Skip to main content

Khari Khari, Kamal Khan of NDTV, Rajesh Joshi and other Posts of 6 to 15 Jan 2022


हिंदी का सच झूठ से ठसाठस भरा हुआ है और कोई बोले तो लोग मर्यादा की सीमाएं लांघ जाते है
और मजेदार यह कि आलोचना की किताबें और पत्रिकाएँ मजे से पढ़ते है पर सच पढ़ने और सुनने की ताक़त नही
सबकी जय जय

***

एक मित्र ने अभी हिंदी के वरिष्ठ राजेश जोशी के बारे में लम्बा आख्यान लिखा, जोकि सराहनीय है पर मुझे लगता है कि यह भी एक तरह का अतिवाद है जिसके शिकार हिंदी में कई है, यह भी एक तरह की मानसिक गुलामी, अतिशयोक्ति और जबरन किसी को सिर माथे चढ़ाने वाली बात है

राजेश जोशी व्यक्ति अच्छे है, कवि भी रहें होंगे और काफी ठीकठाक उन्होंने लिखा है गद्य भी लिखा और कविता तो जाहिर है लिखी भी है - स्लोगन में लिखने का हुनर मंडलोई भी सीख गए है इधर,  पूरे सम्मान और गरिमा के साथ सच कहूँ तो वे हिंदी के ओवर रेटेड कवि है और उनके लग्गू भग्गुओं और रिटायर्ड बाबू टाईप कवियों ने, [ जिनकी ना समझ है - ना कूबत और जो जबरन कश्मीरनामा और तमाम श्रृंखला उठा लाते है पुस्तक मेलों से ड्राईंग रूम में सजाने वास्ते और अशोक पांडे से दोस्ती निभाने को - पठ्ठे एक पन्ना भी पलटकर नही पढ़ते, ना समझ है इनकी ] ने उन्हें "इष्ट" बनाकर उन्हें जबरन का खुदा बना दिया है, जोशी जी को कवि ही रहने दो यारो - यही बहुत है और अब वे लेखक संघ के अला फलां है, पर कर तो कुछ नही रहें ना बरसों से, हर किसी बड़ी छोटी घटना पर भोपाल के बोर्ड ऑफिस के सामने कु-कामरेडों और एनजीओ कर्मियों के संग झंडा पकड़कर खड़े हो जाते है, यह खड़ा होना एक्टिविज़्म नही है पार्टनर 

अगर तर्क से बात करें तो "जुनैद को मार डालो", जैसी भयानक कमजोर कविता लिखकर वे चुकने लगे है और यह एहसास उन्हें भी है, प्रलेस के कुमार अम्बुज जी ने यह खुद में पहचान लिया और वे कविता से विमुख होकर आजकल फ़िल्म समीक्षा पर चले गए और समालोचन पर बढ़िया रचनात्मक लिख भी रहें है

हर कवि की एक कविताई उम्र होती है और अब ये सब लोग जो 70 - 75 पार है और चूक गए है  - सिर्फ नगदी वाले पुरस्कार बटोरे, इंटरव्यू दें, गद्य लिखें और अपने अनुभव गोष्ठियों में बाँटें वही पर्याप्त है - इससे ज्यादा उम्मीद नही करना चाहिए, पूरे होशो हवास में कह रहा हूँ, अपने आसपास के चरण पकड़ूँ लोग ही उनके लिए नुकसानदायी है जो इष्ट कहकर अपनी चवन्नी छाप कविताएँ चला रहे है और घटिया संकलन छपवा रहें है, विवि में प्राध्यापक बनने वाले छोरे छपाटों को पकड़कर चिरौरी कर विवि में हिंदी के बहाने हज करना चाहते है 

