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नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा III

ये एक लगभग खाली बस थी जो नर्मदा के किनारे बसे शहर से राजधानी जा रही थी. वो लगभग पचपन साल का आदमी होगा, शरीर पर एक खादी की बंडी, नीचे पीले रंग का धोतीनुमा कपड़ा लपेटे, पाँव में दो अलग अलग स्लीपर और बाल बेतरतीब से बढे हुए, ललाट पर लंबा सा चन्दन और आँखों में कही खालीपन था. जैसे ही उसके पास जाकर बैठा तो पूछने लगा रेलवे का ड्राईवर तो दो लाख कमा लेता है हर माह, पर ये वकील को कितनी तनख्वाह मिलती है........मैंने कहा कि नहीं अगर नौकरी करे तो तनख्वाह मिलेगी नहीं तो खुद की प्रेक्टिस करते है....फ़िर बोला तो फ़िर हलवाई को डेढ़ दो लाख मिलते होंगे, मैंने कहा नहीं उन्हें तो रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती है अगर बड़े होटल में हो तो बात अलग है....हैरान था फ़िर बोला तो डाक्टर को भी मजदूरी मिलती है या वे धंधा खोल लेते है..........और बेचारे नाई की तनख्वाह कितनी कम है, सुतारों को छठा वेतनमान अभी तक नहीं मिला, लुहार साले केन्द्र के बराबर महंगाई भत्ता उठा रहे है......इतनी गैर बराबरी क्यों है तुम्हारे इस देश में,  मै परेशान हो गया ससुरा रेडियो मिर्ची नहीं सुनने दे रहा मैंने कहा बाबा दिक्कत क्या है चुप बैठो नहीं तो यहाँ से उठ जाओ.......थोड़ी देर बाद मुझे कंधे झिन्झोड़ता हुआ पूछने लगा "क्या जिदंगी प्यार का गीत है......? मैंने देखा कि उसकी आँखों में आंसू आ गये थे ..मै भी थोड़ा सहम गया एकदम से मैंने कहा नहीं ऐसा सबके साथ नहीं होता ऐसा......बस अपनी -अपनी किस्मत है.........मै अपने कान में हेड फोन लगाकर गाने सुनने लगा पर वो जोर- जोर से गाने लगा......जिसका जितना हो आँचल यहाँ पर ..अचानक उसकी आवाज़ बढ़ गयी, सारे यात्रियों ने उसे चुप कराने की कोशिश की पर नाकाम, आखिर  बस के कंडक्टर ने उतारा उसे और बीच घाट में उतार दिया और उस पर मानो असर ही नहीं पड़ा. उतरते समय भी वो जोर से गा रहा था..."है अगर दूर मंजिल तो क्या, राहे काँटों से मुश्किल तो क्या...."(नर्मदा किनारे बेचैनी की कथा III)

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