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Khari Khari, Drisht Kavi, Man Ko Chithti, Prashasan Puran, NGO Puran, Open Shelf and other Posts from 26 Oct to 1 Nov 2026

वोट चोर - गद्दी छोड़
समय आ गया है कि राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ज्ञानेश कुमार को तुरंत अपने पद से हटाएं क्योंकि इतना हंगामा खड़ा होने के बजाय इस अधम नीच को हटाना जरूरी है और बाकी तो वोट से जीत लेंगे
और यदि राष्ट्रपति यह नहीं करती है मोदी शाह के दबाव में तो सीजेआई स्वत: संज्ञान लेकर राष्ट्रपति से मिलें और आपातकाल लगाने की तगड़ी अनुशंसा करें पर सूर्यकांत यह करेंगे नहीं क्योंकि सौजन्यता से सब खुश रहते हैं
कुछ होगा नहीं क्योंकि नीच और घटिया लोगों का कोई ईमान नहीं और सत्ता के लिए जो छह दशक तक भूखे रहें और हिंदू मुस्लिम करते रहें वे शराफ़त, ईमानदारी और नैतिकता खो चुके है जनता का विश्वास खत्म हो गया है इन्हें शराफत से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए
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कितना खतरनाक निकला पप्पू
आज पूरी भाजपा को दस्त लग रहे है और दिल्ली सम्हाले नहीं सम्हल रही, भाजपा के सारे टॉमी, कल्लू, कालू, मोती, शेरू, भूरू, रोजी, चेरी, सोनम और सड़ेले हड़के कुत्ते मैदान में है पर नहीं सम्हाल पा रहें दिल्ली और अब देश का बच्चा - बच्चा जान गया है,संघ अलग मजे ले रहा है दो गुजरातियों का और सारे आनुषंगिक संगठन मोदी की तानाशाही के खिलाफ आंतरिक रूप से इकट्ठे हो गए है और सरकार के ज्ञानेश के साथ मोदी सरकार के उल्टे दिन गिन रहे है, भागवत से लेकर सड़*करी इंतजार कर रहे है कि सिंहासन खाली करो अब हम आयेंगे, राजनाथ योगी स्मृति से लेकर नड्डा,नितिन नवीन, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और आनंदी बैन तक शुभ मुहूर्त के इंतजार में है
यदि मोदी पप्पू कहलवाने के लिए उन्नीस सौ करोड़ खर्च नहीं करता, तो आज स्थिति दूसरी होती, मतलब हद यह है कि आजादी के बाद या 1984 के बाद सिख समुदाय के साथ हुए अत्याचार के खिलाफ कुछ नहीं किया, आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों की गुलामी करते रहें, माफ़ी मांगते रहें षडयंत्र करते रहें और आज इनको सिख दंगे याद आ रहे है, इन शुकरदेवों, श्वानों और मणिशंकरों को व्यापारी याद आ रहे है, जब जीएसटी लगाया, जब डिजिटल पर पेमेंट लगाया, भाव बढ़ाये, नोट बंदी की, जमीन से लेकर धंधे गिरवी रख दिए, कोविड में लॉक डाउन करके स्टेशन हवाई अड्डे बेच दिए, नौकरियां छिन ली तब इन्हें कुछ याद नहीं आया, कभी सच्चर आयोग की बात की इन्होंने सन 2014 से तो आज नानी - दादी याद आ रही है, लाओ री सखी - बरनाल लाओ
और सिर्फ राहुल को क्यों कोस रहें है, बाकी सारे विपक्षी दल भी है, यह तो ऐसे ही हुआ जैसे अकेले राहुल ने मोदी और भाजपा के घोड़े मार दिए हो
मजा आ रहा, कैसे बिलबिला रहे है स्साले, रोवो अब, जितना जनता को तुमने रुलाया है ना उतना भुगतोगे, कीड़े पड़ेंगे, एक ब्राह्मण का श्राप है, अभी तो युवा आयेंगे और ज्ञानेश को तो नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी कमबख्त और इसके खानदान से कोई अगले चौदह जन्मों तक रिश्ता नहीं रखेगा बोले तो मोहल्ले का कुत्ता भी इसकी सायकिल पर सू &₹#@ नहीं करेगा
