Skip to main content

Khari Khari, Man Ko Chiththi and Bangladesh - Rebel Story - Posts of 6 to 7 August 2024

तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे
हम जैसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे
◆ इब्राहीम अश्क
***

"सिर्फ़ नजरिये की ही बात है और फिर यह भी गुज़र ही जायेगा"
हमारी मराठी संस्कृति में घर के सामने पानी छींटकर, गोबर से लीपकर हम रोज़ रांगोली के बहाने अपने मन की ना जाने कैसी कैसी कल्पनायें रचते है और तल्लीनता से विभिन्न आकार - प्रकार बनाते है और अगली सुबह उसे पोछकर फिर रचना करते है, नई रांगोली बनाते है कि नई सुबह है, नई उम्मीद और नई उमंग है सो कल की मेहनत का जो भी हो, आज फिर मेहनत करके नया सृजन करना है, नया बनाना है ताकि आज ताज़गी रहे और मन प्रसन्नचित्त रहें, बरसों - बरस यह अभ्यास हम करते है और फिर एक दिन रांगोली के रंग खत्म हो जाते है, फ़ीके पड़ जाते है और हवा सबको बिखेर देती है , बनाने वाला धूल-धूसरित हो जाता है कही
पर फिर थामता है कोई यह परम्परा, उम्मीदों और उमंगों का चक्र ज़ोर पकड़ता है, नये रंग और नये संयोगों से आकृतियाँ जन्म लेती है और जीवन फिर ढर्रे पर लौट आता है एक बार - बस नज़रिए की ही बात है, बाकी तो सब ठीक ही है
***
लेनिन की मूर्ति ढहाने से शुरू हुआ जनांदोलन तालिबान में बुद्ध, फिर सद्दाम हुसैन की, रूस, यूक्रेन में सैंकड़ो मूर्तियाँ, भारत में बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस, पाक में जिया, भुट्टो या कि इजराइल से लेकर बांग्लादेश में अब शेख मुजीब की मूर्ति ढहाने का खेल हम लोगों को देखना पड़ रहा है
यह शायद 1965 के बाद 1980 तक जन्मी पीढ़ी का दुर्भाग्य ही है जिन्होंने बदलाव, क्रांति, मूर्ति पूजा और फिर रक्त क्रांति, मूर्ति भंजन और आस्थाओं को बनते - बिगड़ते और बुरी तरह से ध्वस्त होते देखा है, इसके अलावा समाज सुधारकों पर कालिख पोतने का घृणास्पद खेल तो रोज़ हम देख ही रहें है भारत हो या कोई देश
मन्दिर, मस्ज़िद, गिरजाओं और महापुरुषों की मूर्तियों पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण और नष्ट करने की कहानियाँ तो इतिहास में हम सबने पढ़ी है पर अपने सामने इस तरह का इतिहास बनते देखना दुष्कर और घातक है और इस सबसे मन बहुत विचलित है और व्यवस्थाओं पर से विश्वास उठते जा रहा है अब - कोई उम्मीद नज़र नही आती
राजनीति इस समय अपने सबसे वीभत्स स्वरूप में है, जो लोग मर खप गए उनकी मूर्तियां होना ही नही थी तो आज जो हालात है वो कम से कम नही होते, दूसरा हर जगह पर ट्रम्प से लेकर भारत तक और मोदी, इमरान, पुतिन, जेलेन्स्की, थैचर, ज़रदारी, मुशर्रफ़, नवाज़ शरीफ़, इंदिरा गांधी, शेख हसीना जैसे लोगों ने तानाशाही का जो खेल खेलकर अवाम को रोज़ी-रोटी देने के बजाय तंगहाल कर दिया - वह बेहद शर्मनाक है
एक ही पृथ्वी है और हम सबकी औकात साठ सत्तर बरस की उम्र के साथ बीत्ते भर भी नही है, सबको काल के विशाल गाल में समा जाना है पर दुनिया में राज करने और सरदारों की महफिलों में सदारत करने का मौका कोई कमबख्त छोड़ना नही चाह रहा
दुनिया बारूद सुरँग से लेकर परमाणु बम के मुहाने पर है और आततायी युद्ध एवं षडयंत्र करके जीवन को मुश्किल कर रहें हैं - कमाल ये है कि लोग इन चंद लोगों को ठिकाने लगाने से भी डर रहें है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है........
***
◆ कमज़ोर नेतृत्व और आरक्षण ले डूबा बंग्लादेश को
◆ 300 से ज़्यादा मौतें हुई है
◆ शेख हसीना को इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ना पड़ा
◆ एक देश जो छोटा सा है, सिविल वार नही सह पाया
◆ पाक, नेपाल, श्रीलंका और अब बंग्लादेश
क्या हम सबक सीखेंगें क्योंकि हम एक स्तर पर इनके निवासियों से ज़्यादा ज़ाहिल और मूर्ख है
◆ क्या यह आने वाले भारत की तस्वीर है ? या हम पदचाप पहचान नही पा रहे हैं

बांग्लादेश में युवाओं की बेरोजगारी की समस्या, रोजी-रोटी के मुद्दों को, नौकरी के मुद्दों को मीडिया चीन, पाकिस्तान और अमेरिका का हाथ बताकर गुमराह कर रहा है, आरक्षण पर बात हो नही रही - जो असली जड़ है इस गृहयुद्ध की
याद आ रहें है राहत साहब
"लगेगी आग तो ...
इस बस्ती में सिर्फ़ हमारा घर थोड़े ही है"
***
कांवड़ यात्राओं का जो भी धार्मिक महत्व हो, हल्ला गुल्ला या हुड़दंग हो पर जिस तरह से रोज़ जो घटनाएँ हो रही वे दुखद है और सबसे ज्यादा त्रासद है कांवड़ यात्रा के हुड़दंग में हमारे युवाओं का असमय मरना, ये युवा ग्रामीण है या कस्बों से है जो अपने परिवारों की उम्मीद है, खेती और छोटी मोटी दुकानों को चलाने वाले है, ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की धुरी इन पर ही टिकी है ऐसे में डीजे के करंट से या सड़क पर हो रही दुर्घटनाओं से यदि ये मर रहें है तो यह समाज की ही नही देश की बड़ी हानि है, इनके लिये कोई सरकार या बीमा कम्पनी क्षति पूर्ति के रूप में लाखों रुपया मुआवजे के रूप में देगी
इन्हें समझने और समझाने का काम राजनैतिक दलों, धार्मिक संतों और गाँव के बड़े बुजुर्गों को करना चाहिये साथ ही इन युवाओं को भी समझना चाहिये कि सबसे पहले परिवार है, धर्म, देश और समाज बाद में आता है और ये भीड़ कोई युद्ध लड़ने नही जा रही है
आज जिस तरह से 9 युवाओं की मृत्यु हुई और दो गम्भीर घायल है वह बेहद दिल दुखाने वाली खबर है - कोई भी मरें नुकसान हम सबका होता है और उम्मीद हम सब खोते है
***

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास.    बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है) मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण.............. तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले......... चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास  यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास.    यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी व...