बाबू समझो इशारे 

#खरी_खरी
***
|| कमाल के कमाल ||


यार कमाल कर गए, ये क्या बात हुई, मतलब कुछ भी, अभी अनुज Akshay Dongare से कन्फर्म किया - जो एनडीटीवी में है , कल रात को लाईव देखा, अभी सुबह से सोहित की रिपोर्ट देख रहा था, फिर फेसबुक पर नज़र पड़ी तो विश्वास नही हुआ, तुरन्त अक्षय को फोन किया तो यह दुखद सच सामने आया
लखनऊ में दो साल जब था ( 2012 - 14 ) तो अक्सर मुलाकात हो जाती थी, वो रिपोर्टर से ज़्यादा एक बेहतरीन शख्स थे, मनुष्य थे और बेहद संजीदा और संवेदनशील व्यक्तित्व थे, अक्सर हम लोग कुछ शेयर करते तो वो कहते कि "संदीप भाई, आप बहुत रिस्क लेकर दस्तावेज और जानकारियां शेयर करते हो और अपनी बेबाक राय देते हो - यह कम होता है, और मैं कहता कि कमाल भाई आप पर विश्वास है और बस यह बना रहे" ; नौकरी में रहकर जब बड़े समुदाय पर पड़ने वाले निगेटिव असर से सम्बंधित गलत निर्णय लिए जाते थे या आदेश पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर निकाले जाते थे, तो कमाल एक मात्र रिपोर्टर थे जो संवेदनशीलता से समझते थे और मुद्दा उठाते थे एवं उनसे शेयर करने और बात करने में मुझे कभी भय महसूस नही हुआ
कमाल खान जैसा बन्दा जिस लगन, प्रतिबद्धता और मेहनत से पेशे में थे वह आज होना असम्भव है और शायद आने वाले समय मे कोई दूसरा होगा भी नही
उत्तर प्रदेश ने ही नही, देश ने नही, बल्कि पूरी दुनिया ने एक बेबाक आवाज खो दी है, बहुत ज़्यादा लिखने की स्थिति में नही हूँ, इतनी यादें और बातें है कि क्या कहा जाये
बहुत दुखद
सुबह से बैठा हूँ एनडीटीवी पर रिपीट टेलीकास्ट देख रहा हूँ कमाल के कमाल
"वे कमल का तोड़ थे" - यह कहने में गुरेज नही कोई मुझे
बहुत दर्दनाक मौत है यह , खुदा कमाल खान को जन्नत अता करें यही दुआ कर सकता हूँ
आमीन

***
इधर न्यूज या फेसबुक से थोड़ी दूरी है
अजीब मूर्खता मचा रखी है, एक से एक नगीने है - तानसेन से लेकर अशोक की जाति खंगाली जा रही है मतलब कोई काम ही नही रह गया है इन उजबकों को और तो और परम ज्ञानी जिनका दिमाग जातिगत कुंठाओं से भरा हुआ है, मलाईदार पदों पर बैठे है आज पांच अंकों का वेतन ले रहे है वे कुतर्क कर रहें है - बेवकूफों की जमात है ससुरों की
उधर अंजना ओम कश्यप और अखिलेश की वार्ता हास्यास्पद हो गई है - एंकर ना हुई पार्टी की कार्यकर्ता हो गई, अखिलेश भी इस गंवार के चक्कर में बकवास करने पर उतर आए है
भाजपा की नैया डूब रही यूपी में जो विधायक पार्टी छोड़ रहे है - "टकले का साथ - सबका सत्यानाश" टाइप लग रहा जैसे
किताबों का कचरा बदस्तूर आ रहा है, जो लोग फेसबुक पर दिखते नही थे, घटिया अकड़ पर जिंदा थे वे रोज आकर यहां विनम्रता की मूरत बन गए है और चिरौरी कर रहें है, लिंक पेल रहे है - नई उम्र के चाटूकार, निहायत साम्प्रदायिक और विष से भरे हुए ये फर्जी कवि रायता फैला रहें है आज देखा - भगाओ, बहिष्कार करो ससुरों का
बाकी इतना ही अभी
देश बदल रहा है , जय हो
***

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

अदम गोंडवी की ग़ज़लें

अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन......... काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में जनता के पास एक ही चारा है बगावत यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में 000 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की? इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया सेक्स की रंगीनियाँ या ...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...