क्या बोलते है चीयर्स
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एक कोना अपना



इंदौर में 10, कंचनबाग यानी होटल क्राउन पेलेस के सामने एक सुन्दर सा कोना है जहां आप तसल्ली से बैठकर खूब सारा पढ़ सकतें है, अपना काम कर सकते है और लम्बा समय सुकून से बीता सकते है
यह जगह यानी Open Shelf ReadingFoundation द्वारा बनाई गई अप्रतिम लाइब्रेरी है जहां आप न्यूनतम शुल्क रोजाना, मासिक या वार्षिक शुल्क भरकर सदस्य बन सकते है
अंशुल और दीपिका ने यह जगह बनाई है, अंशुल आईटी इंजीनियर है और दीपिका बारह साल अमेरिका रहकर आई और उन्हें महसूस हुआ कि पढ़ने लिखने की आदतें खत्म होती जा रही है, अपनी सारी कमाई और बचत दोनों ने लगाकर बहुत सुन्दर कोना बनाया है, एक बड़े हॉल में बहुत करीने से किताबें सजाई है और बैठक व्यवस्था की है जहाँ बच्चों के लिए भी एक कोना है
आप चाहे तो यहां बैठकर पढ़ सकते है, किताबें खरीद सकते है, मन करें तो चाय काफी या ठंडा भी सामान्य शुल्क देकर पी सकते है, इतना सुकून और शांति है कि आपकी रचनात्मकता जाग जाएगी और आप शब्दों के संसार में अथक यात्रा कर अपना कुछ बुन और गुन सकते है
कल यह जगह देखकर सिर्फ इतना लगा कि काश स्थाई निवास इंदौर में होता तो सोमवार छोड़कर रोज सुबह ग्यारह बजे से रात नौ बजे तक यही पढ़ता, लगभग छह सौ सदस्यों वाले इस पुत्कालय में बहुत Positive Vibes है
सोनल ओ'बाशो का बहुत शुक्रिया यह जगह दिखाने को, दीपिका और अंशुल को खूब बधाई और शुभकामनाएं और स्नेह , इतनी हिम्मत और लगन आज देखना दुर्लभ है
ये तस्वीरें आपको दिखाएंगी कि सब कुछ सम्भव है यदि आप कुछ ठान लें तो, जैसे गायक हमेंशा जिंदा रहना चाहिए वैसे ही शब्द साधक भी अमर होने चाहिए
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"हर चीज में आग होना बताया गया था", इस पंक्ति के अलावा कई और अप्रतिम किस्म की पंक्तियां अनुप्रिया ने अपने पिता स्व चंद्रकांत देवताले को याद करते हुए पढ़ी और फिर कहा कि इन पंक्तियों को अपने भीतर महसूस करते हुए मैं अपना वायलिन वादन शुरू करती हूँ , यह वायलिन वादन जब हो रहा था - तो वे ना मात्र तन्मयता से बजा रही थी बल्कि यूँ लग रहा था कि अपने पिता की कविताओं को वे महीन धुन पर बजाते हुए महसूस कर रही थी, उन कविताओं के बुने जाने की प्रक्रियाओं की वे साक्षी रहीं हैं, इसलिए उनके चेहरे पर जो भाव थे - वे गहरे सुकून और संतुष्टि के थे कि एक बेटी अपने संगीत से पिता को याद ही नहीं कर रही, वरन उनके शब्द संसार को आत्मसात करके दिल से याद कर रही है और उपस्थित समुदाय को उस बहाव में ले जाकर कविताओं और संगीत के सम्मिश्रण का सुख सबको उपलब्ध करवा रही है
लगभग आधे घंटे अनुप्रिया ने वायलिन पर राग चारुकेशी बजाकर पूरे सभागृह को मंत्र मुग्ध कर दिया, पहली बार सुन रहा था अनुप्रिया को, देवताले जी के घर उज्जैन जाते थे तो वे बताते थे अपनी इस बेटी के बारे में, पर कभी मुलाकात नहीं हुई थी, आज अनुप्रिया को सुना भी और एक छोटे से समूह में अनौपचारिक बातें भी हुई
