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Naresh Soni, RIE & SBI, Khari Khari, Kuchh Rang Pyar Ke - Posts of 8 August 2022

|| नरेश सोनी - यह देश तुम्हें तीन दिन में भूल गया ||



1998 की बात है जब एकलव्य से इस्तीफ़ा देकर देवास के स्थानीय अँग्रेजी माध्यम के एक कान्वेंट यानी स्कूल में अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए नौकरी ज्वाइन की थी, जाते ही कक्षा अध्यापक बना दिया, किशोर होते हायर सेकेंडरी स्कूल के बच्चों के बीच काम करना चुनौतीपूर्ण था, अधिकांश अधिकारियों के या शहर के कारोबारियों के बच्चे - नटखट , शैतान और उद्दंड भी
खूब मजा आता, सीबीएसई ने अँग्रेजी का नया पाठ्यक्रम बनाया था, सो खूब प्रयोग, नवाचार करता , बच्चों से अँग्रेजी में लिफ़्लेट्स, पोस्टर, ब्रॉशर बनवाता, नाटक खेलते क्लास में और नया सृजनशील लिखवाने की कोशिश करता, पारंपरिक ग्रामर और पढ़ने - पढ़ाने के तरीकों पर मुझे यकीन नही था, टेपरिकॉर्डर भी ले जाता और बच्चों को स्किट सुनाता
1985 - 87 के बाद प्रत्यक्ष रूप से किशोरों को पढ़ाने का यह मौका गजब का था - 1982 से 1986 तक के कालावधि में पैदा हुए बच्चें कक्षा में थे और खूब जोश उत्साह से भरे और आंखों में सपने लिए, खुले माहौल में उनसे बात करना, सहज उठने वाले प्रश्नों का जवाब देना और शंकाओं का समाधान करना मुझे बहुत भाँता था
आज सभी देश - विदेश में बड़े बड़े पदों पर है, डॉक्टर, इंजीनियर, संगीतज्ञ, पत्रकार, लेखक, प्रशासनिक अधिकारी, प्राध्यापक और व्यवसायी भी, ये सब बढ़िया काम कर जीवन में सुख से जी रहें है , इनमे से एक था नरेश सोनी यानी सन्नी - शहर के सर्राफा व्यापारी का लड़का, तीन भाई - तीनों मेरे विद्यार्थी रहे और तीनों चुलबुले, पढ़ने में होशियार और बहुत सही फोकस के साथ कि शहर में आगे जाकर धंधा करना है - नौकरी नहीं करनी है
समय बदलता गया, मैंने कान्वेंट छोड़ा और आर्मी स्कूल में चला गया उसके बाद पता नहीं कहां-कहां से भटकते - भटकते 2014 में देवास पुनः लौटा और यह तय किया कि अब नौकरी नहीं करूंगा ; पढ़ाये हुए छात्र - छात्राएं बड़े हो गए थे, यहां - वहां काम करने लगे थे, लगभग सबकी शादियाँ हो गई थी, उनके भी बच्चें भी हो गए थे
नरेश सोनी अपना परंपरागत व्यवसाय जौहरी एंपोरियम देखने लगा था, मेरे घर में और आसपास में होने वाले शादी ब्याह की खरीददारी हम उसी के यहां से करते थे - चाहे सोने की ज्वेलरी हो या चांदी के बर्तन, बड़े अच्छे संबंध थे, नरेश की शादी हुई उसमें मैं गया था, दोनों छोटे भाइयों की शादी हुई - उसमें भी में गया, उसके चाचा से भी अच्छी दोस्ती हो गई थी ; नरेश के पिताजी की किसी रंजिश के चलते देवास शहर में एमजी रोड पर दिनदहाड़े हत्या की गई थी परंतु परिवार अब उबरकर संभल गया था और नरेश ने बड़ा बेटा होने के कारण सब संभाल लिया था
2016 का साल आया - नोट बंदी के कारण जैसे सब लोगों के धंधे पानी पर असर पड़ा, सराफा व्यापार पर भी बहुत बुरा असर पड़ा - दिन भर ग्राहकों से भरी रहने वाली दुकानें खाली होने लगी और सभी व्यापारी दाने-दाने को मोहताज हो गए क्योंकि फंड्स की बाजार में लिक्विडिटी नहीं थी, हालत खराब थी सबकी परिवार, दुकान, घर, बच्चे, उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य, गाड़ी - घोड़े सब संभालने और मैनेज करने के लिए रुपयों की आवश्यकता होती है
