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रामनवमी की बधाई



तुलसीकृत रामचरित मानस मे एक सम्पूर्ण मनुष्य के रूप मे 'राम' की कल्पना की गई है जो अंदर से उतना ही कमजोर है जैसे मै या आप हो सकते है, महिला को लेकर समूचे रघुवंश मे वही अवधारणाएं है जो आज के समाज मे दिखाई दे रही है पर फ़िर भी राम को पुरुषोत्तम मानकर हम एक राष्ट्र नायक के रूप मे देखते है क्योकि महाभारत मे कोई एक नायक नहीं है, महाभारत कई नायकों और असफल, हताश और युद्ध मे हारे हुए लोगों की कपोल कथा है वही राम ने रावण को मारकर और एक छोटे से द्वीप के जीतकर यह दर्शाया है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से जीतना चाहता है. वहाँ कोई द्वंद नहीं है कि जीतने मे किन तरीकों का प्रयोग हुआ है जबकि महाभारत हार, जीत, युद्ध, उन्माद और तरीकों पर बात करती है वहाँ सूर्यास्त के बाद लड़ाई बंद है जबकि रामचरितमानस मे लड़ाई हर वक्त एक अनिवार्य हिस्सा है. शायद यही कारण है कि कृष्ण सिर्फ गीता के उपदेशों और अपनी रोमांटिक अदाओं के लिए याद किये जाते है, वे राष्ट्र नायक नहीं है वे हिंदू प्रतीक उस रूप मे नहीं है जिस स्वरुप मे राम उभरकर आते है. 

रामचरित मानस मे सिर्फ एक राम ही है जिनके आसपास सारी कथाएं चलाती है जबकि महाभारत मे एक साथ कई कथाएं समानान्तर  चलती है इसलिए एक नायक का होना संभव नहीं था. मानस मे सारी लड़ाई एक हिस्से के लिए है और यह सामान्य  बात है, जबकि महाभारत मे समूची पृथ्वी पर सही और गलत की बात है न्याय- अन्याय की बात है. जाहिर है हम लोग छोटे स्वरूपों  पर और जीत को ज्यादा महत्व देते है इसलिए राम आज भी हमारे आदर्श है, राष्ट्रनायक है, और अभी भी हमारे जनमानस मे बसे है. 

रामायण का पाठ हर घर मे होना शुभ है जबकि महाभारत को घर मे रखा जाना अशुभ है, यह बात  भी जनमानस मे पैठ कर दी गई है और उसका ज्ञानस्रोत के रूप मे गीता का हर घर मे होना यह दर्शाता है कि जीवन  की मूल समस्याओं से हटकर हम दर्शन और काल से परे यानी एक मेटाफिजिकल विश्व मे जनमानस को रखना चाहते है ताकि समस्याओं से दूर रहकर परलोक सुधारने मे लगे रहे, ऐसे कर्म करते चले जिसके फल कम से कम इस दुनिया मे नहीं ही मिलेंगे....

कुल मिलाकर राम ने एक पुरुषोत्तम का रूप तो ले लिया जनमानस मे पैठ भी बिठा ली परन्तु जो  व्यवहारिकता थी वो उन्हें असली जीवन मे एक आदर्श पुरुष और अपने ही देश और काल मे ज्यादा यश - कीर्ति  नहीं दे सकी जो कि बहुत ही दुखद है. सीता पर अत्याचार और बेटों को दूर करके उनसे ही अश्वमेघ यज्ञ करना भी दर्शाता है कि एक कालजयी पुरुष बनने से अपने समय का होना ज्यादा महत्वपूर्ण है. महाभारत जीवन की वास्तविकताओं और आपसी जलन, प्रतिस्पर्धा और समय से पार जाने की कहानी का बखान करता है इसलिए यह अशुभ है और हम सब एक स्वप्न मे जीना चाहते है, जो हम अपने जीवन मे नहीं कर सकते वो इन नायकों मे ढूंढते है इसलिए आज भी राजा राम हमारे आदर्श है........... 


बहरहाल आप सबको रामनवमी की बधाई....

Comments

Unknown said…
हम लोग राम को तो मानते हे पर राम की नहीं मानते ! हम राम में अपना नायक तलाश करते हे लेकिन जीवन मूल्यों में रावन को तरजीह देते हे !राम इस देश के कण-कण और रोम-रोम में व्याप्त हे लेकिन उसी मर्यादा पुरषोत्तम का मंदिर हम लाशों के ढेर पर बनाना चाहते हे !गांधी और गुजरात अहिंसा के पर्याय हे ,लेकिन इसी धरती पर विगत एक दशक से गोडसे की हुकूमत हे !.... हे राम !

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