इस बहाने देवताले जी से हुई असंख्य मुलाकातें याद आई, उनका घर, स्टडी, कचोरी, लंबी बातें, तुकाराम के अभंग मराठी से हिंदी अनुवाद के दौरान हुई लंबी - लंबी बहसें जो वे मुझसे करते रहें कि "तेरी मराठी अच्छी है, बता यह सही है या शब्द बदलूं" और फिर पूरे ड्राफ्ट की कॉपी शेयर करना या कभी देर रात फोन करना कि "हेलो, मैं मुक्तिबोध बोल रहा हूँ", इस फोन पर वे कभी त्रिलोचन बन जाते, कभी निराला या कभी धर्मवीर भारती, इतने सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी हमारे चंद्रकांत देवताले ना मात्र उज्जैन - बल्कि पूरे मालवा की पहचान थे, उनके जाने से बहुत दिनों तक हम सब डिस्टर्ब थे और इधर लगभग उन्हें गाहे - बगाहे पढ़ते ही रहते थे, पर आज अनुप्रिया ने उनकी कविताएं पढ़कर उस स्वर्णिम अतीत में लौटा दिया - जहाँ हम लोग बगैर झिझक के उठकर कभी भी उनके घर उज्जैन चले जाते थे और देर तक गप्प करते और वे लौटते समय अपने घर से पौधे उपहार में दे दिया करते थे कई - कई प्रकार के
इस छोटी किंतु महत्वपूर्ण बातचीत में साथ थे तनवीर भाई, बहादुर, प्रकाश पुरोहित (संपादक - प्रभात किरण) सत्यनारायण, रेवा और जैन साहब एवं अवसर था वाणी प्रकाशन का इंदौर में आयोजित साहित्य उत्सव

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एक भ्रष्ट, नीच और नालायक ज्ञानेश को बचाने के लिए इतनी शक्तिशाली सरकार और इतनी बड़ी बहुमत वाली सरकार कितना नुकसान देश का कर रही है, यह देखकर आश्चर्य होता है, यह बेहद शर्मनाक ही नहीं - बल्कि आजाद भारत की सबसे घटिया प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है और यह भी दर्शाता है कि ब्यूरोक्रेसी, मीडिया और सरकार के साथ सर्वोच्च न्यायपालिका भी मिलकर कितने सुसंगठित तरीके से अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ है और संविधान के खिलाफ जाकर "गरिमामयी जीवन जीने वाले नागरिकों" को वोट देने से बेदखल करने के लिए क्या - क्या कर सकती है
प्रेम संबंध हो तो ऐसे हो कि एक सौ चालीस करोड़ लोगों को दरकिनार करके एक आदमी के लिए पूरी सत्ता बिछ जाए, मोदी शाह के लाख विरोध के बाद भी मै निर्णय लेने के लिए इनका प्रशंसक था, पर अब इनसे विश्वास उठ गया है, ये इतने कमजोर और नाकारा हैं कि एक अधिकारी, एक जज, मीडिया के चार दलाल इतनी बड़ी एवं लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को अपने इशारे पर नचा सकतें है और इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि इनके पास मोदी शाह की कमजोर नब्ज़ है
देश की स्थिति इस समय में इतनी गंभीर और खतरनाक है कि कहा नहीं जा सकता, जिद्दी, अड़ियल, घटिया और नीच किसे कहते है - यह समझने के लिए हमें इतिहास देखने की ज़रूरत नहीं अब
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कुछ सामाजिक नियम
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कुछ अनकहे सामाजिक नियम, जिनका हम सभी को पालन करना चाहिए
1. किसी व्यक्ति को लगातार दो बार से अधिक फोन न करें. यदि वह फोन नहीं उठा रहा है, तो संभव है कि वह किसी अधिक जरूरी काम में व्यस्त हो.
2. किसी से उधार लिया हुआ पैसा उसके माँगने से पहले ही लौटा दें, चाहे वह ₹1 हो या ₹100. यह आपकी ईमानदारी और चरित्र को दर्शाता है.
3. यदि कोई आपको भोजन पर आमंत्रित करता है और बिल चुका रहा है, तो मेन्यू में से बहुत महँगे व्यंजन न चुनें. संभव हो, तो उनसे पूछ लें कि वे आपके लिए क्या मँगवाना पसंद करेंगे.
