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तस्लीमा या सलमान रश्दी को लिखने के लिए क्या क्या झेलना पड़ा होगा यह इतनी जल्दी समझ आ जाएगा आज पता चला जब मैंने चार दिन पहले देवास के नाम से कुछ वास्तविकताएं लिखना शुरू किया था दोस्त, परिजन और पत्रकार मित्र नाराज हो गए, उनका कहना सही है कि ये कहानी हर शहर की है पर देवास को टारगेट बनाकर में क्यों लिख रहा हूँ, इससे देश भर में उनकी बदनामी हो रही है वो जहा जा रहे है उससे लोग उन्हें ना जाने क्या क्या कह रहे है. बात हो सकता है सही हो, पर मेरे दो-तीन सवाल है मित्रों - कितने लोग इंटरनेट पर है, फ़िर देवास के लोग या कही के भी लोग सच्चाई से भागना क्यों चाहते है, यह एक व्यंग्य है इसे कोई क्यों नहीं समझना चाहता ताकि वो सुधार कर सके व्यवस्था में, यह व्यक्तिगत ना होकर एक कस्बे की शहर बनने की पीड़ा है जो वैश्वीकरण के दौर में हर उस शख्स को भुगतना पड रही है जो थोड़ी बहुत भी संवेदनाएं रखता है.
मूल्यों का बिखरना जिसने परिवार तोड़े है, सामाजिकता को खोया है और अब आदर्शो की बात कर एक अभिव्यक्ति पर चोट की जा रही है या यु कहे कि धमकियां दी जा रही है सीधे सीधे......चलो मुझे समझ आया कि कही तो चोट लगी है किसी के तो मर्म जगे है और लोगो को शब्द सत्ता और ताकत समझ आई है. इसी बहाने यदि मेरे शहर के लोग इकठ्ठे हो जाए और अक्षुण संस्कृति को बचा ले तो में अपने को कृतार्थ समझूंगा.......धन्यवाद दोस्तों और प्यार के लिए शुक्रिया......

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