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नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 15

जब वह समय आया था और वह भी बिछडने का तो बस एक ऐसा तगड़ा झूठ बोला और नाटक किया कि सब कुछ वैसा ही होता गया जैसा मै चाह रहा था पर आज ना जाने क्यों...............वो सब कह देने को मन करता है और जी करता है कि कह दूँ कि वो सब एक झूठ था, नाटक था, ताकि वो वहाँ जब जाये तो मेरी स्मृतिया विलोपित हो जाये एकदम से और फ़िर दिमाग वही करें जो करने के लिए उसे वहाँ भेजा गया था क्या मै भूल पाया हूँ इन चार महीनों में पांच अगस्त और उसके पहले.............के समय को.......पर आज तो बारह नवंबर है कब तक चलेगा यह झूठ .............किशोरी ताई ने बचपन में सिखाया था कि सारी दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाओ पर अपने आप से झूठ मत बोलो और आज यह कन्फेस करता हूँ कि वो सब नाटक था अपने आपको समझाने की झूठी तसल्ली और तुम्हे चैन से रहने देने के लिए एक नाटक.............ताकि उस मायावी दुनिया में रच बस जाओ और सब सीख लों...............नर्मदा में पानी बहुत तेजी से गुजरा है कई बार मैंने बाढ़ देखी है- अपने कमरे ही में, और शहर में चलती नाव भी-- पर जो जीवन का जोखिम मै उठा रहा हूँ तुम्हारे बगैर, वो कैसे किसी बाढ़ में बह जाने देता यह मेरे-तुम्हारे सांझे सुख थे , ये मेरे निजी  दुःख थे जो मैंने यहाँ-वहाँ जा-जाकर इकठ्ठा किये थे तुम्हारे साथ और उन्ही सभी यादों के घेरे में रहने को ताउम्र रहने को अभिशप्त मै कैसे रह रहा हूँ.............यह बूझ पाओगे कभी??? लौट आओ एक बार लौट आओ उस किनारे से हम सब जान रहे है कि एक बड़ा पुल बन गया है इस उद्दाम और वेगवती  नदी पर............दो पटरियोंनुमा हो गया है जीवन अब पर क्या कही कोई संभावना नहीं ............नहीं, नहीं, लौट आओ और कह लेने दो एक बार फ़िर मुझे नर्मदे हर, हर, हर............!!! (नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 15)

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हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

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