कवि गोष्ठियों से कविता और कवियों की जो फ़जीहत हुई और समूची कविता के शिल्प, इतिहास और मायने बदले वह बहुत ही चिंतनीय था - अफसोस यह था कि अनेकानेक लाइव के माध्यमों से कविता पर कम कवि, राजनीति और व्यक्तिगत गुण दोषों पर छिछालेदारी ज्यादा हुई और कविता को लेकर गोचर और अगोचर जगत में एक नैराश्य की स्थिति बनी
इधर कविता के नए संग्रह छपे और सार्थक कविता भी पढ़ने को मिली, अनामिका जी को मिला पुरस्कार कविता में आधी आबादी की सशक्त भूमिका, हस्तक्षेप और जवाबदेही का भी प्रतीक है - यह पुरस्कार साहित्य अकादमी की 75 वर्षों में विकसित हुई मान्यता को भी दर्शाता है कि देर आये दुरस्त आये और उम्मीद है कि यह मान्यता स्थाई होगी और कवयित्रियों को बराबरी, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती रहेगी
अनामिका जी को पुनः
बधाई
और शुभकामनाएं कि यशस्वी हो, खूब रचें और यूँही सबके दिलों - दिमाग में इसी स्नेह, दुलार और लाड़ के साथ सदैव बनी रहें
***
Ernest Albert जी की इस पोस्ट मेमोरी में सर उठा दिया। पढ़ते पढ़ते आंखे भीग गई।
यह पल इतिहास के पन्ने से :
महान राजा एलेकज़ेंडर अपने जंगी खेमे में बेहद तनाव में इधर से उधर, उधर से इधर घूम रहा है ! माथा तना हुआ, दोनों हाथ पीछे , मुट्ठीयां कभी खुलती कभी बंद होती हुईं ! अचानक रुक कर दहाड़ता है, "मार्सेलैस को हाज़ीर करो", फिर उसी तरह घूमना शुरू कर देता है !
खेमे का परदा उठा मार्सेलैस अंदर दाखिल होता है , "मैं हाज़ीर हुआ मेरे राजा " !
एलेकज़ेंडर घूमता घूमता रुक जाता है , मार्सेलैस को देर तक घूरता है !
मार्सेलैस, एलेकज़ेंडर का जाँबाज़ विश्वसनीय जरनैल, गज़ब का योधा, जंग की शतरंज का माहिर ! सौम्य चेहरा , लंबा कदकाठ, चेहरे पे हरपल हलकी सी मुस्कान, सारा जिस्म ज़िरहबख्तर से ढका हुआ , एक हाथ में युद्ध में इस्तेमाल होने वाला कन्टोप जिस पर लाल पंख सुसज्जित हैं !
एलेकज़ेंडर गरजता है, "दस दिन हो गए इस थिबीज़ शहर को घेरे हुए .......इन्होने ना तो हार मानी है ना ही घुटने टेके हैं , कोई जवाब है तुम्हारे पास मेरे जरनैल "?
मार्सेलैस मंद मंद मुस्कुराता हुआ अपने राजा को देखता रहता है !
एलेकज़ेंडर का पारा एकदम सुलगने लगता है, "तुम्हारी इस मुस्कान का क्या मतलब मार्सेलैस ? क्या थिबीज़ वाले मेरी बेपनाह ताकत को नहीं जानते ? क्या उनको मेरी फौज का अन्दाज़ा नहीं ? क्या उनको नहीं पता की स्पारटा की बहादुर फौज को कैसे मैने रौंद डाला और कत्ल कर डाला" ? एलेकज़ेंडर के नथुने फडकना शुरू कर चुके हैं , चेहरा तमतमा रहा है !
मार्सेलैस अपने राजा के इस गुस्से के बावजूद उसकी ओर उसी तरह देखता रहता है , मंद मंद मुस्कुराता हुआ !
चीते की फुर्ती से एलेकज़ेंडर उछल कर मार्सेलैस तक आता है और अपना खंजर मार्सेलैस की गर्दन पर रख कर , "तुम्हारी इस मुस्कान की वजह से मैं तुम्हे अभी मौत की नींद सुला सकता हूँ मार्सेलैस, मेरे गुस्से का इम्तिहान मत लो ! मैं अभी तुम्हे हुक्म देता हूँ की सुबह की पहली किरण के साथ तुम इस शहर को नेस्त और नाबूद कर दोगे , इसके हरेक बशिन्दे को मौत के घाट उतार दोगे, इस शहर का नाम ओ निशान मिटा दोगे ! अब दफा हो जाओ "!
मार्सेलैस अपनी जगह से नहीं हिलता मार्सेलैस की मुस्कान भी वहीं की वहीं !
मार्सेलैस, जिसने बचपन से एलेकज़ेंडर को तलवारबाज़ी, तिरन्दाज़ी, वज्र और भाला चलाना सिखाये , जिसने कुशती के पैंतरे और जंग के दौरान मोर्चों , फौज की शतरंज सिखाये ये भी जानता है की बचपन से ही एलेकज़ेंडर को कविताओं से बड़ा प्यार था खास कर कवि पिंडार की कविताओं से ! वो ये भी जानता है की एलेकज़ेंडर जब भी एकांत में होता है सिर्फ पिंडार की कविताओं को गुनगुनाता है !
अचानक एलेकज़ेंडर को आभास होता है की उसका जरनैल वहीं खड़ा है ! "जाओ मार्सेलैस और देखो थिबीज़ का कोई भी बशिन्दा ज़िंदा ना बचे , सारा शहर धूल मिट्टी में तबदील कर दो ", एलेकज़ेंडर हिसहिसाता है !
"कैसे मेरे राजा , कैसे ", पहली बार मार्सेलैस के चेहरे से मुस्कान गायब हो जाती है !
एलेकज़ेंडर की बर्दाशत की हद जैसे खत्म हो जाती है , वो एक बार फिर फुर्ती से उछल कर मार्सेलैस के इतना करीब आ खड़ा होता है की दोनों की नाकें बेहद करीब , "क्या मतलब मार्सेलैस ? क्या तुम मुझसे, अपने राजा से कुछ छुपा रहे हो ..... बोलो ! नहीं तो मैं खुद तुम्हारी गर्दन कलम कर दूँगा", एलेकज़ेंडर म्यान से अपनी तलवार निकाल लेता है !
मार्सेलैस बड़ी संजीदा आवाज़ में बोलता है ," मेरे राजा थिबीज़ शहर के बीचोंबीच आपके प्रिय कवि पिंडार का घर है , इस शहर को मैं कैसे तबाह कर सकता हूँ "?
एलेकज़ेंडर ऐसे पीछे हटता है जैसे उसपर कोई बिजली गिरी हो , उसका सारा जिस्म कांपने लगता है , तलवार हाथों से गिर जाती है और आँखों से आँसू बहने लगते हैं , वो किसी बच्चे की मानिंद मार्सेलैस से लिपट कर फफक फफक कर रोना शुरू कर देता है !
उस रात के अंधेरे में महान राजा एलेकज़ेंडर की फौज वहाँ से चली जाती है !
थिबीज़ वालों को सुबह पता ही नहीं चलता की उनके घरों, दरवाज़ों पर दस्तक दे चुकी मौत अचानक कहाँ चली गयी ?
(हेरोडोटस के वृतांत).
- अर्नेस्ट अल्बर्ट
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