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रादुगा प्रकाशन-एक विचारधारा बनाने में और समझ पुख्ता करने में ठोस मदद

मेरे घर में माँ चूँकि शिक्षिका थी इसलिए उन्हें सोवियत नारी खरीदना पडती थी बड़ी लंबी चौड़ी खूबसूरत पत्रिका होती थी चिकने कलेवर वाली जानकारियों से भरपूर हिन्दी में छपी पत्रिका के आने का हम लोग इंतज़ार करते थे, थोड़े बड़े होने पर एकलव्य के पुस्तकालय से ढेर सारी रूसी किताबें पढ़ी और अब मेरे पास पांच-पांच रूपयों में खरीदे उपन्यासों का एक बड़ा संग्रह है जो आज करोड़ों रूपयों में नहीं खरीदा जा सकता, गोर्की, तोल्स्तोय, चेखोव और ढेर सारी किताबें पढकर बड़ी हुई हमारी पीढ़ी आज भी रादुगा प्रकाशन जैसे संस्थानों के प्रति आभारी है जिसने एक विचारधारा बनाने में और समझ पुख्ता करने में ठोस मदद की. भीष्म साहनी को कहानीकार के रूप में बाद में जाना पहले तो उनके अनुवाद ही पढ़े थे आज मेरे पास बच्चों की ढेर किताबे है जो हाल ही में मैंने पानपाट, कन्नौद स्थित एक संस्था में बच्चों को पढाने के लिए दे दी है. वाह क्या बात थी रूसी जगत और उनके प्रकाशनों की................ मै भी बच्चों की किताबें पचास पैसे या एक रूपया दो रूपये में पढकर बडा हुआ और बाद में तीन तीन संकलनों के उपन्यास पांच या सात रूपयों में खरीदे चाहे...

हिन्दुस्तान का विकास जाति हटाये बिना नहीं हो सकता

हिन्दुस्तान का विकास जाति हटाये बिना नहीं हो सकता और अब ये चुनौती सिर्फ और सिर्फ युवा ही स्वीकार कर सकते है ................तय करे कि ना जाति बताएँगे, ना पूछेंगे, ना मानेंगे.............. जाति बनाए रखने में ही असल में सबका फ़ायदा है और यही वो मूल कारण है कि कोई इसे गम्भीरता से नहीं लेना चाहता ब्राहमण, वैश्य, ठाकुर और दलित सब अपने "कम्फर्ट ज़ोन" में बने रहना चाहते है और इसका फ़ायदा राजनेताओं ने उठाया है चाहे वो अम्बेडकर हो, गांधी हो या आज तक के सारे कांग्रेसी, बसपाई, भाजपाई, समाजवादी, वामपंथी, दलित पेंथर हो या कोई भी...........और जब तक हम बहुत दृढता से इसे खत्म नहीं करेंगे चाहे वो आरक् षण हो या ढेरों प्रकार के दस्तावेजों में जाति का कालम या प्रवेश प्रक्रिया हो या लाभ लेने की बात हो, वरना तो ऐसे दर्जनों कार्यक्रम है आम्बेडकर संस्थान है, क़ानून है और मैला ढोने की प्रथा हो.............सरकार हो या एनजीओ हो या फंडिंग एजेंसी - सब इस हमाम में क्या है - हम सबको मालूम है. ..............मेरा पक्का मानना है कि जाति खत्म करने में किसी की रूचि नहीं है सब मजे ले रहे है और...

एक बनावटी शहर जो किसी विदेशी राष्ट्र के औपनिवेषिक हित साधने के लिये बना था-बादल सरकार का एक पत्र

  प्रति – रिचर्ड स्केचनर दिनांक 23 नवम्बर, 1981 प्रिय रिचर्ड, आप चाहते थे कि मैं “द ड्रामा रिव्यु” के “अंतर-सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ” अंक के लिये लिखूं। आप चाहते थे कि मैं अपने थियेटर ग्रुप “शताब्दि” से जुडे अनुभव लिखूं; उन कठिनाईयों के विषय में लिखूं जो मैनें झेली हैं तथा उन सफलताओं पर भी जो मुझे हासिल हुई है; मैं इस संदर्भित अपनी मानसिक स्थिति तथा एक नाट्य लेखक और निर्देशक के तौर पर अपना अनुभव लिखूं। मैं क्या लिख सकता हूँ? मैं निबंधों का लेखक नहीं हूँ। मैंने कुछ नाटक लिखे, लेकिन इस लिये नहीं कि मैं कोई लेखक हूँ, बल्कि इस लिये क्योंकि मैं रंगकर्मी हूँ। आपने मुझे अंग्रेजी में लिखने को कहा है लेकिन अंग्रेजी मेरी भाषा नहीं है।“शताब्दि” के साथ थियेटर और मेरे शहर, कलकत्ता के सांस्कृतिक जंगल में मेरे अनुभव; दूसरे व्यक्तियों, समाज और जीवन से जुडे मेरे अनुभव; बेतुके हैं, घृणास्पद हैं, तो खूबसूरत भी। यह सब कुछ एक अव्यवस्थित भ्रम के ढेर में से हो कर अर्थपूर्ण और मानवतावादी रास्ता तलाशने के लम्बे इतिहास और प्रयास से बेहतर कुछ नहीं। मैं पीछे मुड कर उस रास्ते को त...

सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा - अग्रज कवि कुमार अम्‍बुज द्वारा प्रेषित

तीन लेखकों द्वारा जारी प्रपत्र भोपाल, 05 जुलाई 2012 सार्वजनिक साहित्यिक संस्थाओं का राजनैतिक रूपान्तरण और लेखकों की प्रतिरोधी भूमिका पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश के भारत भवन, साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी और कला परिषद सहित कुछ संस्थानों से समय-समय पर, पृथक-पृथक कारणों से वामपंथी लेखक संगठनों तथा रचनाकारों द् वारा प्रत्यक्ष दूरी बना कर रखी गई है। कतिपय तात्कालिक कारण दूर हो जाने पर स्थिति यह है कि अनेक लोग जहाँ इन संस्थाओं, खासकर भारत भवन के आयोजनों में सीधी भागीदारी करने लगे हैं, वहीं गिने-चुने कुछ लेखकों ने इस दूरी को प्रखरता और दृढ़ता से बरकरार रखा है। इन लेखकों में से (भोपाल में रहनेवाले) पहले स्वर्गीय कमला प्रसाद जी के साथ और फिलहाल हम तीन यानी राजेश जोशी, कुमार अम्बुज और नीलेश रघुवंशी, लगातार इस मुद्दे पर विचार करते रहे हैं और अभी भी हमारा निष्कर्ष है कि इन संस्थानों में ‘रचनाकार के रूप में भागीदारी’ न करने की हमारे पास ठोस वजहें हैं। ये वजहें अनौपचारिक बातचीत में अन्य साथी लेखकों को बताई जाती रही हैं। लेकिन, अब जबकि कुछ महत्वपूर्ण, चर्चित वामपंथी लेखक या व...

प्रशासनिक पुराण 51

नया लौंडा था एकदम अन्तर्राष्ट्रीय गिरगिटो से दक्ष होकर जिले में आया ही था, बेचारा ना भारतीय प्रशासनिक सेवा को जानता था ना, ना इनके घाघ उल्लूओं को जो जिले में तीन साल के लिए जिले को बाप की संपत्ति मानकर बैठ जाते थे अंगद के पाँव  की तरह और घर भर के लिए खानदान भर की कमाई  कर लेते थे. खैर नया था सो उसने गिरगिटों के कहने पर जिलाधीश को अपनी नियुक्ति दी और कहा कि साहब मै इस आपके जिले में विटामिन "ए" का काम देखूंगा ताकि सारे नवजात बच्चों को विटामिन "ए" सप्लीमेंट मिल सके और वे स्वस्थ जीवन जिए. जिलाधीश के पल्ले कुछ पड़ा नहीं, थोड़ी देर  तो काफ्का और सार्त्र की तरह सोचता रहा फ़िर पेपरवेट घूमाता रहा टेबल पर, फ़िर उससे बोला वो तो ठीक है अब ये बताओ विटामिन "बी", "सी", "डी" पिलाने के लिए कौन सी नियुक्ति होगी फ़िर बोला और खास एक बात विटामिन "बी काम्प्लेक्स" पिलाने के लिए कौन आएगा? देखो ऐसा है मुझे  बेवकूफ मत समझना मै भा प्र से का अधिकारी हूँ और प्रदेश मुखिया की गुड बुक में हूँ तो मेरे जिले में सभी प्रकार का विटामिन सभी उम्र के लोगों को मिलना चाहि...

वे तुम्हारे साथ ज़रूर हैं लेकिन तुम्हारे नहीं हैं.

तुम्हारे बच्चे तुम्हारी संतान नहीं हैं वे तो जीवन की स्वयं के प्रति जिजीविषा के फलस्वरूप उपजे हैं वे तुम्हारे भीतर से आये हैं लेकिन तुम्हारे लिए नहीं आये हैं वे तुम्हारे साथ ज़रूर हैं लेकिन तुम्हारे नहीं हैं. तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो, अपने विचार नहीं क्योंकि उनके विचार उनके अपने हैं. तुमने उनके शरीर का निर्माण किया है, आत्मा का नहीं क्योंकि उनकी आत्मा भविष्य के घर में रहती है, जहाँ तुम जा नहीं सकते, सपने में भी नहीं उनके जैसे बनने की कोशिश करो, उन्हें अपने जैसा हरगिज़ न बनाओ, क्योंकि ज़िन्दगी पीछे नहीं जाती, न ही अतीत से लड़ती है तुम वे धनुष हो जिनसे वे तीर की भांति निकले हैं ऊपर बैठा धनुर्धर मार्ग में कहीं भी अनदेखा निशाना लगाता है वह प्रत्यंचा को जोर से खींचता है ताकि तीर चपलता से दूर तक जाए. उसके हाथों में थामा हुआ तुम्हारा तीर शुभदायक हो, क्योंकि उसे दूर तक जाने वाले तीर भाते हैं, और मज़बूत धनुष ही उसे प्रिय लगते हैं. - खलील जिब्रान

मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो

मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे ना जाने मुझे क्यूँ यक़ीं हो चला है मेरी याद को तुम मिटा ना सकोगे मेरी याद होगी जिधर जाओगे तुम कभी नग़्मा बन के, कभी बन के आँसू तड़पता मुझे हर तरफ़ पाओगे तुम शमा जो जलायी मेरी वफ़ा ने बुझाना भी चाहो बुझा ना सकोगे कभी नाम बातों में आया जो मेरा तो बेचैन हो होके दिल थाम लोगे निगाहों पे छायेगा ग़म का अंधेरा किसी ने जो पूछा सबब आँसुओं का बताना भी चाहो बता ना सकोगे