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"सच कडवा होता है दोस्त"


वे चाहते थे कि एक हिस्सा मै भी बन जाऊ
उस व्यवस्था का जो पूर्णत नाकारा हो चुकी है
उन्ही दफ्तरों मे घूमती रहे रूह मेरी जो श्मशान से
ज्यादा खौफजदा थे, और खतरनाक भी.

बरसों पहले मिली आज़ादी को इन्ही दफ्तरों ने
बर्बाद कर दिया, ध्वस्त कर दिया और
जब भी घुसा कोई आम आदमी इन दफ्तरों मे
बस वो मुर्दा ही निकला है यहाँ से.

फाईलों और अर्जियों मे खपते जीवन को लेकर
कैसे कोई एक सारी उम्र गुजार सकता है 
बेहद तंग दिमाग और सुस्त चाल से चलने वाले
ये लोग एक घुन की तरह से देश को चाट गये.

कहने को एक लंबी फौज और लंबे कायदे-क़ानून
पर सुनने को और महसूसने को एक भी आदमी नहीं
निहायत दकियानुसी सोच और शातिर चाल से
चलने वाले ये नौकरशाह खोखला कर चुके है देश को

वे चाहते है कि मै भी रच-बस जाऊ इस द्यूत क्रीडा मे जो
रोज-रोज खेली जाती है सियासत की चौसर पर
और मारा जाता है एक आदमी हर बार, हर चाल पर
और कही सुनाई नहीं देती चीख उसकी किसी को.

वे चाहते है कि मै खत्म का दूँ अपना जीवन उस तंत्र मे
जो चारण-भाट और चापलूसों से भरा पड़ा है
जो इंसान को इंसान होने का दर्जा नहीं दे सकता
अपनी बात कहने समझने की ताकत नहीं देता.

बेहतर है मित्रों, पलायन और फ़िर एक बिगुल फूंकना
बेहतर है अपनी रोजी-रोटी के लिए कुछ और तलाशना
बेहतर है भूखे रहकर एक आज़ाद दुनिया के सपने देखना
बेहतर है उस जाल से अपने जाल मे फंसकर मर जाना.

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