Skip to main content

जितेन्द्र श्रीवास्तव की ये ताज़ा कवितायेँ

जितेन्द्र श्रीवास्तव की ये ताज़ा कवितायेँ कुछ दिनों पहले मेल से मिलीं. उनकी कविताओं से मेरा नाता पुराना है - गोरखपुर के दिनों का. बहुत जल्दी शुरू करके और लगातार बहुत अच्छा लिखते हुए वह अब उस मुकाम पर हैं जहाँ परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती. स्मृति उनकी कविताओं का हमेशा से एक बड़ा स्रोत रही है. अपने गाँव-क़स्बे को लगातार अपनी कविताओं में संजोते हुए उन्होंने उनसे अपने समय की बड़ी और व्यापक विडम्बनाओं के पर्दाफ़ाश की कोशिश की है. यहाँ भी एक पूर्व राजघराने की कोठी के मैदान के सार्वजनिक स्थल से निजी संपत्ति में तब्दील होने का जो एक दृश्य उन्होंने खींचा है वह हमारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का एक बड़ा बिम्ब प्रस्तुत करता है. 

चुप्पी का समाजशास्त्र
उम्मीद थी 
मिलोगे तुम इलाहाबाद में
पर नहीं मिले
गोरखपुर में भी ढूँढा
पर नहीं मिले
ढूँढा बनारस, जौनपुर, अयोध्या, उज्जैन, मथुरा, हरिद्वार
तुम नहीं मिले
किसी ने कहा
तुम मिल सकते हो ओरछा में
मैं वहां भी गया
पर तुम कहीं नहीं दिखे
मैंने बेतवा के पारदर्शी जल में
बार-बार देखा
आँखे डुबोकर देखा
तुम नहीं दिखे
तुम नहीं दिखे
गढ़ कुण्ढार के खँडहर में भी
मैं भटकता रहा
बार-बार लौटता रहा
तुमको खोजकर
अपने अँधेरे में
न जाने तुम किस चिड़िया के खाली खोते में
सब भूल-भाल, सब छोड़-छाड़
अलख जगाये बैठे हो
ताकता हूँ हर दिशा में
बारी-बारी चारो ओर
सब चमाचम है
कभी धूप कभी बदरी
कभी ठंढी हवा कभी लू
सब अपनी गति से चल रहा है
लोग भी खूब हैं धरती पर
एक नहीं दिख रहा है
इस ओर कहाँ ध्यान है किसी का
पैसा पैसा पैसा
पद प्रभाव पैसा
यही आचरण
दर्शन यही समय का
देखो न बहक गया मैं भी
अभी तो खोजने निकलना है तुमको
और मैं हूँ
कि बताने लगा दुनिया का चाल-चलन
पर किसे फुर्सत है
जो सुने मेरा अगड़म-बगड़म
किसी को क्या दिलचस्पी है इस बात में
कि दिल्ली से हज़ार किलोमीटर दूर
देवरिया जिले के एक गाँव में
सिर्फ एक कट्ठे ज़मीन के लिए
हो रहा है खून-खराबा पिछले कई वर्षों से
इन दिनों लोगों की खबरों में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी है
वे चिंतित हैं अपनी सुरक्षा को लेकर
उन्हें चिंता है अपनी जान की
इज्ज़त, आबरू की
पर कोई नहीं सोच रहा उन स्त्रियों की
रक्षा और सम्मान के बारे में
जिनसे संभव है
इस जीवन में कभी कोई मुलाक़ात न हो
हमारे समय में निजता इतना बड़ा मूल्य है
कि कोई बाहर ही नहीं निकलना चाहता उसके दायरे से
वरना क्यों होता
कि आज़ाद घूमते बलात्कारी
दलितों-आदिवासियों के हत्यारे
शासन करते
किसानों के अपराधी
सब चुप हैं
अपनी चुप्पी में अपना भला ढूंढते
सबने आशय ढूंढ लिया है जनतंत्र में
अपनी-अपनी चुप्पी का
हमारे समय में
जितना आसान है उतना ही कठिन
चुप्पी का भाष्य
बहुत तेजी से बदल रहा है परिदृश्य
बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं निहितार्थ
वह दिन दूर नहीं
जब चुप्पी स्वीकृत हो जायेगी
एक धर्मनिरपेक्ष धार्मिक आचरण में
पर तुम कहाँ हों
मथुरा में अजमेर में
येरुशलम में मक्का मदीना में
हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाती किसी ट्रेन में
अमेरीकी राष्ट्रपति के घर में
कहीं तो नहीं हो
तुम ईश्वर भी नहीं हो
किसी धर्म के
जो हम स्वीकार लें तुम्हारी अदृश्यता
तुम्हें बाहर खोजता हूँ
भीतर डूबता हूँ
सूज गयी हैं आखें आत्मा की
नींद बार-बार पटकती है पुतलियों को
शिथिल होता है तन-मन-नयन
यदि सो गया तो
फिर उठना नहीं होगा
और मुझे तो खोजना है तुम्हें
इसीलिए हारकर बैठूंगा नहीं इस बार
नहीं होने दूंगा तिरोहित
अपनी उम्मीद को
मैं जानता हूँ
खूब अच्छी तरह जानता हूँ
एक दिन मिलोगे तुम ज़रूर मिलोगे
तुम्हारे बिना होना
बिना पुतलियों की आँख होना है
  
