जितना दिखावा, सहानुभूति, गरीब, दलित, वंचित, महिला, वृद्ध और अब नया शब्द LGBTQ+ के लिए आप लिखेंगे - पढ़ेंगे या ढोंग करके अपने ज्ञान और दर्शन का प्रचार - प्रसार करेंगे, उतना ही माल डॉलर और यूरो के मार्फत अपनी निज तिजोरी में आने की प्रबल संभावना है, बस अपने - आपको बेचने और मार्केटिंग करने का खबसूरत सा कौशल और निहायत ही 'प्यारी सी दक्षता' आनी चाहिए
मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूँ - जो दो - चार बरसों तक गरीब बच्चों को घर में रखकर पढ़ाते - लिखाते रहने का बढ़िया प्रदर्शन करते रहें और बमुश्किल तीन - चार साल बाद दर्जनों फेलोशिप, जमीन, भवन और रिसॉर्ट तक उनके खाते में आज है, और वे पूरे दम से हवाई सुख लेते हुए देश के हर कार्यक्रम से लेकर बदलाव के फर्जी झंडाबरदारों के साथ घूमते फिरते है - वे फिर गांधीवादी चोगा पहने लोग हो या फेब इंडिया के झब्बे पहने कामरेड हो या अंदर जॉकी और ऊपर से फटे कपड़े की नौटंकी करते टायर की चप्पल पहने प्रचंड आंदोलनजीवी हो
मज़ेदार यह है कि समाज में यह सब स्वीकृत है और जानते - बुझते हुए भी कोई कुछ नहीं बोलता और इन नए उगे हुए फफूंदों और मशरूमों को झेलते है और ये छर्रे देशभर में सुकून से किरांति की अलख जगाते घूमते रहते है, धीरे - धीरे जाले इतने साफ हो गए है कि अब पलटकर देखने, महसूसने और कहने - करने की इच्छा भी खत्म हो गई है, क्योंकि दिखावा और अपयशी संस्कृति इतनी हावी है कि बयाँ करना भी ओछापन लगता है
दिक्कत इनके बदलने से या धन और यश - कीर्ति से नहीं, दिक्कत इनकी संपत्ति या जमीन जायदाद से नहीं, यह सब तो ठीक है, रूपया कमाना कोई गलत नहीं, वार्षिक टर्न ओवर गिनना गलत नहीं पर खुद पाक साफ रहकर दूसरों को लेबल देना या टैग कर देना कितना सही है, जजमेंटल हो जाना क्या मेंटल हो जाना नहीं बगैर जाने समझे कि किसी भी बात के पीछे की कहानी क्या है, बहरहाल, ऐसे लोगों के लिए दुआयें ही करना चाहिए ताकि मोहपाश तगड़े होते रहें इनके और ये इतने धंस जाए इनमें कि निकल ही नहीं पाएं मोहमाया से
बस यह है कि सच बोलो मत, गलत को गलत या एक ट्रांसजेंडर को ट्रांसजेंडर या चोर को चोर, काले को काला कहना गलत है - क्योंकि यह बोलकर आप Inclusiveness का अपमान कर रहे हैं, भाड़ में जाए ऐसी क्रांति और बदलाव की दिशाएं - क्या होगा ज्यादा से ज्यादा, जिसने दांत दिए है - वो खाने को भी देगा पर कम से कम सच बोलने का माद्दा तो बना ही रहेगा
[ अभी बहुत पुराने मित्र से लंबी बात करते हुए अपने साथ के लोग याद आए जो 1985 से जुड़े थे, सहकर्मी थे, बदलाव के संगी - साथी, पर अब वे कहां है, क्या है एवं कैसे है - कहने में भी शर्म आती है और अपुन वही है - उसी जमीं पर हकीकतों से दो - चार होते और लड़ते - भिड़ते, बदनाम होते, गालियां खाते और संघर्ष करते, क्योंकि अपने को "ही ही ही और खी खी खी" नहीं आता, ना ही अमूल मक्खन खरीदने की औकात है ]
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मशहूर है मेरी बदनामी इस जमाने में,
फिक्र तो वो करें जिनके गुनाह पर्दे में हैं
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अगर मर जाये, तो छूट जायें ग़म से
मगर ये हो नहीं सकता है हम से,
ज़माने को, फ़लक को साथ ले लो
ये जी भरता नहीं थोड़े सितम से
• दाग़ देहलवी
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