4. ऐसे असहज सवाल न पूछें, जैसे— “अभी तक शादी नहीं हुई?”, “आपके बच्चे नहीं हैं?” या “आपने अपना घर क्यों नहीं खरीदा?” ईश्वर के लिए, यह उनका निजी मामला है, आपकी चिंता का विषय नहीं.
5. अपने पीछे आ रहे व्यक्ति के लिए दरवाजा खोलकर रखें. वह पुरुष हो या महिला, युवा हो या बुजुर्ग. किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने से आपका सम्मान कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता है.
6. यदि आप किसी के साथ मजाक करते हैं और उसे अच्छा नहीं लगता, तो तुरंत रुक जाएँ और दोबारा ऐसा न करें.
7. प्रशंसा सार्वजनिक रूप से करें और आलोचना निजी तौर पर.
8. किसी के वजन को लेकर टिप्पणी करने की कोई जरूरत नहीं है. इसके बजाय कहें— “आप बहुत अच्छे लग रहे हैं.” यदि वह स्वयं अपने वजन कम करने की बात करना चाहेगा, तो कर लेगा.
9. जब कोई आपको अपने मोबाइल पर कोई तस्वीर दिखाए, तो बिना अनुमति स्क्रीन को दाएँ-बाएँ स्वाइप न करें. आपको नहीं पता कि अगली तस्वीर क्या हो सकती है.
10. सफाई कर्मचारी के साथ भी उतने ही सम्मान से पेश आएँ, जितने सम्मान से आप किसी कंपनी के सीईओ के साथ पेश आते हैं. अपने से कम पद पर काम करने वाले व्यक्ति के साथ आपका दुर्व्यवहार किसी को प्रभावित नहीं करता, लेकिन आपका सम्मानजनक व्यवहार लोगों का ध्यान जरूर खींचता है.
11. जब तक कोई आपसे सलाह न माँगे, तब तक उसे अनचाही सलाह न दें.
12. जिन लोगों से किसी योजना या कार्यक्रम का संबंध नहीं है, उनके सामने उनकी अनुपस्थिति में उससे जुड़ी योजनाएँ न बनाएँ.
13. जब कोई मित्र या सहकर्मी आपको खाने की कोई चीज़ देता है, तो विनम्रतापूर्वक मना कर सकते हैं. लेकिन उसे चखने या उसकी खुशबू लेने के बाद मना करना अपमानजनक हो सकता है.
14. सबसे महत्वपूर्ण नियम— अपने काम से काम रखें, जब तक कि कोई मामला सीधे आपसे संबंधित न हो.
याद रखिए: अच्छे संस्कार केवल हमारी बातों में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देते हैं. सम्मान दीजिए, मर्यादा बनाए रखिए और दूसरों की निजता का ख्याल रखिए.
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संविधान और मौलिक अधिकार बहुत महंगे शौक है और भारत जैसे देश में ये सिर्फ अमीर, एलीट और वर्ग विशेष के लिए ही है, यहां तक कि सभी व्यवसायों के लिए भी यह "अफोर्ड" कर पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है - इसलिए अब समझ आ रहा है कि जो लोग इन दो बातों की बातें बात - बात में करते है या तो वे स्वयं मूर्ख है या जनता को मूर्ख बनाकर अपनी रोटी सेंक रहे है और दुकान चला रहे हैं
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इलाहाबाद के कोर्ट में आज जो भी कुछ हुआ वह असाधारण है इसके पक्ष - विपक्ष में नहीं जाऊंगा बस इतना कहूंगा कि जज भी इसी समाज से आते है और अदालत में वे नौकरी कर रहें है और इसके बदले उन्हें वेतन के अलावा ढेरों सुविधाएं, भत्ते, पेंशन और बाकी सब मिलता है और इसके बदले वे काम कर रहे तो कोई एहसान नहीं कर रहे है
