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मौत का एक दिन मुअय्यन है ग़ालिब भारतीय ध्वनी प्रदुषण और हम सब नपुंसक 29 April 2018

बरात में बैंड की शुरुवात जगराता से होती है पंखिड़ा रे उडी ने जाजो , फिर तूने मुझे बुलाया और फिर असली गाने शू होते है जो काले कव्वे से लेकर तमाम तरह के भौंडे नृत्य तक जाते है, सडकों पर बेतहाशा भीड़ है - ट्राफिक की, बारातियों की और देखने वालों की सब कुछ अस्त व्यस्त है बैंड, ढोल और ताशे वाले कर्कश स्वर में प्रतियोगिता की तरह से एक दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में सारी हदों को पार गए है, अब गाना है गंगा तेरा पानी अमृत, फिर बहारों फूल बरसाओ और अंत में 'गाडी वाला आया ज़रा कचरा निकाल' और दुल्हा सड़क पर खड़ा तोरण तोड़ रहा है और दुल्हन निकल कर वरमाला पहना रही है
सच में हम कहाँ आ गए है - परिवार और विवाह नाम की संस्था सड़ गल चुकी है फिर भी हम ढो रहे है. शादियों में जा रहा हूँ तो देख रहा हूँ अन्न की इतनी भयानक बर्बादी है कि आधा हिन्दुस्तान भरपेट खा सकता है इन सारी शादियों से और फेंके गए अन्न से पर किसी को शर्म है - ना आयोजकों को, ना खाने वालों को, ना फेंकने वालों को और ना वहाँ खड़े उठाकर खाने वालों को और फिर हम रोते रहें कि हम गरीब मुल्क है
डीजे नामक बीमारी इतनी भयानक हो गई है कि कलेक्टर, एस पी और पुरी न्याय व्यवस्था नपुंसक हो गई है - जो ना हाई कोर्ट के आदेश का अमल करवा सकती है ना पालन, क्यों ना इन प्रशासनिक रूप से जिम्मेदार लोगों को ही पदों से हटाकर एक बार जनता में जमकर नंगा करके पीटा जाए या सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा दी जाए ताकि इन्हें समझ में आयें कि कितना मुश्किल है - लगातार कानफोडू वाहियात संगीत सुनना या इनके सरकारी निवासों में और चेम्बर्स में कानफोडू भोपू लगा दिए जाए - दस दिन तक ताकि इन्हें एहसास हो कि आखिर जनता कितना भुगतती है.
रोज बरात, तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान, रोज तामाम तरह के काण्ड और इन कांडों के अंत में घटिया फ़िल्मी गानों कि तर्ज पर भजन जिसमे हारमोनियम के सुर टूट गए है और ढोलक तबला वाला भांग के नशे में या शराब के नशे में हो और पीट रहा है बुरी तरह से उपकरणों को, सुबह पांच बजे से नमाज, गुरुद्वारों की वाणी. मंदिरों से भजन, दिन भर बगीचों में भागवत के पुराण, सुबह से दोपहर तक कचरा गाडी की आवाज, फिर मेले ठेलों की सूचना, उसके बाद सेल और डायमंड ज्वेलरी के तांगे, आर्केस्ट्रा, कवि सम्मेलन के शहर भर में फैले भोपू, आये दिन होने वाली विभिन्न रैलियाँ, बाबाओं के जुलुस, शहीदों से लेकर हडताली कर्मचारियों के प्रदर्शन, एनजीओ वालों के छोटे मोटे प्रदर्शन, गोलू से मोटू पतलू टाईप टुच्चे नेताओं के पदभार करने पर होने वाले शक्ति प्रदर्शन, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम आयोगों के पदाधिकारियों का आना जाना और फिर भोपू, मतलब कुल मिलाकर एक आदमी को जितना अप्रत्यक्ष रूप से मारने के तरीके इजाद कर लिए है हमने वो गजब ही है और सारे नियम कायदे है, बने है - पर ना कलेक्टर को समझ आता है, ना एसपी को और बाकि कोतवाली में फोन लगाओ तो कहते है भिया बर्दाश्त कर लो हम क्या करेंगे आकर, एक दो दिन की बात है और फिर पार्षद मना कर देगा, या विधायक जी की रिश्तेदारी है. हम सब डरपोक गणराज्य के कमजोर नागरिक है.
क्यों ना मूल जड़ों पर प्रहार किया जाए - रात्री को साढ़े दस के बाद बैंड बाजे, ढोल और ताशे जब्त कर लिए जाए, डीजे की आवाज सेट कर दी जाए कि इतने डेसीबल के बाद यदि बजे तो स्वतः ही निष्क्रिय हो जाएँ, कोई भी बैंड वाला या मैरिज गार्डन वाला रात साढ़े दस के बाद गाने संगीत या महफिलों में नाच को अलाऊ करें तो उसको सीधा सील कर दो और सब बारातियों - घरातियों का सामान फेंक दो या दुल्हा दुल्हन को गिरफ्तार कर जेल में सुहाग रात मनवाओ सबके सामने. पर इस सबके लिए इच्छा शक्ति होना चाहिए जबकि हम नपुंसक व्यवस्था के शिकार है और समय आने पर खुद अपने तरबूजों के माफिक बड़े बड़े पुठ्ठे उचकाकर नाचना शुरू कर देते है इसलिए हम नही सुधर सकते, हम सब पापी है और घोर निकम्मे, मक्कार, दोगले, झूठे और निहायत ही घटिया इसलिए चुप रहिये और सहते रहिये..........

मौत का एक दिन मुअय्यन है ग़ालिब.......मरते रहिये रोज - रोज और अपना खून जलाते रहिये

#ख्ररी_खरी

Comments

Rohitas Ghorela said…
सबके सामने सुहागरात वाला विचार ठीक नहीं लगा बाकी सारा लेख सार्थक है..ध्वनी प्रदुषण को रोकने के लिए ठोस कानून व्यवस्था बनाई जाये और उसको अमल में लायी जाये.

खैर 

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