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धूप का सौंदर्यशास्त्र 30 Jan 16



ये जो पके हुए बैरो की खटास जो घुलमिल जाती है धूप से लेकर हवाओं में वो पता नही कब गायब हो जायेगी , अब से मेरे ख़्वाबों में वो अमराइयाँ आ रही है जो लखनऊ से हरदोई जाते समय मलीहाबाद की सड़कों पर गमकती थी मीठे और मदहोश करने वाले नशे की तरह, आज भी इस मालवे में उस नवाब को ढूंढता हूँ जो एक आम का पेड़ मेरे ख़्वाबों में लगा दे और मैं उन कच्ची डालियों पर उचक कर तोड़ लूँ एक बड़ा सा पीला आम छुटपुटे में और भाग जाऊं किसी चोर की तरह और खाता रहूँ देर तक गुठली को और फाँकों को सजाकर रख दूं अपने दिल के आले में !!!

दूर कही से सूरज की रुपहली किरणें पड़ती है तो चारो ओर फ़ैली यह मखमली हरियाली और मुखर हो उठती है, ये गेहूं की झूमती बालियाँ ऐसा तान छेड़ती है कि सडकों और गलियों से निकलती हवा रुक जाती है ठहठहाकर, भंवरें बावरे से होकर गुनगुनाने लगते है, मधु मख्खियाँ फूलों का रस छोड़कर टूट पड़ती है इस मखमली हरियाली पर और आकाश में उड़ते पक्षी कलरव गान शुरू कर देते है, ये बसंत का मधुमास है और पूरी फिजां में खामोशी पसारती हंसी ने छोटी छोटी पत्तियों को हिलाकर रख दिया होगा पूरे बियाबान में, इस बंद कमरे के बाहर मौसम बदल रहा है और यहाँ सदियों से पसरी मुर्दानगी भरी वीरानी छाई है, यह पेड़ के तनों से पुराने पत्ते बिखरने का और नयी कोपलें आने का वक्त है, हरी पत्ती के पीले जर्द हो जाने से और इसी जर्द आवारा पत्ती के अब धूप और हवा में दूर तलक बह जाने का खूबसूरत मौसम है, आओ बसंत का स्वागत करे, दूर सूरज ने भी लाल छोड़कर पीला रंग ओढ़ लिया है.........और चाँद कही पीली आभा में इतरा कर निकला है

#धूपकासौन्दर्यशास्त्र

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