मीलार्ड, माननीय, योर ऑनर, ऑनरेबल कोर्ट आदि शब्दों से परहेज करने को सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है, सम्मान अपनी जगह और बाकी सब अपनी जगह, इन्हें जो अतिरिक्त चाहिए - वह देने की जरूरत नहीं है, दूसरा इनका तानाशाही भरा व्यवहार, बदतमीज़ी और किसी भी आरोपी, वकील या अधिकारी को जिस हिकारत के साथ ये ट्रीट करते है वह बेहद आपत्तिजनक होता है, दुनिया में लोग नए बदलाव कर रहे है, कई ज्यूरिस्ट इस पूरे सामंती व्यवहार को बदलने की बात कर रहे है और हम अभी भी वही है
जनता जाग चुकी है और अंग्रेजों की संस्कृति और परम्परा में स्वयं को श्रेष्ठ मानने की सामंतवादी प्रवृत्ति से अब निजात पाने का समय आ गया है, जजेस को स्वयं अपने को न्याय देवता, भगवान या उद्धारक मानने से बाज आना चाहिए - अन्ततः वे है तो "पब्लिक सर्वेंट"
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दुआ है कि जा तेरे स्वप्न पूरे हो
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"आपने काम छोड़ दिया तो अब गुजर बसर आराम से होता होगा, ऐश कर रहे हो आप, जीवन भर एनजीओ में रहें तो खूब जमा कर लिया होगा ना, और अब बैठकर खा रहे हो" - सवाल सीधे मेरे पर था, इतना अश्लील और खुला सवाल था कि रोक नहीं पाया अपने आपको जवाब देने से
"अरे भाई, मैंने एनजीओ में नौकरी की थी, तीन अंकों से पांच अंकों की न्यूनतम तनख्वाह पर, एनजीओ मेरे नहीं थे, ना मैं मालिक था उन एनजीओ का, हां वहां काम या नौकरी मेहनत से की और एनजीओ को धन, यश और प्रतिष्ठा बहुत दिलवाई, कई एनजीओ खड़े किए, कई युवा लड़कियों और लड़कों को जो फर्जी एमएसडब्ल्यू करके आए थे - उन्हें पक्के वाले सोशल वर्कर टाईप बनाया, रूपया, मकान, दुकान और संपत्ति एनजीओ के मालिकों के पास है, हवाई यात्राएं वे लोग करते है, ऐश वे कर रहें है, उनकी औलादें अंग्रेजी स्कूलों में पढ़कर बड़े शहरों में या विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी और अब करोड़ो के स्टार्ट अप में है, रईसों से शादियां कर महंगे समधी उन्होंने ढूँढे, और झब्बे और खादी का चोगा ओढ़कर बीस - तीस लाख की गाड़ी में वे घूम रहे है, अपन तो जैसे थे - वैसे ही है फटेहाल और देशी या खांटी आदमी, मुंहफट और बदतमीज़"
"एनजीओ के नाम पर विश्वविद्यालय, बड़े - बड़े संस्थान, शोध और अकादमिक तरह के काम और प्रकाशन, ढेरों किताबें उनके नाम है - अपने नाम कही नहीं है और तमाम बैंकों में खाते, ब्यूरोक्रेट्स से फाइव स्टार पार्टी वाले संबंध उन मालिकों के है - जो रोज हवाई जहाज से लखनऊ, भोपाल, पटना, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद या नाशिक करते है - इनमें वो युवा भी शामिल है जिन्होंने एनजीओ को रूपया कमाने का धंधा बना लिया - कम उम्र में गणित समझकर वे खुलकर नीचता पर उतरे और गरीब, वंचित, आदिवासियों और दलितों के नाम पर खूब अनुदान लाए देश - विदेश से और आज करोड़पति है और डेढ़ से पांच करोड़ के बंगलों में रहते है पॉश कॉलोनियों में और ज्ञान की चलती - फिरती दुकानें है, ये लोग वो हलकट किस्म के गिरगिट थे - जिन्होंने रोज गमछा बदला - लाल, सफेद, काले, पीले, नीले, हरे से भगवा तक और हर बार उन्हीं लोगों के आगे बिछे - जो सत्ता के गलियारों की थूक को चटवाने में माहिर थे"