नरेश पर भी इसका बुरा असर पड़ा - उसने कर्जा लेना शुरू किया और जैसे - तैसे अपने परिवार का गुजर-बसर करने लगा, धीरे धीरे पैतृक संपत्ति बिकने लगी, वह कर्जदार होता गया, स्थिति ऐसी हो गई कि शहर में वह बदनाम हो गया - परंतु हमेशा मुस्कुराता था और कहता था "यार सर, चलो पार्टी करते हैं, घर आ जाओ आपको बहू बुला रही है, मेरी दोनों बेटियां आपको याद करती है, खाना खाने आ जाओ, घर पर तसल्ली से बैठ कर बात करेंगे ", पर कभी उसने मुझसे एक रुपया नहीं मांगा था ; एक दो बार उसे टाइम्स ऑफ इंडिया, मुंबई में कुछ काम था इसके लिए उसने संपर्क मांगा तो मैंने Ganesh SH Puranik भाऊ का संदर्भ उसे दिया और कहा कि ' जाकर मिल लो गणेश भाऊ हंड्रेड परसेंट काम करवा देंगे ' और ऐसा हुआ भी, जब मुम्बई से लौटकर आया तो वह बहुत ख़ुश था और बोला कि "आपकी वजह से ही मेरा बहुत बड़ा काम हो पाया और वह सबूत मिला जिसकी हाईकोर्ट में मुझे जरूरत थी"
इधर पिछले दो-तीन माह से वह कुछ ज्यादा ही परेशान हो गया था और मुझे भी फोन करने लगा था कि " कुछ रुपया उधार दे दो पचास हजार, एक लाख, दो लाख, कुछ नहीं तो बीस हज़ार ही दे दो - मैं आपको 8 दिन में लौटा दूंगा ", परंतु मुझे शहर की नब्ज मालूम थी और मैं खुद भी इन दिनों आर्थिक तंगी में चल रहा हूं, तीन वर्षों से नौकरी नही है, तो उसे कोई मदद नहीं कर पाया, अलबत्ता वह घर पर आता था, नियमित फोन करता था - तबीयत का हाल-चाल लेता था, बाजार में मिलने पर झुक कर पाँव पड़ता और मुस्कुराते हुए कहता " घर कब आओगे मेरी बेटियों को गाइड कर दो, मैं उन्हें कलेक्टर बनाना चाहता हूं ", इंदौर के गोयनका स्कूल में भर्ती कराने का सुझाव मेरा ही था - उसने कहा था कि "कुछ भी हो जाए कितना भी कर्जा हो जाए और मैं बच्चों की पढ़ाई बंद नहीं करवा लूंगा और अच्छे स्कूल में पढ़ा लूंगा"
मैं अभी भोपाल में था तो उसका फोन फिर आया था, पर मैं जवाब नहीं दे पाया और बाद में फोन करके मैंने उससे साफ कहा कि मेरे पास रुपया नहीं है मैं उधार नहीं दे सकता हूँ, इधर चार दिन पहले एक खबर मैंने वायरल होते हुए देखी - जिसमें लिखा था कि देवास के सम्भ्रान्त परिवार के एक युवा ने रेल के नीचे आकर आत्महत्या कर ली, मित्र सुनील गुप्ता ने जब लिंक भेजी और खोल कर देखा तो धक्क से रह गया - अरे यह तो सनी था - नरेश सोनी था, इतना बड़ा निर्णय इस बंदे ने कैसे ले लिया जबकि अभी इसकी छोटी बेटियां हैं, पत्नी अहमदाबाद गई हुई थी भाई और छोटी बहुएँ अपने काम में लगे थे और शाम को शायद नशा करके रेलवे पटरी की तरफ गया और आत्महत्या कर ली
मुझे नहीं पता कि यह आत्महत्या बाजार, नोटबंदी, जीएसटी, लॉक डाउन, सरकार की नीतियां और मंदी के चलते, लॉकडाउन में हुए बड़े नुकसान, कर्ज से हुई या सबने मिलकर नरेश सोने की हत्या कर दी, मैं सच में नहीं जानता कि यह हत्या है या आत्महत्या - परंतु इतना जानता हूं कि नरेश सोनी जैसा कद्दावर लड़का, जांबाज़ और हिम्मती लड़का, हर परिस्थिति में लड़ने - भिड़ने वाला लड़का, मदद करने वाला लड़का और बहुत सभ्यता के साथ बात करने वाला लड़का इस संसार में नहीं है
मेरे लिए यह सबसे बड़ा दुख है कि अपने सामने बड़े हुए मेरे विद्यार्थी को अपने ही जीवन काल में सामने मरता हुआ देख रहा हूँ - वह मात्र 40 वर्ष का था, भरा पूरा परिवार था - सोचिए कितना त्रस्त हो गया होगा वह बैंक, बाजार, कर्ज और दुनिया के तानों से, बदनामी से, तनाव और अवसाद से कि उसे आखिर में रेलवे की पटरी ही दिखी और कुछ नहीं
आप लोग भक्ति भाव करते रहिए, सरकार की तारीफ करते रहिए, महंगे होते पेट्रोल पर कुछ मत बोलिए, गैस सिलेंडर पंद्रह सौं रुपए का हो जाएगा, तब भी मत बोलिए, दाल - आटे के भाव से लेकर सब्जियों के भाव जितना जाना है ऊपर जाने दीजिए पर एक बार बता दीजिए - मेरे लाड़ले विद्यार्थी नरेश सोनी को आप कहीं से लौटा कर सकते हैं क्या, उन दो छोटी बेटियों को उनके पिता सौंप सकते हैं क्या, उसकी पत्नी को उसका पति दे सकते हैं - अगर नहीं तो फिर कुछ बोलिए, कुछ सोचिए और कुछ करिए - सरकारें तो सरकार खरीदने में व्यस्त हैं - कल मध्यप्रदेश की खरीदी थी, आज बिहार की खरीद रहे हैं, कल झारखंड - राजस्थान की खरीदेंगे और परसो छत्तीसगढ़ की खरीदेंगे और इस सब का रुपया हम आपकी जेब से जाने वाला है और आपको पता भी नहीं है
