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देवास के मोहल्ले - 1

तराना के बड़े घर को छोड़कर वो आ गई थी यहाँ अपने दोनों लडको और एक बेटी के साथ, धीरे धीरे उसने दोनों बच्चों को पढ़ाया पर क्या हुआ इंटर करके भी नौकरी नहीं मिली, फ़िर उसका बचा-खुचा रूपया भी खत्म हो गया भैया, घर में मरद मर गया था कर्जा था खूब सारा सो घर बेचा और यहाँ माँ चामुंडा के कदमों तले आ गई थी पन्द्रह बरस पहले..............छोटी माई के घर में रही किराए की खोली में पचहत्तर रूपये  देती थी खोली के, ना बिजली ना पानी बस जैसे तैसे जी रही थी............इसी बजरंग पुरे में भिया क्या बताऊँ.......छोरी की शादी की और उस छोरी का भाग देखो बाबू लड़का मंडी में हम्माल था- सो निभा ले गया काली छोरी को भी वरना लडके मिलते कहा है ऐसे चरित्तर वाले और उस बुढिया के दोनों लडके इंटर करके भी कमा नहीं पाए यहाँ - वहाँ सिंधियों और बनियों की दुकानों पर काम करते रहे..... यही एक-डेढ़ हजार कमा लेते थे पर फ़िर भी बुदिया ने शादी कर दी दोनों की, बहुएं आई तों वो पुरे मोहल्ले में रोटी-पानी करने लगी फ़िर एक टिफिन सेंटर पर लग गई दो हजार नगद मिलते थे और खाना अलग.............फिरी में........हाँ बुढिया भी पुरे मोहल्ले में झाडू पोछा करती थी पर रूपये का लालच आ गया था उसके मन में पिछले कई दिनों से तीन सौ माँगने लगी थी ..........मैंने तों किच-किच  के कारण भगा दिया था कहती थी कि नाती पोते पढ़ रहे है, एवरेस्ट स्कूल की फीस बढ़ गई है, तों मै भी झाड़ू- पोछे के ज्यादा लूंगी....अरे फीस बढ़ने से हमें क्या हम क्यों ज्यादा दे रोज-रोज की किच-किच थी. पर थी भली औरत ये बात तों एकदम सई है बाबू........कल रात भी मैंने देखा कि घर का कोना कोना साफ़ कर रही थी वो अकेली और आज सुबह इन्होने, .ये सामने वाले उपाध्याय के देवर ने बताया कि वो रात को मर गई, सर फट गया भैया, सरकारी अस्पताल ले गये, अरे कोई पूछता है इन गरीबों को........... कोई मुआ डाक्टर भी नहीं था रात को अस्पताल में, सो, बस लाश ही लेकर वापिस आये दोनों लडके, बहुए रात भर  रोई तों नहीं हाँ सुबह बहुत नाटक किया रोने का........अब सई सांझ के मरया को कोई कद लक रोवे बाबू ? बस ले गये बुढिया को..... परतापी थी बहुत..... तराने से गाड़ी भर-भर के लोग आये थे. पहली बार मोहल्ले में इतनी गाडियां देखी हमने!!!!!! उस बुढिया में क्या था, पता नहीं, पर बहुत भीड़ थी उसकी मैय्यत में ......मुझे तों उसके मई महीने के डेढ़ सौ रूपये भी देना थे, बस पन्द्रह दिन काम किया था उसने बर्तन धोने  का, पर हम तों दे देंगे पुरे पैसे, ऐसे मरे हुए लोगों के पैसे थोड़े ही  रखेंगे..... हम भी संस्कारी लोग है.......और यही बजरंगपुरे में जिए है यही मरेंगे. हाँ छोटी माई का घर सुना हो गया है अब और चिंता है तों रज्जू की कि अब किराया कम हो जाएगा उसका..............नाम क्या था उस बुढिया का पता नहीं, हम तों तराने वाली बाई कहते थे, नाम क्या था ???  ये क्यों पूछ रहे हो बाबू.........अरे करना क्या है नाम जानकर उसका...... सिर्फ पन्द्रह बरसों से तों सामने रह रही थी अकेली अपने मरे हुए मर्द के बाद बचे परिवार को लेकर......उनका सिसकना और प्रलाप जारी था और मै सोच रहा था उस बुढिया के बारे में जो बगैर कोई कहानी कहे यूँही गुजर गई चुपचाप.............( देवास के मोहल्ले -1)

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