"अपन तो फांकाकशी में मस्त है और जीवन का संघर्ष बदस्तूर जारी है, एक रोटी और प्याज के साथ नमक की कीमत समझते है, बस यही दुआ करते है कि इनका अनुदान, दस - दस करोड़ की जमीनें और बीस - बीस करोड़ के आलीशान दफ्तर आबाद रहें - ताकि किसी गरीब, वंचित या दलित या आदिवासी को एकाध बार ही सही साल में - ढंग का खाना मिल जाए ट्रेनिंग, गोष्ठी या सेमिनार के बहाने"
"और मेरी बातों पर विश्वास ना हो तो आना कभी मेरे घर - तपती धूप में लोहे की चद्दर वाले कमरे में मटके का ठंडा पानी जरूर पिलाऊंगा और ताजी बनी छाछ भी साथ में"
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देवास कलेक्टर ऋतुराज सिंह और पुलिस में नवाचार कर जनपुलिस को सशक्त करने वाले पुनीत गेहलोद का स्थानांतर हो गया, देवास के नजदीक ग्राम चंदाना एवं बिन्जाना में शराब से हुई लगभग बाईस मौतें इसका मुख्य कारण बनी
मप्र में सागर, सिवनी और देवास के कलेक्टर, एसपी बदले गए - यह एक तरह से मोहन यादव सरकार की आत्मसंस्तुति (Confession) है कि शराब माफियाओं पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं, प्रशासन में भ्रष्टाचार और अनैतिकता इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं कि राज्य शासन भी सम्हाल नहीं पा रहा है, इसके पूर्व देवास में जिला आबकारी अधिकारी जो एक महिला थी, को भी निलंबित किया गया था - जो हर ठेके से प्रतिमाह तीन लाख लेती थी और इस आरोप के चलते उन्हें निलंबित किया गया था, हम इतना तो समझते है कि बगैर कलेक्टर या एसपी की जानकारी के एक द्वितीय श्रेणी के अधिकारी द्वारा यह रकम वसूल किया जाना क्या दर्शाता है, इसका अर्थ यह है कि जनोन्मुखी बनकर दोनों प्रशासनिक अधिकारी जनता और शासन को चूना लगा रहें थे - निन्दनीय और शर्मनाक है, देवास के कुछ मीडिया दलाल इसमें संलिप्त ही होंगे - तभी यह ड्रग्स से लेकर शराब का कारोबार गली मोहल्लों में फल फूल रहा था
बहरहाल, जीतू पटवारी, उमंग सिंघार, मनोज राजानी, प्रयास गौतम, मनीष चौधरी और बाकी लोगों के दबाव की वजह से मोहन यादव सरकार को यह निर्णय आखिर लेना पड़ा और अपनी हार माननी पड़ी
देवास में वैसे भी महिला कलेक्टर्स का दबदबा और इतिहास रहा है, निर्मला यादव (बुच) - जो पहली कलेक्टर थी, से लेकर अलका श्रीवास्तव, माला सिन्हा, अनिता दास, गौरी सिंह, आदि जैसी ताकतवर महिला कलेक्टर्स ने यहां विकास के काम भी किए और यहां के नेताओं से लेकर टटपुंजियां नेताओं को भी ठिकाने लगाया है
दोनों नए और युवा प्रशासनिक अधिकारियों का स्वागत है, और चेतावनी सिर्फ इतनी कि गुलामी, सामन्तवाद, जाति में उलझा यह शहर और मीडिया के कुछ दलाल जो कैमरा उठाकर घूमते है - उनसे दूर रहें और समय आने पर इन्हें चक्की पीसने के पर्याप्त मौके भी दें, सांसद और विधायक से लेकर पार्षद और महापौर से पर्याप्त दूरी बनाकर चले और संविधान प्रदत्त अधिकारों का जनहित में उपयोग करें