आइए सिर्फ दो मिनट के लिए, जी हाँ उस कमज़ोर और डरपोक नरेश सोनी के लिए, उसे जमकर गलियाते हुए, ज्ञान देते हुए, मॉरल पुलिसिंग करते हुए सिर्फ़ दो मिनिट का मौन रख ले और मुंह से कहें जय सियाराम, जय जय सियाराम, हिन्दू राष्ट्र अमर रहें, आज़ादी के अमृत उत्सव के जयकारों से आसमान गूंजा दें
स्तब्ध हूँ, परीक्षा सर पर है कुछ सूझ नही रहा, पर लिखें बिना रहा नही जाता, निगेटिव लिखता हूँ, हादसे मेरे साथ ही क्यों होते है, कितना सकारात्मक बनूँ कोई बताये, क्या यह सब भोगने की सजा नही जीवन, सरकारें तो गिरफ़्तार कर सकती है पर क्या उस अवसाद और पीड़ा को महसूस कर सकती है जो हम आप अपने आसपास देख समझ रहें है, भुगत रहे है और फिर भी चुप है - एक ही हल नज़र आता है
बोलो
***
|| लड़ेंगे - जीतेंगे ||

रीजनल कॉलेज ऑफ एजुकेशन, भोपाल में मैंने मार्च माह में एक ऑनलाइन व्याख्यान दिया था, कॉलेज ने मेरा मानदेय अपने ही परिसर के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मेरे खाते में जमा करने के लिए चेक जारी किया - परंतु मेरे पास वह पैसा आया नहीं, जब काफी दिन हो गए तो मैंने संबंधित प्राध्यापकों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि महाविद्यालय से तो पैसा चला गया है बाद में बैंक में मालूम किया तो पता चला कि बैंक ने यह राशि किसी और के खाते में डाल दी है ; बार - बार निवेदन करने पर भी बैंक ने वह राशि मेरे खाते में जमा नहीं की, अन्त में मुझे बैंक लोकपाल और स्टेट बैंक के रीजनल मैनेजर को लिखना पड़ा और लगातार फॉलो अप करना पड़ा, स्टेट बैंक की हेल्पलाइन पर भी मैंने कमोबेश पिछले 8 दिनों में रोज फोन किए आखिर आज वह राशि मेरे खाते में जमा हुई है
छोटी सी राशि के लिए मुझे अँग्रेजी में पत्राचार, कानून, बैंक लोकपाल और नियमों आदि की व्यवस्थित जानकारी होने के बाद भी चार माह लग गए तो सोचिये जो अनपढ़, गरीब या अशिक्षित है या नेट की पहुंच से दूर है और जिसे किसी भी प्रकार की जानकारी नही है - उसका क्या होता होगा इस देश में, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बैंक की इस तरह की गलती से करोड़ों लोगों को रोज भुगतना पड़ता है, पेंशन आदि के मामलों में जहां लोग चुप रहते है या लड़ते नही या जानकारी विहीन होते है वहां सरकार या बैंकों के पास अरबों रुपया सस्पेंस में पड़ा रहता है
लड़ना इसलिये जरूरी था कि यह सवाल छोटी सी मानदेय राशि का नहीं था - सवाल यह है कि बैंक ने जो गलती की है वह अक्षम्य है - क्योंकि बैंक हमारी न्यूनतम राशि खाते में जमा ना होने पर हमसे दंड वसूल करता है और यहां पर बैंक 4 महीने से रुला रहा था और कोई सुनने को भी तैयार नही था, रीजनल कॉलेज का अकाउंट्स अधिकारी भी नही सुन रहा था कि बैंक को पत्र जारी नही कर रहा था, उसे अन्त में कहना पड़ा कि MHRD में शिकायत करूँगा तब उसने बैंक को पत्र जारी किया
अन्त में बैंक लोकपाल और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के रीजनल मैनेजर को शिकायत करने पर रीजनल कॉलेज के ब्रांच मैनेजर ने अपनी गलती स्वीकार की और आज रुपये मेरे खाते में जमा किये है
बल्ली सिंह चीमा याद आते है -
"बिन लड़े कुछ भी यहां मिलता नही यह जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे है लोग मेरे गांव के ...."

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