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नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा V

दरका तो कुछ नहीं था ......टूटा भी कुछ नहीं था....कही से कोई आवाज़ भी नहीं आई थी. इस भीगते हुए मौसम में जब सब कुछ भीगकर तरबतर हो गया था तो जीवन, वो भी एक बस आस पर चल रहा था, जब वो  आख़िरी भी  आस उस दिन टूट गयी तो जीवन में बचा ही कुछ नहीं, सब कुछ वही उसी जगह जमींदोज करके आ गया या यूँ कहू कि जमीन में गाड़कर अपने वजूद और उन रूपहले सपनों को जो मैंने कभी तुम्हारे साथ देखे थे, उन ऊँची पहाडियों पर घने पेड़ों की छाँव तले या मैसूर की गलियों में गोल गोल घूमते हुए या उस बौद्ध मंदिर में जहां अपने साथ हमेशा रखने की कसमें खाई थी, उस समय चक्र में जीवन के अनमोल क्षण और वो सामीप्य भी क्या सामीप्य था, शायद इसके सहारे ही जीवन चल सकता था पर कहाँ होता है सब कुछ अपना सोचा हुआ और फ़िर ये अपेक्षा भी तो एक दर्द ही है ना??? सब छूट गया .......सच है जमीन में सब कुछ गाड़कर सब कुछ खत्म हो ही जाता है, जब इंसान की देह भुरभुरी हो जाती है महज तीन चार माहों में तो यादें और सपने, कसमें और रिश्ते तो स्वाभाविक रूप से खत्म हो ही जाते है. एक आदमी को मारने के लिए जीवन में बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ते बस छोटी सी दो बातें और छोटी मोटी अदाकारी ही पर्याप्त होती है. ये दीगर बात है कि बहुत बेशर्म देह और काया ही लौट आती है एक इको की तरह से फ़िर दो चार होने को जद्दोजहद करने अपने किये पाप भुगतने, पर यह निश्चित है कि अब लौटना नामुमकिन है और इस देह को, उन सपनों को, उन वादों की पोटली को, और रूपहले आनेवाले कल को मै त्याग कर आया हूँ रहा सवाल नश्वरता का तो वो...........बस ....सवाल ही नहीं जवाब कहाँ से होंगे.......तटस्थ होना भी एक कला है जहां ना दुःख है ना सुख है ना उम्मीद की कोई धुंधली किरण.......बस एक देह है और साँसों का अनवरत क्रम  जो पता नहीं कितनी सदियों और युगों तक चलता रहेगा.............हे ईश्वर कही तो पूरा होने दे......(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा V)

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