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प्रशासनिक अधिकारियों का एक समूह बना हुआ था वॉट्स ऐप पर और उसमें युवा कलेक्टर एडमिन था, रोज वह विभागीय अधिकारियों की खोज खबर इसी समूह पर लेता था, यह जिले के विभाग प्रमुखों का समूह था लिहाज़ा बगैर होश में रहें इस पर कोई कुछ नहीं लिखता था और बर्थडे, शादी की सालगिरह या मरे खपें लोगों का जिक्र नहीं होता था, मतलब फूल पत्ती या ओशो के सदवाक्य भेजना भी पाप था, कलेक्टर टीएल मीटिंग में शर्ट उतारकर दो घंटे खड़ा कर देता था यदि ऐसा हुआ तो
हमारे एडीएम साहब की हिंदी टाइपिंग तो खराब थी ही, पर हिंदी का वाक्य विन्यास और व्याकरण भी शून्य था इसलिए वो एक कवि किस्म के पटवारी से अपना रोजनामचा और आमद की खबरें साहित्यिक भाषा में लिखवाकर पोस्ट कर देते थे, अंग्रेजी के नाम पर राष्ट्रप्रेमी बन जाते या गूगल की शरण में जाते
एक दिन कलेक्टर ने कहा कि - "आप तो गजब की रिपोर्टिंग करते है, एक काम करिए - कल इधर से दो पीएस, तीन अंडर सेक्रेटरी और कैबिनेट मंत्री गुजरेंगे, भोजन आदि सर्किट हाउस पर ही है, आप सुबह से ही वहां रहिएगा और उसी समय आप रिपोर्ट और प्रेस विज्ञप्ति बनाकर मुझे दिखा दीजिए और मैं पीआरओ को बोलकर वही से जारी कर दूंगा, यह ध्यान रहें कि कोई बात छूटना नहीं चाहिए और कोई गलती ना हो"
"जी साहब" बोलते हुए एडीएम साहब को पसीना आ गया, बस शाम तक तनाव में रहें, फिर कलेक्टर से गुजारिश की कि एक पटवारी को चाय - पानी की व्यवस्था के लिए रख लें कल, पर कलेक्टर ने कहा कि नहीं संभव नहीं, यह सब सीक्रेट है और उच्च स्तर की बातचीत है, पटवारी लीक कर देगा, आपको ही सम्हालना है
उसी शाम कलेक्टर साहब को एडीएम साहब का फोन आया कि उनके मामा का देहांत हो गया है कानपुर देहात में और वे सपत्नीक निकल चुके है, पेट खराब होने से दस्त अलग से लग रहे थे, "लिपटन के नींबू वाले कहवा के दो पैकेट रख लिए है"
हरिओम
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भरोसा, विश्वास, आस्था, संग - साथ और उम्मीद बहुत बड़ी चीज़ है, इसे ना मुफ्त में बांटिए और ना ही आसानी से किसी के साथ व्यवहार में रखिए, लोग असल में आपका फायदा उठाकर और आपके कांधों पर पाँव रखकर ऊपर चढ़ जाते है और आप रौंदी हुई भीड़ में निर्जीव लाश की तरह से पड़े - पड़े सड़ जाते है और जब तक आपको यह एहसास होता है - तब तक सब कुछ खत्म हो जाता है
जानिये सबको पर मानने में बहुत समय लीजिये
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विकलांग (आप मानसिक विकलांग भी कह सकते है ) से डिप्टी कलेक्टर के पद पर भर्ती हुए थे, जीवन भर हर फ़ाइल पर दो रूपये से लेकर दो सौ रूपये लेते हुए बुढ़ापे में जाकर आय ए एस अवार्ड हुआ था - वो भी कोटे वाला तो काम की इच्छा मर गई थी, ना कुछ आता था और ना कोई समझ थी, एक पत्र ड्राफ्ट करने में तीन दिन लगा देते थे और यदि अंग्रेजी में केंद्र सरकार का कोई मेल आ जाए या हाई कोर्ट से कोई आदेश जिसकी तामील उन्होंने की हो तो फिर पसीना आ जाता था फटी बनियान के नीचे से
