Skip to main content

Posts of 29-31 Jan 16


मुझे भी शुमार करो अब गुनहगारों की फेहरिस्त में....
मैं भी क़ातिल हूँ हसरतों का, मैंने भी ख्वाहिशों को मारा है..


*****

एक तो फ्री में लिखवा लेते है दबाव डालकर और फिर जब मिलते है तो गोली मारने की भी धमक्री देते है , ये तो हाल है मीडिया के नामी गिरामी संपादकों के। ये श्रीमान जो छोटे लाडले नवाब और अनुज है बेदर्द दिल्ली में रहते है मिले 15 साल बाद तो बन्दूक तान दी , गजब हो यार - Sarang Upadhyay । आज मजा आ गया। इनके शहर और मुहल्ले में था ना। देवास आओ मियाँ फिर देखते है 


😁😁😁
*****

ये है ढोंग पाखण्ड और शर्मनाक दुनिया जिसमे हम रहते है। एक व्यक्ति मरता है और उसके लिए समाज के लोग करोड़ो रुपया खर्च करते है नीचे लिखे रीति रिवाजों पर और यही लोग ब्याज की चवन्नी भी नही छोड़ते। मप्र के बड़े अखबार नईदुनिया में आज की लीड स्टोरी है, कोई मन गढ़न्त कहानी नही है।
तिस पर से आज जब समाज के बच्चे कुपोषण और भूख से बिलबिला रहे है तो करोड़ो रूपये के मन्दिर बनाने का क्या तुक है। देश भर में यहां तक कि मालवा में गोम्मटगिरी से लेकर पुष्पगिरी तक जैसे मन्दिर बने है, पूरी की पूरी पहाड़ियाँ उजाड़कर अपने मठ बना लिए फिर इन मन्दिरों की जरूरत क्या है ? जिस विश्व कल्याण की बात ये समाज करता है वह कौनसा समाज है, विदिशा का एक सात साल का बच्चा दिल के छेद का इलाज नही करवा पाता और मर जाता है अभाव में, तब कोई भला मानुष आगे नही आता।
और यह सिर्फ एक समाज की नही सारे धर्मों और समुदायों की है, इंसानों के रहने की जगहें बजबजाते गन्दे नालों में है और मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बीच शहरो में जमीन हथिया कर बैठे है।
विचलित हूँ पुष्पेन्द्र की खबर देखकर और ये ढोंग देखकर। शर्म आती है ऐसे देश का नागरिक होने पर जहां ज़िंदा बच्चे और आदमी की कदर नही और एक मरे हुए संत को मुखाग्नि देने के लिए करोड़ों की "बोली" लगती हो।
धिक्कार है ऐसे मुर्दा समाज पर , न्याय और शासन प्रशासन पर जो इस तरह की मौत के खुले जुए और सट्टे को प्रश्रय देता हो।
मप्र में यह सत्ता और राजनीति की शह पर ज्यादा हो रहा है, क्योकि निर्णायक लोग तो व्यापमं से जान छुड़ाने के रास्ते खोज रहे है और बच्चे मर रहे है।
एक बात और ये आयकर विभाग इस तरह के मामलों में क्या करता है जो लोग खुले आम इस तरह के कार्यक्रमों में, दीक्षा समारोह , पर्युषण और अन्य बोली लगाने वाले वणिक समुदाय के धन लोलुप धार्मिक रीति रिवाजों में रुपया लगाते है।
विदिशा के बच्चे की लाश और एक बेशर्म महिला अधिकारी द्वारा उसके पिता को दिए गए शासन प्रदत्त दो हजार रूपये कोई मायने रखते है इस शाही मौत के सामने ?
कितना और गिरेंगे हम और कितने बच्चों की जान लेंगे, शिवराज सिंह जी कितने और लोगों को अंधा करके अपनी कुर्सी बचाकर रखोगे, कब तक इस तरह के कार्यक्रमों को भव्यता दोगे ? याद रखना अगर भगवान मानते हो, मैं तो नही मानता, पर सुना है उसकी लाठी जब पड़ेगी तो आवाज भी नही होगी।


*****


Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...