Skip to main content

एनजी ओ पुराण 112

देश के बड़े उद्योगपतियों की ही जमात का था वो, कंप्यूटर बेचकर और प्रोग्राम बनाकर रूपया ऐसे समय में कमाया था जब लोग क कंप्यूटर का नहीं जानते थे, आज एक बड़े साम्राज्य का मालिक अकूत संपदा और धन दौलत का दावेदार था वो. बड़ी कमाई पर बड़ा टेक्स भी देना लाजिमी था, पर एक गरीब देश में जैसे टेक्स बचाने की कई सारी गलियाँ थी एक समाजसेवा की दूकान खोलने से टेक्स की बचत ही नहीं की जा सकती थी वरन समाज में पुण्य भी कमाया जा सकता था, बॉस के दिमाग में यह आईडिया जम गया कुछ रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारियों को और कुछ अनुभवी लोगो को रखकर एक दूकान खोल ली और लगभग आठ सो नो सो करोड रूपया लगा दिया अपनी ही दूकान में. "शिक्षा" साली वो घटिया नाली जिसमे सब बह जाता है, बस इसी नाली को खोदने का ठेका ले लिया अलग अलग राज्यों में, हर जगह अच्छे कारीगर मिल गए जो पहले से इस तरह के कुत्सित प्रयासों के जानकार और विद्वजन थे, ये वो लोग थे जो ज़िंदगी भर कुकर्म करके भी रूपये की भूख मिटा नहीं पाए थे और अब बढती महंगाई में अपने सपने पुरे करना चाहते थे, लाल रंग की चुनरिया ओढ़े ये लोग इस उद्योगपति के घराने में शामिल हो गए और घराने की दूकान तमाम कुकर्मियो के लिए खुल गयी, नवाचार से लेकर व्याभिचार में लिप्त ये कुकर्मी लोग अब इस दूकान के घोषित ब्रांड एम्बेसेडर है, सारे निष्कासित, भ्रष्ट और अव्वल दर्जे के धूर्त आजकल इसी दूकान के ऐसी कमरों में बैठकर नाटक कला से लेकर शिक्षा और प्रयोगो की धज्जिया उड़ाते रहते है और वो उद्योगपति बैठकर ताकता रहता है कि चलो शिक्षा की नाली के बहाने ही सही, कभी तो लोग इस देश में कुछ सीखेंगे......खुश है नवाचारी और धकेले गए लोग कि लाख रूपया पा रहे है हर माह और उनकी दुकाने भी चल रही है उनके पीछे खुश है युवा समाजसेवी कि एक दिन वे भी ऐसे ही एक घराना खोल देंगे और देश के बहाने अपना टेक्स बचायेंगे.(एनजी ओ पुराण 112)

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...