आजकल एडीएम के चार्ज पर थे, जिले में बारह ब्लॉक्स थे और कलेक्टर युवा था जो दौरे पर कम जाता था, एडीएम साहब को भेज देता और मजा यह कि एडीएम साहब ब्लॉक में जाकर सर्किट हाउस में पसर जाते और हर बैठक शुरू होने के पहले एसडीएम और तहसीलदारों को बुलाकर कहते - "भैया मीटिंग देख लेना, मैं नहीं कर सकूंगा, पेट खराब है और दस्त लग रहे है, जी भी ठीक नहीं, हाँ फोटो खींच लेना, रिपोर्ट बना देना" और अपने कमरे में खानसामा से बोलकर काली चाय और नींबू का ढेर लगा देते,पता नहीं उनके उस काले जादूई बैग में कौन - कौन से काढ़े, चूर्ण और दवाइयां रहती - जिसको लेने से पूरा कमरा इतना बदबू मारता कि पूछो मत, दो - तीन पटवारी साहब को गाँव की गुड़मार, गिलोय से लेकर सदाफ़ुली के पौधों की जड़ और पत्तियां ही पीसकर पिलाते रहते और बंगले के लिए अलग से दे देते थे, शाम तक उनकी यही ड्यूटी रहती थी
एडीएम साहब ने कभी कुछ काम नहीं किया, पर अभी भी टिके है और युवा कलेक्टर की नजर में सबसे काबिल अफसर है, युवा कलेक्टर सिर्फ बड़े शहर, विदेश और राजधानी जाने में उत्सुक था - ये एडीएम हर फ़ाइल, आदेश, स्वीकृति और इ-मेल पर ऐसे बैठता है कि शेषनाग शर्मा जाए, मजाल कि मेल या आदेश पढ़ लें और समय पर कोई और जवाब दे दें
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इतनी विशाल पृथ्वी, इतनी बड़ी प्रकृति के सामने हम कितने बौने है और कितने ओछे है कि सत्तर - अस्सी बरस के जीवन में अहंकार, प्रतिष्ठा, भेदभाव, जलन, कुंठा, ईर्ष्या, बैर, पद , पैसा, प्रतिष्ठा और वैमनस्य से लेकर पता नहीं क्या - क्या पाल लेते है और इन सबकी वजहों से अपना तो जीवन बर्बाद करते ही है, साथ में अपने साथ रहने वाले दूसरों का भी खत्म कर देते है
घमंड कौरवों और पांडवों को भी था, जिस जमीन के टुकड़े को लेकर लड़े और पृथ्वी को वीरों से खाली कर दिया - वह जमीन आज वैसी की वैसी है, पर पांडव - कौरव दोनों खत्म हो गए, लंका और सोना यही रह गया - रावण खत्म हो गया, सिकंदर की जीती हुई दुनिया यही है और वह मिट गया, नेपोलियन हो या चंगेज ख़ाँ, हलाकू हो या ज़ार, गोर्बाचोव हो या मार्टिन लूथर किंग, कैनेडी हो या मंडेला - सारे युद्ध और लड़ाइयाँ यही रह गई और वे खत्म हो गए - आज कितने लोग इनके नाम भी जानते है - यह मूल सवाल है
इसलिए अपनी अकड़ और अपने कम्फर्ट ज़ोन - जिसे मैं अपने बनाए जाले कहता हूँ, से बाहर निकलिए, जीवन बहुत बड़ा है और इसमें सब होता रहता है - सही या गलत तय करने वाले आप होते ही कौन है, सहज हो जाइए और अपनी जिंदगी ही जी लीजिए - यही बहुत, दूसरों पर फतवे जारी करना बंद कीजिए और अपने आप पर फोकस रखिए
आपकी औकात है ही क्या इस कायनात में


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आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

Ekant ki Akulahat Feb 2020

1 एक   दीवार   है   जो   गाढ़ी   नीली   रँगी   है   जब   कमरा   बना   था   तो   इस   पिछली   दीवार   को   गाढ़ा   नीला   रंग   लगाया   था ,  ठीक   पिछले   पड़ोसी   की   दीवार   से   लगकर   इसे   कांक्रीट   की   छत   पर   उठाया   था   जो   अब   इस   कमरे   की   जमीन   बन   गई   है तीन   हल्के   नीले   रंगों   के   बीच   गाढ़े   रँगीले   नीले   रंग   पर   एक   छोटा   सा   बल्ब   भी   टांग   रखा   है   वो   भी   गहरा   नीला   है   सिर्फ   उजाले   से   ही   नही   बल्कि   अपने   होने   से   भी   -   बहुत   पहले   ,  शायद   बरसो   कोई   एक   नीला   शर्ट  ...