 तमकुही कोठी का मैदान 

 तमकुही कोठी निशानी होती 
महज सामन्तवाद की 
तो निश्चित तौर पर मैं उसे याद नहीं करता 

यदि वह महज आकांक्षा होती
 
अतृप्त दिनों में अघाए दिनों की 
तो यक़ीनन मैं उसे याद नहीं करता 

मैं उसे इसलिए भी याद नहीं करना चाहता
 
कि उसके खुले मैदान में खोई थी मेरी प्राणों से प्यारी मेरी साइकिल
सन उन्नीस सौ नवासी की एक हंगामेदार राजनीतिक सभा में 

लेकिन मैं उस सभा को नहीं भूलना चाहता
 
मैं उस जैसी तमाम सभाओं को नहीं भूलना चाहता
 
जिनमें एक साथ खड़े हो सकते थे हज़ारों पैर 
जुड़ सकते थे हजारों कंधे 
एक साथ निकल सकती थीं हज़ारों आवाजें 
बदल सकती थीं सरकारें 
कुछ हद तक ही सही 
पस्त हो सकते थे निजामों के मंसूबे

मैं जिस तरह नहीं भूल सकता अपना शहर 
उसी तरह नहीं भूल सकता
तमकुही कोठी का मैदान 
वह सामंतवाद की क़ैद से निकलकर 
कब जनतंत्र का पहरुआ बन गया 
शायद उसे भी पता न चला 
ठीक-ठीक कोई नहीं जानता 
किस दिन शहर की पहचान में बदल गया वह मैदान 
न जाने कितनी सभाएं हुईं वहां 
न जाने किन-किन लोगों ने की वहां रैलियाँ 
वह जंतर-मंतर था अपने शहर का 
आपके भी शहर में होगा या रहा होगा 
कोई न कोई तमकुही कोठी का मैदान 
एक जंतर-मंतर 
सायास हरा दिए गए लोगों का आक्रोश 
वहीँ आकार लेता होगा 
वहीँ रंग पाता होगा अपनी पसंद का 
मेरे शहर में 
जिलाधिकारी की नाक के ठीक नीचे 
इसी मैदान में रचा जाता था 
प्रतिरोध का सौन्दर्य शास्त्र 
वह ज़मीन जो कभी ऐशगाह थी सामंतों की 
धन्य-धन्य होती थी 
किसान-मजूरों की चरण धूलि पा 
समय बदलने का 
एक जीवंत प्रतीक था तमकुही कोठी का मैदान 
लेकिन समय फिर बदल गया 
सामंतों ने फिर चोला बदल लिया 
अब नामोनिशान तक नहीं है मैदान का 
वहां कोठियां हैं फ्लैट्स हैं 
वह आदमी वहीँ बगल की सडक से 
धीरे से निकल जाता है 
उस ओर 
जहाँ कचहरी है 
और अब आपको क्या बताना 
आप तो जानते ही हैं 
जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा है गरीब की

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...