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"कपोल कस्बे की कथा"

इंदौर से आते हुए वह भरी बस में एकदम अकेला है, खोज रहा है कोई अपना चेहरा कि दिख जाए और फ़िर वो खुद ही मुस्कुरा दे हलके से ...........बहुत जुगाड करने से भी कुछ हाथ ना लगा..ये कैसा शहर है जो इतना बदल गया है कि कोई चेहरा अपना नहीं लगता, सारे चेहरे लिपे पुते हुए है और बातचीत के बजाय कान में इअर फोन लगाए रेडियो के गाने सुन रहे है, फ़िर जब गौर से देखना शुरू किया तो समझ आया कि ये वो लोग है जो इस कस्बे की ही पैदाईश है पर अब ये प्रोफेशनल होने का स्वांग कर रहे है चवन्नी अठन्नी का धंधा और दिन भर की मारामारी में लगे ये लोग अपने बाप के नहीं तो किसी के क्या होंगे....कैसे पहचान आदमी को नंगा और कमजोर कर देती है ये वही कस्बा है जहा उसने उम्र के लगभग पैतालीस साल गुजार दिए और इन लोगो को बहुत करीब से जाना समझा है.....ये रीढ़ विहीन लोग कितने उथले और थोथे है यह तब समझ आया था जब उसने एक बार कुछ लिखा था फ़िर इन की ओकात पता चल गयी थी........ये वो लोग है जो अंदर से प्यारे सरपरस्त, कमीन पर ऊपर से बिलकुल घटिया और अहसान फरामोश है.......बस आगे बढती जा रही है और चेहरे के रंग और रूप सामने नजर आ रहे है अचानक एक उठा और उस तक पहुंचा और बोला आप मेरी सीट पर बैठ जाए मै आपको जानता हूँ आप वही है ना........खैर......अब समय नहीं था सब कुछ सामने आ रहा था और यह भी क्यों वह इस तरह से उठाकर सामने आया था.....
( "कपोल कस्बे की कथा" लिखी जा रही एक श्रृंखला का अंश)

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