Skip to main content

"शर्म से कहाँ गड़ मरुँ"- -बहादुर पटेल

मित्र Bahadur Patelकी एक नायाब कविता with a Confession being a MALE

शर्म से भरा हुआ हूँ मैं आजकल
इतना ज्यादा कि कहाँ छुपाऊ अपने आपको
है कौन सी ऐसी जगह
जहाँ उतर जाँऊ दबे पाँव
कहाँ से लाऊँ ऐसे पाक साफ हाथ
जिनसे ढँक सकूँ अपना ये मलिन चेहरा

कैसे बचाऊँ अपने होने से
इस पृथ्वी के टूटते रेशों को
कौन सी कालिख होगी अपने भीतर के कलंक
नापने के लिए
आदिम नाख़ून हैं मेरे
जिन पर लगे खून के धब्बे किस पानी से धोऊँ मैं

आरोप किसी खाई से निकलना दुष्कर
कितना मुश्किल है अपने को गुनाहगार कह पाना
किसकी ओट में जाकर छिपूं मैं
हर तरफ अब मेरी अपनी आँखों में
दिखता है भेड़िये का रूप
अपने होने को कैसे नकार सकता हूँ मैं

किस किस से क्षमा मांगूंगा
कौन सी स्त्री करेगी मुझे बाइज्जत बरी
सदियों का अपराधी हूँ मैं
अपने पुरखों के अपराध भी धरो मेरे सर
मैं उफ़ तक नहीं करना चाहता
अपनी नाभि नाल को मुझसे अलग करो
मैं प्रार्थना से छलने का आदि हूँ

धरती कब तक गाओगी मेरे पैदा होने पर
मंगल गीत
धकेलो मुझे कि हर स्त्री का दोषी हूँ
गिरूँ तो कहीं जगह न मिले
आकाश न थामना मुझे
मेरी काली छाया से बचना तुम

माँ किस मुंह से पुकारूँ तुम्हे
बहिन कैसे मुंह दिखाऊँ
बेटी कैसे कहूँ तुम्हे बेटी
बताओ तुम सब कि कैसे छुपाऊँ
मैं अपने पुरुष का चेहरा
कि शर्म से कहाँ गड़ मरुँ .

-बहादुर पटेल

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...